फ्रेम में दिख रहे इन दो खिलाड़ियों के बीच फर्क सिर्फ जर्सी के रंग, रन या विकेट का नहीं है। असली फर्क सोच का है… खेल को समझने की समझ का है।
पाकिस्तानी खिलाड़ी अक्सर शिकायतों का पुलिंदा खोल देते हैं — कभी ट्रेनिंग कम, कभी डाइट कम, कभी कोचिंग सिस्टम पर सवाल, तो कभी संसाधनों की कमी का रोना। बहाने इतने कि लगता है हार पहले तय कर लेते हैं और वजह बाद में खोजते हैं।
असल समस्या संसाधनों की नहीं, सोच की लगती है। मैच को इतना बड़ा बना दिया जैसे मैदान नहीं, युद्ध लड़ने जा रहे हों। बड़े-बड़े दावे, खिलाड़ियों को सुपरहीरो बना देना — लेकिन मैदान में रणनीति गायब।
पिच स्पिन के लिए मददगार थी, टीम में स्पिनर भरे पड़े थे, फिर भी पहले गेंदबाजी का फैसला समझ से बाहर रहा। ऊपर से गेंदबाजी में भी वही दो-तीन गेंदबाज बार-बार लाए गए जो पहले ही पिट चुके थे। ऐसा लगा जैसे प्लान मैच से पहले ही थक गया हो।
फिर जब लक्ष्य का पीछा करने उतरे तो शुरुआत ही तेज गेंदबाजों को विकेट सौंप कर कर दी। हालात समझने, पिच पढ़ने या स्ट्राइक रोटेट करने का धैर्य कहीं दिखा ही नहीं। कोलंबो जैसी पिच पर धैर्य और सिंगल-डबल ही मैच बनाते हैं, लेकिन यहां हर शॉट में जल्दबाजी दिखी।
दूसरी तरफ भारतीय बल्लेबाजों का तरीका अलग था। तेज खेलते हुए भी शॉट चयन परिस्थितियों के हिसाब से रहा। बाउंड्री आईं, लेकिन लापरवाही नहीं आई। एक विकेट गिरा तो दूसरे बल्लेबाज ने खेल को संभाला, रन की रफ्तार भी बनाए रखी और दबाव भी नहीं बनने दिया। यही मैच समझने की परिपक्वता होती है।
पाकिस्तानी बल्लेबाजी में ऐसा लगा जैसे हर खिलाड़ी अकेले मैच खत्म करना चाहता था। न साझेदारी, न धैर्य, न मैच सिचुएशन की समझ। विकेट ऐसे गिरते गए जैसे टीम खुद दबाव में घुट रही हो।
कई बार कमजोर संसाधनों वाली टीमें भी जज्बे और रणनीति से बड़े मुकाबले टक्कर दे देती हैं। दुनिया में कई उदाहरण हैं जहाँ सीमित साधनों के बावजूद टीमें प्लानिंग और धैर्य से मजबूत विरोधियों को परेशान कर देती हैं।
खेल सिर्फ ताकत से नहीं, दिमाग से भी जीता जाता है।
यह मुकाबला शुरुआत से ही एकतरफा दिखा क्योंकि एक टीम प्लान के साथ खेल रही थी और दूसरी टीम सिर्फ प्रतिक्रिया दे रही थी। क्रिकेट में प्रतिभा जरूरी है, लेकिन मैच जीतने के लिए संयम और समझ उससे भी ज्यादा जरूरी होती है।
राइवलरी का मतलब सिर्फ इतिहास नहीं होता, बराबरी का प्रदर्शन भी होना चाहिए। वरना मुकाबला कम और औपचारिकता ज्यादा लगने लगता है।
(ज्ञान प्रताप वाजपेयी)



