हिमालय की ऊँचाइयों पर जहाँ हवा भी दुश्मन बन जाती है और ज़मीन हर पल धोखा दे सकती है, भारतीय सेना ने एक ऐसा नवाचार पेश किया है जिसने दुर्गम इलाकों की पूरी लॉजिस्टिक्स तस्वीर बदल दी है। सेना ने हाई-एल्टीट्यूड मोनोरेल सिस्टम विकसित कर यह साबित कर दिया है कि चाहे भौगोलिक चुनौतियाँ कितनी भी कठिन क्यों न हों, भारत की सैन्य क्षमता उन्हें मात देने का सामर्थ्य रखती है।
दुर्गम इलाकों में नई जीवनरेखा
ये वही क्षेत्र हैं—बर्फ़ से ढकी ढलानें, माइनस तापमान, अनिश्चित तूफ़ान और मौत से भरे ग्लेशियर—जहाँ किसी भी मौसम में सप्लाई लाइन टूट जाना आम बात है। लेकिन अब सेना ने इस मोनोरेल सिस्टम के ज़रिए दुर्गमता को उसके ही घर में चुनौती दी है। यह सिस्टम अग्रिम चौकियों तक हथियार, गोला-बारूद और रसद ऐसे पहुँचाएगा, मानो भारतीय सेना ने पहाड़ों पर अपना दबदबा और बढ़ा लिया हो।
हर मौसम में काम करेगा
सेना का दावा है कि यह मोनोरेल सिस्टम 24×7 किसी भी मौसम में सुरक्षित रूप से ऑपरेट किया जा सकता है। चाहे ओलावृष्टि हो या बर्फ़ीला तूफ़ान, यह बिना किसी एस्कॉर्ट के काम करेगा। वे चौकियाँ, जो मोटी बर्फ़ की परतों के कारण हफ्तों दुनिया से कट जाती थीं, अब पहली बार पूरी तरह सप्लाई-सिक्योर होंगी। यह उस दुश्मन के लिए भी स्पष्ट संदेश है जो यह मान बैठा था कि ऊँचे पहाड़ भारतीय सैनिकों की रफ्तार रोक सकते हैं।
मेडिकल इवैक्यूएशन का नया साधन
यह मोनोरेल सिस्टम केवल रसद पहुँचाने तक सीमित नहीं है। यह अब हाई-एल्टीट्यूड बैटल ज़ोन में मेडिकल इवैक्यूएशन का भी नया हथियार बन गया है। जहाँ हेलिकॉप्टर मौसम की मार झेलकर उड़ान नहीं भर सकते, वहाँ से यह सिस्टम घायल जवानों को मिनटों में सुरक्षित निकाल सकता है। पैदल निकासी जहाँ जानलेवा धीमी साबित होती थी, वहीं यह सिस्टम जीवनरक्षक गति लेकर आया है।
गजराज कोर की उपलब्धि
कामेंग जैसे 16,000 फीट ऊँचे क्षेत्र में, जहाँ बर्फ़, हवाएँ और पहाड़ मिलकर किसी भी सैन्य ऑपरेशन को चुनौती देते हैं, वहीं गजराज कोर ने इस हाई-एल्टीट्यूड मोनोरेल इनोवेशन से दिखा दिया है कि भारतीय सेना केवल लड़ाई ही नहीं लड़ती, बल्कि कठिन से कठिन भूगोल को भी मात देने की तकनीक विकसित करती रहती है। यह सिर्फ एक मोनोरेल नहीं, बल्कि हिमालयी मोर्चों पर भारतीय सेना की नई तेज़ रफ्तार, नई ताक़त और नई रणनीतिक बढ़त है।
300 किलो से अधिक भार ढोने में सक्षम
सेना के अनुसार, यह मोनोरेल सिस्टम एक बार में 300 किलोग्राम से अधिक भार ढोने में सक्षम है। ऐसे इलाकों में फॉरवर्ड पोस्ट्स कई दिनों तक बर्फ़ के कारण कट जाती हैं और पारंपरिक परिवहन साधन विफल हो जाते हैं। इन्हीं परिचालन आवश्यकताओं को देखते हुए गजराज कोर ने स्वदेशी हाई-एल्टीट्यूड मोनोरेल सिस्टम को डिजाइन, विकसित और तैनात किया है।
सेना के लिए बहुउपयोगी
यह सिस्टम उन चौकियों के लिए जीवनरेखा साबित हो रहा है जहाँ न सड़क संपर्क है और न ही कोई अन्य संचार या आपूर्ति का साधन। इसके माध्यम से आवश्यक सैन्य सामग्री, गोला-बारूद, राशन, ईंधन, इंजीनियरिंग उपकरण और भारी लोड को आसानी से ढलानों और अस्थिर सतहों पर पहुँचाया जा सकता है।
गजराज कोर की यह इन-हाउस तकनीकी उपलब्धि सेना की परिचालन तत्परता को बढ़ाती है और हाई-एल्टीट्यूड पोस्टों की स्थायित्व क्षमता को मजबूत करती है। यह पहल भारतीय सेना की चुनौतीपूर्ण समस्याओं का व्यावहारिक, मिशन-केंद्रित समाधान खोजने की प्रतिबद्धता को दर्शाती है। कमेग हिमालय जैसे कठिन क्षेत्रों में संचालन के लिए यह नवाचार भारतीय सेना की अनुकूलन क्षमता, अभिनव सोच और अदम्य जज़्बे का प्रमाण है।
(प्रस्तुति -त्रिपाठी पारिजात)



