Saturday, August 8, 2026
Google search engine
Homeराष्ट्रMeta: काकरोचों के आंदोलन को बढ़ावा देने के लिये पैसे मिले थे...

Meta: काकरोचों के आंदोलन को बढ़ावा देने के लिये पैसे मिले थे – मेटा ने माना

Meta कह रहा है कि गलती हुई है पर सच ये है कि इतने व्यापक स्तर पर गलती नहीं होती, न ही इतने महत्वपूर्ण विषय पर कोई भूल होती है..जान कर ही किया है

Meta ने माना बड़ी गलती की ! – पेड प्रमोशन, डीपफेक, चाइल्ड सेक्सुअल कंटेन्ट और पीएम मोदी के ट्वीट को हटाने के मामलों पर सरकार के सामने कबूली अपनी गलती..

Meta ने भारत सरकार के सामने डीपफेक, बच्चों के यौन शोषण से जुड़े कंटेंट और पेड कंटेंट प्रमोशन की खामियों को लेकर जिम्मेदारी स्वीकार की। जानिए पूरा मामला।

फेसबुक, इंस्टाग्राम और व्हाट्सऐप की पैरेंट कंपनी Meta एक बार फिर भारत सरकार के सवालों के घेरे में है। कंपनी के शीर्ष अधिकारियों ने भारत में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर गलत और आपत्तिजनक सामग्री से जुड़े कई गंभीर मामलों को लेकर सरकार के सामने सफाई दी है, वहीं कुछ मामलों में अपनी जिम्मेदारी भी स्वीकार की है।

मामला सिर्फ डीपफेक या गलत सूचना तक सीमित नहीं है। सरकारी सूत्रों के मुताबिक, बातचीत के दौरान Meta के सामने बच्चों के यौन शोषण से जुड़े कंटेंट, कुछ खास तरह की सामग्री को पैसे लेकर बढ़ावा देने और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की फेसबुक पोस्ट को कुछ समय के लिए हटाए जाने का मुद्दा भी उठाया गया। कंपनी की ओर से इन मामलों को लेकर माफी मांगे जाने की बात भी सामने आई है।

पीएम मोदी की पोस्ट हटाने पर Meta ने मांगी माफी

इस पूरे विवाद की शुरुआत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की 23 जुलाई की फेसबुक पोस्ट को कुछ समय के लिए हटाए जाने से हुई। भारत सरकार ने इस घटना को गंभीरता से लेते हुए Meta से स्पष्टीकरण मांगा और कंपनी के वरिष्ठ अधिकारी को बातचीत के लिए भारत बुलाया गया।

Meta के वैश्विक मामलों के प्रमुख जोएल कपलान अमेरिका से भारत आए और उन्होंने भारतीय अधिकारियों के साथ इस मामले पर चर्चा की। उन्होंने सबसे पहले सूचना प्रौद्योगिकी सचिव एस. कृष्णन से मुलाकात की और इसके बाद केंद्रीय सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री अश्विनी वैष्णव के साथ बैठक की।

कपलान की भारत यात्रा का मुख्य उद्देश्य सरकार के सामने कंपनी का पक्ष रखना था। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, प्रधानमंत्री की पोस्ट को हटाने के मामले में Meta की ओर से माफी भी मांगी गई।

हालांकि, इस माफी को लेकर एक महत्वपूर्ण बात सामने आई। Meta के वैश्विक मामलों के प्रमुख जोएल कपलान ने लिखित बयान में पोस्ट हटाए जाने पर खेद जताया, जबकि सरकारी सूत्रों के मुताबिक माफीनामा कंपनी के CEO मार्क जुकरबर्ग की ओर से आया था।

डीपफेक और गलत कंटेंट पर भी सवाल

सरकार और Meta के अधिकारियों के बीच बातचीत केवल प्रधानमंत्री की पोस्ट तक सीमित नहीं रही। बैठक में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर फैल रहे डीपफेक और गलत सूचना से जुड़े मामलों पर भी चर्चा हुई।

डीपफेक तकनीक की मदद से किसी व्यक्ति की तस्वीर, आवाज या वीडियो को इस तरह बदला जा सकता है कि वह असली दिखाई देने लगे। ऐसे कंटेंट के तेजी से फैलने पर भारत समेत दुनिया के कई देशों में चिंता बढ़ी है, खासकर तब जब इसका इस्तेमाल किसी व्यक्ति की छवि खराब करने, भ्रम फैलाने या लोगों को गुमराह करने के लिए किया जाता है।

