Iran War: न समझौता, न होर्मुज खुला: फिर भी ईरान युद्ध से पीछे क्यों हट रहा अमेरिका? ट्रंप की मजबूरी का पूरा विश्लेषण..
ईरान और अमेरिका के बीच जारी युद्ध अब एक ऐसे मोड़ पर पहुंच गया है, जहां अचानक हालात बदलते नजर आ रहे हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने संकेत दिया है कि अमेरिका बहुत जल्द इस जंग से बाहर निकल सकता है। सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि यह फैसला ऐसे समय में लिया जा रहा है, जब न तो होर्मुज जलडमरूमध्य खुल पाया है और न ही ईरान के साथ कोई औपचारिक समझौता हुआ है।
ट्रंप के इस फैसले ने कई बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। आखिर ऐसा क्या हुआ कि अमेरिका बिना अपनी शर्तें पूरी कराए ही पीछे हटने को तैयार हो गया?
ट्रंप का बदला हुआ रुख
व्हाइट हाउस में मीडिया से बातचीत के दौरान डोनाल्ड ट्रंप ने साफ कहा कि अमेरिका आने वाले दो से तीन हफ्तों में ईरान के खिलाफ अपनी सैन्य कार्रवाई बंद कर सकता है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि वॉशिंगटन अब इस युद्ध में ज्यादा समय तक शामिल रहने के मूड में नहीं है।
सबसे अहम बात यह रही कि ट्रंप ने यह भी कह दिया कि इस संघर्ष को खत्म करने के लिए ईरान के साथ किसी समझौते की जरूरत नहीं है। यानी अमेरिका बिना किसी डील के भी युद्ध समाप्त करने को तैयार है।
होर्मुज पर बदला स्टैंड
जहां पहले अमेरिका होर्मुज जलडमरूमध्य को हर हाल में खुलवाने की बात करता था, वहीं अब ट्रंप का रुख पूरी तरह बदल चुका है। उनका कहना है कि इस समुद्री रास्ते को खुला रखना उन देशों की जिम्मेदारी है, जो इस पर निर्भर हैं, न कि अमेरिका की।
उन्होंने यह भी इशारा किया कि अमेरिका अब इस मुद्दे पर ज्यादा ऊर्जा खर्च नहीं करना चाहता। पहले सहयोगी देशों से मदद न मिलने पर ट्रंप ने नाराजगी भी जताई थी।
क्यों बदले ट्रंप के सुर?
ट्रंप के बयान में बदलाव अचानक नहीं है, बल्कि इसके पीछे कई रणनीतिक और राजनीतिक कारण हैं। शुरुआत में अमेरिका को उम्मीद थी कि एक बड़े हमले के बाद ईरान जल्दी झुक जाएगा। लेकिन ऐसा नहीं हुआ।
ईरान ने न केवल जवाबी कार्रवाई की, बल्कि मजबूती से डटा रहा। इससे युद्ध लंबा खिंच गया और अमेरिका की योजना सफल नहीं हो सकी।
अमेरिका की मजबूरी क्या है?
अब सवाल उठता है कि आखिर अमेरिका क्यों पीछे हट रहा है। इसके पीछे कई अहम कारण हैं:
ईरान लगातार जवाबी हमले कर रहा है और कमजोर पड़ने के संकेत नहीं दे रहा। ईरान के अंदर सरकार के खिलाफ कोई बड़ा विरोध नहीं दिखा, जिससे ‘रिजीम चेंज’ की योजना विफल रही।
होर्मुज जलडमरूमध्य अब भी बंद है, जो दुनिया के बड़े हिस्से की तेल-गैस सप्लाई का मुख्य रास्ता है।
अमेरिका इसे खुलवाने में अब तक सफल नहीं हो पाया है।
कई पश्चिमी और नाटो देश खुलकर अमेरिका का साथ नहीं दे रहे। इस युद्ध के चलते अमेरिका अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दबाव में आ गया है। देश के भीतर भी ट्रंप सरकार के खिलाफ विरोध बढ़ रहा है।
ईंधन की कीमतों में बढ़ोतरी से अमेरिकी जनता नाराज है। ट्रंप की लोकप्रियता (approval rating) में गिरावट देखी जा रही है।
कैसे शुरू हुई थी यह जंग?
यह संघर्ष करीब एक महीने से ज्यादा समय से जारी है। इसकी शुरुआत 28 फरवरी को हुई थी, जब अमेरिका और इजरायल ने मिलकर ईरान पर बड़ा हमला किया था। इस हमले में ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत हो गई थी।
अमेरिका को उम्मीद थी कि इस हमले के बाद ईरान कमजोर पड़ जाएगा और वहां सत्ता परिवर्तन हो जाएगा। लेकिन इसके उलट, ईरान ने जवाबी कार्रवाई तेज कर दी और झुकने से इनकार कर दिया।
ईरान ने अमेरिकी ठिकानों को निशाना बनाया और होर्मुज जलडमरूमध्य को बंद कर वैश्विक स्तर पर दबाव बना दिया। इस कारण पूरी दुनिया में ऊर्जा आपूर्ति प्रभावित हुई।
आगे क्या हो सकता है?
मौजूदा हालात को देखते हुए यह साफ है कि अमेरिका अब इस युद्ध को लंबा नहीं खींचना चाहता। ट्रंप का फोकस अब नुकसान कम करके बाहर निकलने पर है। आने वाले कुछ हफ्ते तय करेंगे कि यह संघर्ष वास्तव में खत्म होता है या कोई नया मोड़ लेता है।
कुल मिलाकर, यह कहना गलत नहीं होगा कि जंग के मैदान में मजबूती से डटे ईरान और बदलते वैश्विक दबावों ने अमेरिका को अपनी रणनीति बदलने पर मजबूर कर दिया है।
(त्रिपाठी पारिजात)



