Osho: पांच सौ से अधिक पुस्तकें लिखने वाले प्रख्यात विचारक व वक्ता आचार्य रजनीश भारतीय मनीषा का जगमगाता नक्षत्र थे जो ओशो के नाम से सारी दुनिया में जाने गये..
ओशो के इसी प्रवचन से अमेरिका और ईसाइयत में भूचाल आ गया था, और ओशो को गिरफ्तार कर धीमा जहर दे दिया गया था।
ओशो का वह प्रवचन, जिससे ईसाइयत तिलमिला उठी थी और अमेरिका की रोनाल्ड रीगन सरकार ने उन्हें हाथ-पैरों में बेड़ियां डालकर गिरफ्तार किया और फिर मरने के लिए थीलियम नामक धीमा जहर दे दिया था। इतना ही नहीं, वहां हजारों एकड़ में बसे रजनीशपुरम को भी तबाह कर दिया गया था, और अमेरिका ने पूरी दुनिया को यह निर्देश भी दे दिया था कि ओशो को न कोई देश आश्रय देगा और न ही उनके विमान को लैंडिंग की इजाजत दी जाएगी।
आज पढ़िये उनका चौंकाने वाला वही ऐतिहासिक प्रवचन, जिससे ईसाईयत कांप उठी थी…
“पश्चिम में आज भी जब कोई सत्य के लिए प्यासा होता है, तो अनायास ही वह भारतभूमि पर आने के लिए उत्सुक हो उठता है। अचानक उसे पूरब की यात्रा पर निकलना ही पड़ता है, और यह केवल आज की ही बात नहीं है। यह उतनी ही प्राचीन बात है, जितने पुराने प्रमाण और उल्लेख इतिहास में मौजूद हैं। आज से 2500 वर्ष पूर्व, सत्य की खोज में यूरोपियन गणितज्ञ पाइथागोरस भारत आया था, ईसा मसीह भी भारत आए थे।”
“ईसा मसीह के 13 से 30 वर्ष की उम्र के बीच के घटनाक्रमों का बाइबिल में कहीं कोई उल्लेख नहीं है, और यही उनकी लगभग पूरी जिंदगी थी, क्योंकि 33 वर्ष की उम्र में तो उन्हें सूली पर ही चढ़ा दिया गया था। उनकी कुल आयु के 13 से 30 तक वर्षों तक यानि 17 वर्षों तक का हिसाब बाइबिल से भी गायब है। इतने समय वे कहां रहे? आखिर बाइबिल में उन सालों को रिकार्ड क्यों नहीं किया गया?”
“वास्तव में उन्हें जानबूझ कर छोड़ा गया है, क्योंकि ईसायत कोई मौलिक अर्थात मूल धर्म नहीं है, वह इसलिए कि ईसा मसीह जो भी कह रहे थे वे उसे भारत से लाए थे, यह बहुत ही विचारणीय बात है। येरूशलम में वे एक यहूदी की तरह जन्मे, यहूदी की ही तरह जिए और यहूदी की ही तरह मरे। स्मरण रहे कि वे ईसाई नहीं थे, उन्होंने तो ईसा और ईसाई, ये शब्द भी नहीं सुने थे। फिर यहूदी उनके इतने खिलाफ क्यों थे? यह सोचने जैसी बात है, आखिर क्यों? आज भी न तो ईसाईयों के पास इस सवाल का ठीक-ठाक जवाब है और न ही यहूदियों के पास ही। क्योंकि इस व्यक्ति ने किसी को कोई नुकसान नहीं पहुंचाया। ईसा उतने ही निर्दोष थे जितनी कि कल्पना की जा सकती है”।
“उनका अपराध बहुत सूक्ष्म था, पर पढ़े-लिखे और चतुर यहूदियों ने स्पष्ट देख लिया था कि वे पूरब से विचार ले रहे हैं, जो गैर यहूदी है। वे कुछ अजीबोगरीब और विजातीय बातें लेकर आ रहे थे। और यदि इस दृष्टिकोण से देखो तो तुम्हें समझ आ जाएगा कि क्यों वे बार-बार कहते हैं- अतीत के पैगंबरों ने तुमसे कहा था कि यदि कोई तुम पर क्रोध करे, हिंसा करे तो आंख के बदले में आंख लेने और ईंट का जवाब पत्थर से देने को तैयार रहना। लेकिन मैं तुमसे पहली बार कहता हूं कि अगर कोई तुम्हें चोट पहुंचाता है, एक गाल पर चांटा मारता है तो उसे अपना दूसरा गाल भी दिखा देना। ये पूर्णत: गैर यहूदी बातें थीं जो उन्होंने भारत प्रवास के दौरान गौतम बुद्ध और महावीर की देशनाओं से सीखी थीं”।
