Pakistan में NCRC रिपोर्ट के चौंकाने वाले खुलासे बताते हैं कि इस नापाक देश में हिंदू और ईसाई बच्चे जबरन धर्मांतरण का शिकार हो रहे हैं. हिन्दू और ईसाई बच्चियों का अपहरण करके उनका जबरन बड़ी उमर के मुस्लिमों से विवाह कराया जा रहा है..
पापिस्तान में धार्मिक अल्पसंख्यकों विशेष रूप से हिंदू और ईसाई समुदायों से जुड़े बच्चों की स्थिति को लेकर हाल ही में एक चौंकाने वाली रिपोर्ट सामने आई है, जो न केवल मानवाधिकारों के उल्लंघन की भयावहता को दर्शाती है, य़े घटना ये भी दिखाती है कि गैर-मुस्लिम समुदायों के इन बच्चों का भविष्य किस तरह के सामाजिक, धार्मिक और संस्थागत शोषण की गिरफ्त में है.
पापिस्तान के ही NCRC की रिपोर्ट के मुताबिक, पाकिस्तान में अल्पसंख्यक लड़कियों का अपहरण, जबरन धर्म परिवर्तन और फिर उनकी अधेड़ मुस्लिमों से शादी करवा देना एक बढ़ती हुई आपराधिक समस्या है. ये न केवल मानवाधिकारों का उल्लंघन है, बल्कि इन बच्चों के भविष्य को भी अंधकारमय बना देता है. अप्रैल 2023 से दिसंबर 2024 के बीच ऐसे कुल 27 मामले दर्ज किए गए हैं, जिनमें पीड़ित बच्चों का धर्म और उम्र दोनों ही निशाने पर रहा है. न जाने कितने ऐसे मामले और भी हो सकते हैं जिनकी खबर ही नहीं है. ये है हिन्दुओं के खिलाफ पाकिस्तानी जिहाद.
पापिस्तान में धार्मिक अल्पसंख्यकों विशेष रूप से हिंदू और ईसाई समुदायों से जुड़े बच्चों की स्थिति को लेकर हाल ही में एक चौंकाने वाली रिपोर्ट काला सच उजागर करती है, जो न केवल मानवाधिकारों के उल्लंघन की भयावहता को दर्शाती है, बल्कि यह भी दिखाती है कि गैर-मुस्लिम समुदायों के बच्चों का भविष्य किस तरह के सामाजिक, धार्मिक और संस्थागत शोषण की गिरफ्त में रहने को मजबूर है.
NCRC रिपोर्ट में काला सच उजागर
ये रिपोर्ट पापिस्तान के नेशनल कमीशन ऑन द राइट्स ऑफ चाइल्ड (NCRC) द्वारा तैयार की गई है और इसे क्रिश्चियन डेली इंटरनेशनल ने प्रकाशित किया है. रिपोर्ट में विस्तार से बताया गया है कि किस तरह हिंदू और ईसाई अल्पसंख्यक समुदायों के बच्चों को जबरन धर्म परिवर्तन, बाल विवाह, बंधुआ मजदूरी और शैक्षणिक भेदभाव जैसी आपराधिक और हिंसात्मक समस्याओं का सामना करना पड़ता है.
संयुक्त राष्ट्र के विशेषज्ञों ने भी पापिस्तान में अल्पसंख्यक लड़कियों के जबरन धर्म परिवर्तन और शादी की घटनाओं पर चिंता जताई है।
जबरन धर्मांतरण की बढ़ती घटनाएं
रिपोर्ट के सबसे चौंकाने वाले खुलासों में से एक है नाबालिग लड़कियों का अपहरण कर उनका जबरन धर्मांतरण और फिर मुस्लिम पुरुषों से शादी करवाने की घटनाएं. ये केवल अपनी तरह की आपराधिक घटनाएं ही नहीं हैं, बल्कि एक सुनियोजित और संस्थागत स्तर पर संरक्षित पैटर्न बन कर सामने आई हैं, जहां कानून की पकड़ बेहद कमजोर और न्याय की पहुंच लगभग असंभव है.
नाबालिग बच्चियों का जबरन धर्म परिवर्तन
इस तरह के संवेदनशील मामलों में अक्सर पुलिस निष्क्रिय रहती है या जिहादियों के दबाव में आकर पीड़िता की शिकायत को नजरअंदाज कर देती है. ज्यादातर मामलों में वहां की अदालतें भी इस बात को मान लेती हैं कि नाबालिग बच्चियां अपनी मर्जी से धर्म बदल रही हैं और शादी कर रही हैं, जबकि असलियत इसके बिलकुल उलट होती है. बच्चियों पर मानसिक, सामाजिक और हिन्सात्मक दबाव डालकर उनको मजबूर किया जाता है. इसके अलावा भ्रष्ट पुलिसकर्मियों द्वारा फर्जी दस्तावेज तक तैयार कर लिये जाते हैं, जिससे पीड़ितों के परिवारों को अदालत में न्याय के लिए दर-दर भटकना पड़ता है और परिणाम ढाक के तीन पात ही रहता है।
आकड़ों की भयावह तस्वीर
रिपोर्ट में आंकड़े दर्शाते हैं कि अप्रैल 2023 से दिसंबर 2024 के बीच, अल्पसंख्यक बच्चों को लेकर जिहादियों के खिलाफ 27 गंभीर मामले दर्ज हुए, जिनमें हत्या, अपहरण, धर्मांतरण और बाल विवाह जैसी घटनाएं शामिल हैं. ये आंकड़े केवल उन्हीं मामलों के हैं जो रिकॉर्ड में आए, जबकि ज़मीनी हकीकत ये है कि असंख्य मामले बिना रिपोर्ट के दबा दिए जाते हैं.
