Harinarayan Muktinath Mandir नेपाल में हिन्दुओं का एक अद्भुत मंदिर है जो मोक्षदाता है और वैष्णव और बौद्ध — दोनों समुदायों के लिए समान रूप से पवित्र है..
नेपाल के मुस्तांग जिले में स्थित श्री हरिनारायण मुक्तिनाथ मंदिर एक ऐसा पवित्र स्थान है, जहां 108 जलधाराओं से होकर गुजरना और पवित्र कुंड में स्नान करना पापों से मुक्ति और मोक्ष की प्राप्ति का माध्यम माना जाता है। यह मंदिर वैष्णव और बौद्ध — दोनों समुदायों के लिए समान रूप से पवित्र है।
जन्माष्टमी पर विशेष भीड़
हर साल 16 अगस्त को श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के अवसर पर यहां भक्त बड़ी संख्या में पहुंचते हैं। जन्माष्टमी की तैयारियां मंदिर परिसर और आसपास के क्षेत्रों में कई दिन पहले से शुरू हो जाती हैं। भक्त मानते हैं कि यहां भगवान विष्णु के दर्शन और पवित्र स्नान से हरि की विशेष कृपा प्राप्त होती है।
मंदिर का धार्मिक महत्व
मुक्तिनाथ का अर्थ है — मोक्ष के स्वामी या मुक्ति देने वाले भगवान। यह मंदिर समुद्र तल से लगभग 3,710 मीटर की ऊंचाई पर हिमालय की गोद में स्थित है। यहां भगवान विष्णु, जो श्रीकृष्ण के अवतार हैं, की पूजा होती है।
पुराणों में इस स्थान का विशेष महत्व बताया गया है। यह गंडकी नदी से जुड़ा है, जो शालिग्राम शिलाओं के लिए प्रसिद्ध है। शालिग्राम को स्वयंभू और अत्यंत पवित्र पत्थर माना जाता है। इन्हें प्राण प्रतिष्ठा के बिना भी घर या मंदिर में स्थापित कर पूजा किया जा सकता है। मुक्तिनाथ क्षेत्र में शालिग्राम पत्थर बड़ी मात्रा में पानी के भीतर पाए जाते हैं, जिनसे मूर्तियां भी बनाई जाती हैं।
वैष्णव और बौद्ध दोनों की आस्था
यह मंदिर न केवल हिंदुओं बल्कि बौद्धों के लिए भी महत्वपूर्ण है। जन्माष्टमी के दिन यहां विशेष पूजा-अर्चना होती है और कृष्ण की बाल लीलाओं का स्मरण किया जाता है।
मुक्तिनाथ मंदिर का इतिहास 300-1000 ईस्वी के बीच लिखे गए पुराणों से जुड़ा है। इसे दुनिया के सबसे पुराने विष्णु मंदिरों में से एक माना जाता है और यह 24 तांत्रिक स्थलों में भी शामिल है।
धार्मिक कथाएं
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हिंदू मान्यता: कहा जाता है कि ब्रह्मा ने यहां तपस्या की थी और विष्णु ने उन्हें दर्शन दिए।
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बौद्ध मान्यता: तिब्बती बौद्ध धर्म के संस्थापक गुरु रिनपोछे (पद्मसंभव) तिब्बत जाते समय यहां ठहरे और ध्यान किया। इस कारण यह स्थान बौद्धों के लिए भी पवित्र हो गया।
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आदि शंकराचार्य का आगमन: 8वीं शताब्दी में उन्होंने यहां आकर इसे आध्यात्मिक शक्ति का केंद्र बताया।
मंदिर की संरचना और दर्शन
मंदिर पैगोडा शैली में तीन मंजिला है। गर्भगृह में भगवान विष्णु विराजमान हैं, उनके साथ माता लक्ष्मी और माता सरस्वती भी हैं।
मंदिर के प्रवेश द्वार से पहले गौमुख से निकलने वाली 108 धाराएं बहती हैं। इन धाराओं को सहस्त्रधारा कहा जाता है। पास में दो पवित्र कुंड हैं — लक्ष्मी कुंड और सरस्वती कुंड। मान्यता है कि इन धाराओं और कुंडों में स्नान करने से मनुष्य को पूर्व जन्म और वर्तमान जीवन के सभी पापों से मुक्ति मिलती है और मोक्ष प्राप्त होता है।
बौद्ध नाम और मान्यता
बौद्ध धर्म में इन 108 धाराओं को चुमिग ग्यात्सा कहा जाता है, जिसका अर्थ है “108 झरने”।
जन्माष्टमी के विशेष अनुष्ठान
जन्माष्टमी पर मंदिर में विशेष पूजा, आरती और भजन होते हैं। भक्त मानते हैं कि इस दिन यहां स्नान और दर्शन करने से जीवन में सुख-शांति आती है और परिवार में सुख-समृद्धि बनी रहती है।
(प्रस्तुति – अर्चना शेरी)