“ईसा जब पहली बार भारत आए थे, तब बौद्ध धर्म जीवंत था, यद्यपि बुद्ध की मृत्यु हो चुकी थी। गौतम बुद्ध के पांच सौ साल बाद जीसस यहां आए थे। पर बुद्ध ने इतना विराट आंदोलन, इतना बड़ा तूफान खड़ा किया था कि तब तक भी पूरा मुल्क उसमें डूबा हुआ था। बुद्ध की करुणा, क्षमा और प्रेम के उपदेशों को भारत पिए हुए था”।
“जीसस कहते हैं कि यहूदियों के अतीत के पैगंबरों जैसे इजेकिएल, इलिजाह और मोसेस का यह कहना था ”कि ईश्वर बहुत ही हिंसक है और वह कभी क्षमा नहीं करता है। यहां तक कि प्राचीन यहूदी पैगंबरों ने ईश्वर के मुंह से ये शब्द भी कहलवा दिए हैं कि ”मैं कोई सज्जन पुरुष नहीं हूं, तुम्हारा चाचा नहीं हूं। मैं बहुत क्रोधी और ईर्ष्यालु हूं, और याद रहे जो भी मेरे साथ नहीं हैं, वे सब मेरे शत्रु हैं। ओल्ड टेस्टामेंट में ईश्वर के यही वचन हैं, और जबकि ईसा मसीह यहां कह रहे हैं कि ”मैं तुमसे कहता हूं कि परमात्मा प्रेम ही
है”।
“तनिक विचार कीजिए, यह ख्याल उन्हें कहां से आया कि परमात्मा प्रेम है? गौतम बुद्ध की शिक्षाओं के सिवाए दुनिया में कहीं भी परमात्मा को प्रेम कहने का कोई और उल्लेख नहीं है। ईसा अपने विदेश प्रवास के उन 17 वर्षों में इजिप्ट, भारत, लद्दाख और तिब्बत की यात्रा करते रहे। यही उनका अपराध था कि वे यहूदी परंपरा में बिल्कुल अपरिचित और अजनबी विचारधाराएं ला रहे थे। न केवल अपरिचित बल्कि वे बातें यहूदी धारणाओं के एकदम विपरीत थीं”।
“तुम्हें जानकर और भी आश्चर्य होगा कि अंतत: उनकी मृत्यु भी भारत में हुई थी। जबकि ईसाई रिकार्ड्स जानबूझकर इस तथ्य को नजरअंदाज करते रहे हैं। यदि उनकी बात सच है कि जीसस पुनर्जीवित हुए थे तो फिर पुनर्जीवित होने के बाद वे कहां चले गए थे, क्योंकि उसके बाद का उनका वर्णन ईसाइयत में क्यों नहीं मिलता”?
“सच्चाई यह है कि वे कभी पुनर्जीवित नहीं हुए, वास्तव में वे सूली पर मरे भी नहीं थे। वास्तव में यहूदियों की सूली पर आदमी को मारने की तरकीब सर्वाधिक बेहूदी है। उसमें आदमी को मरने में करीब-करीब 48 घंटे लग जाते हैं। चूंकि हाथों में और पैरों में कीलें ठोंक दी जाती हैं तो बूंद-बूंद करके उनसे खून टपकता रहता है। यदि आदमी स्वस्थ है तो 60 घंटे से भी ज्यादा जीवित रहेगा, ऐसे अनेक उल्लेख हैं। सूली पर मृत्यु होने में औसतन 48 घंटे तो लग ही जाते हैं, और जीसस को तो सिर्फ छह घंटे बाद ही सूली से उतार दिया गया था। यहूदी सूली पर कोई भी छह घंटे में कभी नहीं मरा है, कोई मर ही नहीं सकता है।”
“वास्तव में वह एक मिलीभगत थी, जीसस के शिष्यों की पोंटियस पॉयलट के साथ, पोंटियस चूंकि यहूदी नहीं था, वो रोमन वायसराय था। जूड़िया उन दिनों रोमन साम्राज्य के अधीन था। यद्यपि निर्दोष जीसस की हत्या में रोमन वायसराय पोंटियस को कोई भी रुचि नहीं थी, पर पोंटियस के दस्तखत के बगैर यह हत्या नहीं हो सकती थी। इसलिए पोंटियस को अपराध भाव का अनुभव हो रहा था कि वह इस भद्दे और क्रूर हिंसा के नाटक में भाग ले रहा है। चूंकि पूरी यहूदी जाति उसके पीछे पड़ी थी कि जीसस को सूली लगनी ही चाहिए, क्योंकि वे पूरब के विचार यहूदियों पर थोप रहे थे। जीसस वहां एक सशक्त मुद्दा बन चुके थे। पोंटियस पॉयलट दुविधा में था। यदि वह जीसस को छोड़ देता तो वह पूरी जूड़िया को जो कि यहूदी है, अपना दुश्मन बना लेता। यह कूटनीतिक रूप से सही नहीं होगा, और यदि वह जीसस को सूली दे देता है तो उसे आसपास के क्षेत्रों का समर्थन तो मिल जाएगा। मगर उसके स्वयं के अंत:करण में एक घाव रह जाएगा कि राजनैतिक परिस्थितियों के कारण उसने एक निरपराध व्यक्ति की हत्या करा दी, जिसने कुछ भी गलत नहीं किया था”।