सरकारी सूत्रों के अनुसार, Meta के अधिकारियों ने इन क्षेत्रों में मौजूद कुछ कमियों को स्वीकार किया। कंपनी के सामने यह सवाल रखा गया कि प्लेटफॉर्म पर आपत्तिजनक या भ्रामक सामग्री के प्रसार को रोकने के लिए उसके सिस्टम कितने प्रभावी हैं।

बच्चों के यौन शोषण वाले कंटेंट का मुद्दा भी उठा

बैठक में सबसे गंभीर मुद्दों में से एक बच्चों के यौन शोषण से जुड़े कंटेंट का था। सूत्रों के अनुसार, भारतीय अधिकारियों ने Meta के सामने इस तरह की सामग्री के प्लेटफॉर्म पर मौजूद रहने और उसके प्रसार से जुड़े सवाल उठाए।

सरकारी सूत्रों ने यह भी दावा किया कि बातचीत के दौरान कंपनी ने कुछ कमियों को स्वीकार किया। इस मामले में कंटेंट की निगरानी, उसे हटाने की प्रक्रिया और ऐसे नेटवर्क या अकाउंट्स के खिलाफ कार्रवाई जैसे मुद्दे चर्चा में रहे।

हालांकि, यहां एक अहम सावधानी जरूरी है। Meta के वैश्विक मामलों के प्रमुख जोएल कपलान या कंपनी के किसी अन्य अधिकारी की ओर से कथित तौर पर पैसे लेकर बच्चों के यौन शोषण वाले कंटेंट को बढ़ावा देने के दावे की सार्वजनिक रूप से पुष्टि नहीं की गई है।

इसलिए इस हिस्से को सरकारी सूत्रों के दावे के तौर पर ही देखा जाना चाहिए, न कि Meta की आधिकारिक स्वीकारोक्ति के रूप में।

क्या Meta ने पैसे लेकर कंटेंट प्रमोट किया?

यही इस पूरे मामले का सबसे गंभीर और चौंकाने वाला पहलू बनकर सामने आया है। सरकारी सूत्रों के अनुसार, बातचीत के दौरान यह बात भी सामने आई कि कुछ विशेष प्रकार के कंटेंट को अधिक लोगों तक पहुंचाने के लिए बड़ी रकम खर्च की गई।

सरकारी सूत्रों ने इसे बच्चों के यौन शोषण से जुड़े कंटेंट के संदर्भ में बताया। लेकिन Meta की तरफ से इस खास दावे को लेकर कोई स्पष्ट सार्वजनिक स्वीकारोक्ति या टिप्पणी सामने नहीं आई है।

यानी यहां दो बातें अलग-अलग समझना जरूरी है। सरकार की ओर से लगाए गए या सूत्रों के हवाले से सामने आए आरोप एक तरफ हैं, जबकि कंपनी की आधिकारिक प्रतिक्रिया दूसरी तरफ है। इसीलिए इस मामले में आगे की सरकारी कार्रवाई और Meta की अगली सफाई पर नजर रहेगी।

जोएल कैपलन कौन हैं?

भारत सरकार के साथ बातचीत के लिए Meta के वैश्विक मामलों के प्रमुख जोएल कपलान खुद अमेरिका से भारत पहुंचे थे। वह वर्ष 2011 में Meta से जुड़े थे और इससे पहले अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू. बुश के प्रशासन में काम कर चुके हैं।

Meta में उनकी जिम्मेदारी कंपनी के वैश्विक सरकारी संबंधों और नीतिगत मामलों से जुड़ी है। ऐसे में भारत सरकार के साथ इस स्तर की बातचीत में उनकी मौजूदगी को काफी महत्वपूर्ण माना गया।

उन्होंने भारतीय अधिकारियों के साथ हुई बैठकों में कंपनी का पक्ष रखा और सरकार की चिंताओं को सुना। प्रधानमंत्री मोदी की पोस्ट से लेकर कंटेंट मॉडरेशन और डीपफेक तक कई मुद्दे इन बैठकों का हिस्सा बने।

सरकार ने Meta को ‘सेफ हार्बर’ पर क्या कहा?

