Mahabharat के अनुसार अर्जुन की कुल चार पत्नियां थीं – द्रौपदी, उलूपी, चित्रांगदा और सुभद्रा। आमतौर पर लोग अर्जुन – द्रौपदी और अर्जुन – सुभद्रा की कथा से परिचित हैं। इसलिए यहाँ पढ़िये उलूपी और चित्रांगदा की कहानी..
पांडवों में द्रौपदी को लेकर यह नियम था कि जिस समय द्रौपदी किसी एक भाई के साथ एकांत में समय व्यतीत कर रही हो, उस समय यदि कोई अन्य भाई उस कक्ष में प्रवेश करे, तब उसे बारह वर्षों तक वनवास भोगना होगा।
एक दिन कुछ चोर उनके राज्य में घुस आए और गायों को चुराकर भगाने लगे। चोरों से तंग आकर नगर के ब्राह्मण पांडवों के शरण में पहुंचे और उनसे चोरों से निपटने का आग्रह किया।
उस समय युधिष्ठिर द्रौपदी के साथ एकांत में समय व्यतीत कर रहे थे। युधिष्ठिर के कक्ष में सभी अस्त्र शस्त्र रखे हुए थे। इसलिए अर्जुन को उनके कक्ष में जाना पड़ा। अर्जुन ने कक्ष में प्रवेश तो किया किन्तु उन्होने युधिष्ठिर और द्रौपदी को नहीं देखा। वे केवल अपने अस्त्र शस्त्र उठाकर चोरों को भगाने चल दिए।
भले ही यहां पर अर्जुन की कोई गलती नहीं थी, पर फिर भी वे नियम का पालन करते हुए वन में बारह वर्ष व्यतीत करने चल पड़े। इसी दौरान उनकी मुलाकात उलूपी और चित्रांगदा से हुई।
अर्जुन – उलूपी का मिलन
एक दिन अर्जुन स्नान करने के लिए गंगा नदी में गए। उसी समय नागलोक में विचरने वाली नाग कन्या उलूपी उनके ऊपर मोहित हो उठी और अर्जुन को खींच कर नागलोक में ले गई।
यहां पर उसने अर्जुन को अपना परिचय दिया और उनके साथ समागम करने की इच्छा प्रकट की। किन्तु अर्जुन ने उसके साथ संबंध बनाने से इंकार कर दिया।
लेकिन उलूपी की कामुकता उसके वश से बाहर हो चली थी। उसने अर्जुन के आगे हांथ जोड़ते हुए कहा कि यदि वह उनकी बात नहीं मानेंगे, तो वह मर जाएगी। उसने कहा कि अर्जुन अपनी शरण में आए हुए हर प्राणी को शरण देते हैं, इसलिए उनको उसकी बात मान लेनी चाहिए। इससे उसके प्राणों की रक्षा भी होगी।
इतनी विनती के बाद अर्जुन ने वह रात नागलोक में व्यतीत किया। अगले दिन प्रस्थान से पहले उलूपी ने उनको जल में सदैव अजय होने का वरदान दिया। उलूपी ने आगे चलकर अर्जुन के पुत्र इरावान् को जन्म दिया।
अर्जुन – चित्रांगदा का मिलन
उलूपी के साथ समय बिताने के पश्चात् अर्जुन पूर्व दिशा की और बढ़े और मणिपुर (आज का ओडिशा) राज्य में पधारे। वहां पर चित्रांगदा को देखकर अर्जुन मोहित हो उठे। उन्होने चित्रांगदा के पिता चित्रवाहन से उसके साथ विवाह करने की इच्छा प्रकट की।
यह सुनकर मणिपुर नरेश ने अर्जुन से कहा कि चित्रांगदा उनकी इकलौती बेटी है। इसलिए उन्होने उस अपना पुत्र ही माना है। चित्रांगद ने अपनी पुत्री देने की यह शर्त रखी कि जो भी पुत्र उससे उत्पन्न होगा, वही मणिपुर राज्य का राजा बनेगा।
अर्जुन ने यह शर्त स्वीकार कर लिया। उन्होने चित्रांगदा के साथ तीन वर्ष व्यतीत किए। चित्रांगदा से जो पुत्र उत्पन्न हुआ, उसका नाम बभ्रुवाहन पड़ा।
अर्जुन हस्तिनापुर की ओर रवाना होने से पहले चित्रांगदा को बभ्रुवाहन की देखभाल की ज़िम्मेदारी सौंप गए। साथ ही उन्होंने चित्रांगदा को यह भी आश्वासन दिया कि भविष्य में वह जब हस्तिनापुर आना चाहे, तो वो और उनका परिवार सदा उसके स्वागत को तैयार रहेंगे।
(प्रेमचंद महाराज)