“तो पोंटियस ने जीसस के शिष्यों के साथ मिलकर यह व्यवस्था की कि शुक्रवार को जितनी संभव हो सके उतनी देर से सूली दी जाए। चूंकि सूर्यास्त होते ही शुक्रवार की शाम को यहूदी सब प्रकार का कामधाम बंद कर देते हैं, फिर शनिवार को कुछ भी काम नहीं होता, वह उनका पवित्र दिन है। यद्यपि सूली दी जानी थी शुक्रवार की सुबह, पर उसे लगातार स्थगित किया जाता रहा। नौकरशाही तो किसी भी कार्य में देरी लगा सकती है”।
“अत: जीसस को दोपहर के बाद सूली पर चढ़ाया गया और सूर्यास्त के पहले ही उन्हें जीवित उतार लिया गया। यद्यपि वे बेहोश थे, क्योंकि शरीर से बहुत रक्तस्राव हुआ था और कमजोरी आ गई थी। पवित्र दिन यानि शनिवार के बाद रविवार को यहूदी उन्हें पुन: सूली पर चढ़ाने वाले थे। जीसस के देह को जिस गुफा में रखा गया था, वहां का चौकीदार रोमन था न कि यहूदी। इसलिए यह संभव हो सका कि जीसस के शिष्यगण उन्हें बाहर आसानी से निकाल लाए और फिर जूड़िया से बाहर ले गए।”
“जीसस ने भारत में आना क्यों पसंद किया? क्योंकि युवावास्था में भी वे वर्षों तक भारत में रह चुके थे। उन्होंने अध्यात्म और ब्रह्म का परम स्वाद इतनी निकटता से चखा था कि उन्होंने वहीं दोबारा लौटना चाहा। तो थोड़े ही दिनों बाद जैसे ही वह स्वस्थ हुए, भारत आ गए और फिर 112 साल की उम्र तक जिए।”
“कश्मीर के पहलगाम में अभी भी उनकी कब्र है। उस पर जो लिखा है, वह हिब्रू भाषा में है। स्मरण रहे, भारत में कोई यहूदी नहीं रहते हैं। उस शिलालेख पर खुदा है, ”जोशुआ”- यह हिब्रू भाषा में ईसा मसीह का नाम है। ‘जीसस’ ‘जोशुआ’ का ग्रीक रुपांतरण है। ‘जोशुआ’ यहां आए’- समय, वहां तारीख वगैरह सब दी गई है। एक महान सदगुरु, जो स्वयं को भेड़ों का चरवाहा गड़रिया पुकारते थे, अपने शिष्यों के साथ शांतिपूर्वक 112 साल की दीर्घायु तक यहां रहे। इसी वजह से वह स्थान ‘भेड़ों के चरवाहे का गांव’ कहलाने लगा। तुम वहां जा सकते हो, वह शहर अभी भी है पहलगाम, उसका कश्मीरी में वही अर्थ भी है अर्थात गड़रिए का गाँव”।
“ईसा भारत क्यों आये? क्या केवल मृत्यु के लिए? हां, कई रहस्यों में से एक रहस्य यह भी है कि यदि तुम्हारी मृत्यु एक बुद्धक्षेत्र में हो सके, जहां केवल मानवीय ही नहीं, वरन भगवत् सत्ता की ऊर्जा तरंगें हों, तो तुम्हारी मृत्यु भी एक उत्सव और निर्वाण बन जाती है। सदियों से सारी दुनिया के साधक इस धरती पर आते रहे हैं। यह देश
आध्यात्मिक, पुण्य प्रदान करने वाला देश है। यहां एक विशेष प्रकार की आध्यात्मिक उर्जा पसरी पड़ी है। यहां शान्ति है, जो मानवीयता के प्रति संवेदनशील हैं। इससे अधिक समृद्ध विचार इस पृथ्वी पर कहीं नहीं हैं। सम्भवतः इसी विचार को आत्मसात करने के लिए ही ईसा भारत आये थे”।
ओशो का यही वह ऐतिहासिक सम्बोधन था, जिसके कारण ईसाइयत उनकी जान की दुश्मन हो चुकी थी।
(प्रस्तुति -आशुतोष मणि त्रिपाठी)