बैठक का एक और महत्वपूर्ण हिस्सा भारत में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म की कानूनी जिम्मेदारी से जुड़ा रहा। सरकारी सूत्रों के मुताबिक, केंद्र ने Meta से कहा कि वह भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी कानून के तहत खुद को केवल एक न्यूट्रल इंटरमीडियरी बताकर जिम्मेदारी से पूरी तरह अलग नहीं हो सकती।

सरकार का तर्क बताया गया कि Meta के प्लेटफॉर्म सिर्फ यूजर्स द्वारा अपलोड किए गए कंटेंट को रखने का काम नहीं करते। उनके एल्गोरिदम यह भी तय करते हैं कि किस व्यक्ति को कौन सा कंटेंट दिखाया जाए, किस सामग्री को रिकमेंड किया जाए और कौन सी पोस्ट ज्यादा लोगों तक पहुंचे।

यही वजह है कि सरकार ने कथित तौर पर Meta के सामने उसकी एल्गोरिदमिक भूमिका का सवाल उठाया। अगर कोई प्लेटफॉर्म खुद यह तय करने में सक्रिय भूमिका निभाता है कि यूजर को कौन सा कंटेंट दिखेगा, तो उसकी कानूनी जिम्मेदारी को केवल एक निष्क्रिय होस्ट की भूमिका तक सीमित करना आसान नहीं होगा।

‘सेफ हार्बर’ सुरक्षा क्यों महत्वपूर्ण है?

सोशल मीडिया कंपनियों के लिए सेफ हार्बर एक महत्वपूर्ण कानूनी सुरक्षा व्यवस्था है। इसके तहत इंटरमीडियरी प्लेटफॉर्म आमतौर पर यूजर्स द्वारा पोस्ट किए गए कंटेंट के लिए सीधे जिम्मेदार नहीं माने जाते, बशर्ते वे कानून में तय शर्तों और आवश्यकताओं का पालन करें।

भारत सरकार ने Meta को यह संकेत दिया है कि यदि कंपनी अपने प्लेटफॉर्म पर कंटेंट को सक्रिय रूप से रिकमेंड और प्रमोट करती है, तो उसकी भूमिका केवल एक साधारण इंटरमीडियरी की नहीं मानी जा सकती।

यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म का प्रभाव लगातार बढ़ रहा है। करोड़ों लोग फेसबुक, इंस्टाग्राम और व्हाट्सऐप जैसे प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल करते हैं और ऐसे में गलत सूचना या गैरकानूनी कंटेंट का बड़े स्तर पर प्रसार सरकार के लिए गंभीर चुनौती बन सकता है।

भारत सरकार ने साफ कहा – भारतीय कानून मानना होगा

सूत्रों के मुताबिक, केंद्र सरकार ने Meta को एक बात बिल्कुल स्पष्ट कर दी है कि भारत में कारोबार और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म संचालित करने वाली किसी भी कंपनी को भारतीय कानूनों का पालन करना ही होगा।

सरकार का संदेश केवल Meta तक सीमित नहीं माना जा सकता। सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म के लिए भारत में कंटेंट मॉडरेशन, यूजर सेफ्टी, शिकायत निवारण और कानून के पालन से जुड़े नियम लगातार महत्वपूर्ण होते जा रहे हैं।

सरकार की तरफ से यह रुख ऐसे समय में सामने आया है जब डीपफेक, फेक न्यूज, ऑनलाइन फ्रॉड और आपत्तिजनक डिजिटल कंटेंट को लेकर दुनिया भर में बहस चल रही है। भारत में भी सरकार और बड़ी टेक कंपनियों के बीच प्लेटफॉर्म की जिम्मेदारी को लेकर बातचीत लगातार बढ़ रही है।

क्या Meta को फिर तलब किया जायेगा ?

सरकारी सूत्रों के मुताबिक, केंद्र सरकार जरूरत पड़ने पर Meta के अधिकारियों को दोबारा बातचीत के लिए बुला सकती है। इसका मतलब है कि मामला फिलहाल पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है और सरकार कंपनी से आगे भी स्पष्टीकरण मांग सकती है।

आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि Meta इन आरोपों और सरकारी चिंताओं पर क्या आधिकारिक प्रतिक्रिया देता है। खासकर पेड प्रमोशन और बच्चों के यौन शोषण से जुड़े कंटेंट के बारे में सामने आए दावों पर कंपनी की स्पष्ट स्थिति इस पूरे विवाद को समझने में महत्वपूर्ण होगी।

फिलहाल इतना जरूर है कि भारत सरकार ने Meta को लेकर अपना रुख सख्त कर दिया है। प्रधानमंत्री की पोस्ट हटाए जाने से शुरू हुई बातचीत अब डीपफेक, गैरकानूनी कंटेंट, कंटेंट रिकमेंडेशन, एल्गोरिदम और सेफ हार्बर जैसे बड़े कानूनी और तकनीकी सवालों तक पहुंच चुकी है।

इस पूरे घटनाक्रम का असर आने वाले दिनों में भारत में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म की जवाबदेही और डिजिटल कंटेंट मॉडरेशन के नियमों पर भी दिखाई दे सकता है।

(अर्चना शैरी)

RELATED ARTICLES

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

- Advertisment -
Google search engine

Most Popular

Recent Comments