पंजाब प्रांत में सबसे अधिक पीड़ित
पापिस्तान के पंजाब प्रांत को लेकर रिपोर्ट में विशेष चिंता जताई गई है. ये पापिस्तान का सबसे अधिक आबादी वाला प्रांत है और यहां जनवरी 2022 से सितंबर 2024 तक अल्पसंख्यक समुदाय के बच्चों के खिलाफ होने वाले हर तरह के अपराधों का लगभग 40% यहीं पर दर्ज किया गया.
पुलिस आंकड़ों के अनुसार, इस दौरान दर्ज मामलों में शामिल पीड़ितों की संख्या –
547 ईसाई बच्चे, 32 हिंदू बच्चे, 2 अहमदिया, 2 सिख, 9 अन्य अल्पसंख्यक
ये केवल एक आंकड़ा नहीं है, बल्कि ये उस भय, शोषण और असहायता की अभिव्यक्ति है, जिसे ये बच्चे प्रतिदिन इस तरह की जानें कितनी ही यातनायें झेलते हैं.
शिक्षा नहीं, दमन का जरिया
पापिस्तान में धार्मिक अल्पसंख्यकों के बच्चों को केवल समाज में ही नहीं, बल्कि स्कूलों और शिक्षण संस्थानों में भी निरंतर भेदभाव का सामना करना पड़ता है. रिपोर्ट में ये भी बताया गया कि पाकिस्तान के सरकारी स्कूलों में ईसाई और हिंदू छात्रों को उनकी आस्था के खिलाफ इस्लामिक सब्जेक्ट्स पढ़ने के लिए मजबूर किया जाता है.
ये उनके शैक्षणिक प्रदर्शन पर सीधा असर डालता है, क्योंकि वे उन विषयों में रुचि नहीं लेते या समझ नहीं पाते, जिनका उनके मजहबी विश्वास से कोई लेना-देना नहीं होता. परिणामस्वरूप उनका GPA गिरता है, जिससे वे अकादमिक रूप से पिछड़ जाते हैं और एक तरह की जिहादी सोच वाली अलगाववादी संस्कृति में जीने को मजबूर कर दिये जाते हैं.
शिक्षा जो एक बदलाव का साधन हो सकती थी, वह पापिस्तान में अब भेदभाव और दबाव का हथियार बन चुकी है.
बरबाद बचपन – बरबाद भविष्य
NCRC की रिपोर्ट ये भी उजागर करती है कि जबरन धर्म परिवर्तन और शैक्षणिक भेदभाव के अलावा इन बच्चों को बाल श्रम और बंधुआ मजदूरी जैसे गंभीर अमानवीय हालात में भी धकेला जाता है. कई बार गरीब अल्पसंख्यक परिवारों को कर्ज के बोझ में फंसाकर उनके बच्चों को ईंट भट्टों, खेतों और कारखानों में काम करने के लिए मजबूर किया जाता है. ऐसे में इन बच्चों के लिये शिक्षा यानी पढ़ाई-लिखाई एक सपना बन कर रह जाती है.
ये बच्चे न केवल शिक्षा से वंचित रहते हैं, बल्कि उन्हें एक ऐसे जीवन में झोंक दिया जाता है जहां उनके अधिकार, उनका भविष्य और उनकी पहचान तीनों खतरे में पड़ जाते हैं यानी उनका भविष्य पूरी तरह चौपट हो जाता है.
NCRC की सरकार से अपील
NCRC की रिपोर्ट ने वहां सरकार से अपील की है कि वो संवेदनशील और प्रभावी नीतियों के जरिए इस भेदभाव को रोके। साथ ही, अल्पसंख्यक बच्चों को सुरक्षा देने, शिक्षा में समानता सुनिश्चित करने और जबरन धर्मांतरण जैसे मामलों में कानूनी हस्तक्षेप को सशक्त बनाने की मांग भी की गई है।
पापिस्तान में धार्मिक अल्पसंख्यकों के बच्चों की स्थिति एक बड़ी चिंता का विषय है. एनसीआरसी की रिपोर्ट ये दर्शाती है कि पापिस्तान जैसे जिहादी देश में समानता और मानवाधिकार की बातें तब तक अधूरी हैं, जब तक बच्चों को बिना भेदभाव के जीने और आगे बढ़ने का अवसर नहीं मिलता सरकार और अंतर्राष्ट्रीय संगठनों को चाहिए कि वे इस दिशा में ठोस कदम उठाएं.
हिंदू और ईसाई नाबालिग लड़कियों सीधे निशाने पर
पापिस्तान में अल्पसंख्यक बच्चों, विशेषकर हिंदू और ईसाई नाबालिग लड़कियों सीधे निशाने पर हैं. उनके खिलाफ जबरन धर्मांतरण और अपहरण की घटनाएं एक गंभीर मानवाधिकार उल्लंघन की ओर इशारा कर रही हैं। एनसीआरसी और अन्य मानवाधिकार संगठनों की रिपोर्ट्स ने इस मुद्दे को वैश्विक स्तर पर उजागर किया है, लेकिन स्थानीय स्तर पर प्रभावी कार्रवाई की कमी चिंता का विषय बनी हुई है। अंतर्राष्ट्रीय समुदाय और पापिस्तान सरकार से इस दिशा में ठोस कदम उठाने की मांग तेज हो रही है ताकि अल्पसंख्यक बच्चों के अधिकारों की रक्षा की जा सके। हालांकि ऐसा होना दूर की कौड़ी जैसी बात लगती है..
(प्रस्तुति -इंद्रपति त्रिपाठी)