Jallikattu: तमिलनाडु का प्राचीन सांड-मानव खेल, परंपरा, संस्कृति, कानून और सुरक्षा की पूरी कहानी..
हर साल जनवरी में तमिलनाडु में एक ऐसा आयोजन होता है जो जितना रोमांचक है उतना ही विवादित भी। यह है जल्लीकट्टू, सांडों को काबू करने का पारंपरिक खेल, जिसे पोंगल पर्व के तीसरे दिन यानी मट्टू पोंगल पर मनाया जाता है। यह खेल तमिल संस्कृति की पहचान है, लेकिन इसके साथ ही पशु अधिकार, मानव सुरक्षा और कानूनी बहस भी जुड़ी हुई है।
जल्लीकट्टू का अर्थ और तरीका
‘जल्ली’ का मतलब होता है सिक्का (तांबा, चांदी या सोना) और ‘कट्टू’ का अर्थ है बांधना। इस खेल में सांड के सींग पर छोटी थैली या सिक्के बांधे जाते हैं। खुले मैदान में सांड को छोड़ दिया जाता है और युवक उसे पकड़ने की कोशिश करते हैं। जो प्रतिभागी सांड को काबू कर लेता है या थैली निकाल लेता है, उसे विजेता घोषित किया जाता है। सांड को पहले अच्छे से खिलाया-पिलाया जाता है, उसके सींगों पर रंग लगाया जाता है और फिर भीड़ के बीच छोड़ा जाता है।
इतिहास और वैश्विक जुड़ाव
इस खेल का इतिहास लगभग 2500 साल पुराना माना जाता है। कुछ इतिहासकार इसे सिंधु घाटी सभ्यता से भी जोड़ते हैं। दुनिया के कई देशों में सांडों से जुड़े खेल होते हैं, जैसे यूरोप में बुल रेस। तमिलनाडु में यह खेल फसल कटाई के पर्व से जुड़ा है, जिसमें किसान बैलों के योगदान के लिए आभार जताते हैं।
नस्ल संरक्षण और धार्मिक मान्यता
स्थानीय मान्यता है कि जल्लीकट्टू देसी बैलों की नस्लों को बचाने और बढ़ावा देने का माध्यम रहा है। किसानों के लिए यह गर्व का प्रतीक है। धार्मिक दृष्टि से बैल को भगवान शिव के वाहन नंदी का प्रतीक माना जाता है। खेल में सफलता को शुभ संकेत समझा जाता है।
कानूनी स्थिति और सरकार का रुख
जल्लीकट्टू पर पशु अधिकार संगठनों ने क्रूरता का आरोप लगाया। 2014 में सुप्रीम कोर्ट ने इसे प्रतिबंधित कर दिया। लेकिन तमिलनाडु सरकार ने Prevention of Cruelty to Animals (Tamil Nadu Amendment) Act 2017 के जरिए इसे कानूनी मान्यता दिलाई।
2023 में सुप्रीम कोर्ट ने इस कानून को वैध ठहराया और कहा कि जल्लीकट्टू को संस्कृति और विरासत के रूप में देखा जा सकता है। हालांकि कोर्ट ने पशु और मानव सुरक्षा के नियमों का पालन अनिवार्य किया। मद्रास हाई कोर्ट ने भी स्पष्ट किया कि ऐसे आयोजनों की अनुमति केवल राज्य सरकार दे सकती है।
सुरक्षा और विवाद
हालांकि कानूनी मान्यता मिलने के बाद भी जल्लीकट्टू विवादों से घिरा रहता है। हर साल इसमें चोट और मौत की घटनाएँ होती हैं। हाल ही में मदुरै के अवनियापुरम में 32 लोग घायल हुए। इसी कारण सरकार ने डॉक्टरों, सुरक्षा कर्मियों और गाइडलाइन्स को अनिवार्य कर दिया है।
समर्थकों का कहना है कि यह खेल तमिल पहचान और परंपरा का हिस्सा है, जबकि आलोचक इसे खतरनाक और अमानवीय बताते हैं।



