Parakh Saksena says साउथ इंडियन फ़िल्मी दुनिया के सुपर स्टार विजय थलपति का राजनीति में प्रवेश लोगों के पल्ले नहीं पड़ रहा है..समझने का प्रयास करें अदृश्य कारणों में जा कर..
जो राजनीति पढ़ते है उन्हें विजय थालापति एक विलेन लग रहा होगा जबकि जो राजनीति समझते है वे विजय पर मौन है।
तमिलनाडु मे बीजेपी का वोट प्रतिशत 12% हो चुका है, उसके समर्थक दल मिलाकर 17-18 हो जाता है। सत्ताधारी DMK का 29% है, DMK का यूनिक पॉइंट है कि इस समय वो अकेली भाषावाद की राजनीति खेल रही है।
DMK अकेली ही है जो हिन्दी विरोध मे लगी है ऐसे मे उसे कुछ कट्टर तमिलो का एकतरफा वोट मिल रहा है। मगर अब एंट्री होती है एक और तमिल नेता विजय की, विजय सुपर स्टार है इसमें कोई संदेह नहीं।
वो तमिल फिल्मो मे सबसे महंगा कलाकार है। विजय भी स्टालिन की तरह ईसाई है, स्टालिन बूढा और कमजोर हो चुका है उसका बेटा उदयनिधि उतना योग्य नहीं है। ऐसे मे विजय का प्रो तमिल होना बीजेपी के ही फायदे का सौदा है।
आइडिया ये है कि विजय DMK के वोट कटवा दे और उसे 20% के आसपास ले आये, बीजेपी के लिये आवश्यक है कि कांग्रेस का जो थोड़ा बहुत वोट बैंक बचा है उसे तोड़े साथ ही AIADMK का भी।
यदि ऐसा होता है तो NDA संयुक्त रूप से 25% पार कर जाएगा। सत्ता नहीं भी मिली तो भी भागीदारी तो मिलेगी ही। इसलिए बीजेपी का सारा ध्यान इस समय तमिलनाडु पर होना चाहिए, उसके बाद ही केरल जीत सकोगे।
केरल जीतने के लिये जरुरी है कि ईसाई आबादी भी बीजेपी के साथ आये, जो कि पहले ही कम्युनिस्टो से चिढ़ चुकी है। लेकिन ईसाईयों को साथ लोगे तो उत्तर मे अति कट्टर हिन्दू भड़क जाएंगे और वोट घटवाएंगे।
इसलिए तमिलनाडु जीतना आवश्यक है, एक बार तमिलनाडु गिरा तो केरल को लेकर भी सारे हिन्दुओ का धैर्य कट्टरता को तोड़ देगा। विजय के आने से तमिलनाडु की राजनीति अब रोचक हो गयी है, तमिलनाडु अब दूर की कोढ़ी नहीं है।
बस बीजेपी हर बार की तरह चुनाव पूर्व नए एक्सपेरिमेंट ना कर बैठे। बीजेपी के कट्टर समर्थको को भी विजय के खिलाफ बोलने से बचना चाहिए क्योंकि यदि गठबंधन जैसी स्थिति बनी तो बेवजह शब्द वापस लेने पड़ेंगे।
तब तक इन्हे हिन्दी के पोस्टर जितनी मर्जी फाड़ने दो, इनके हाथो मे उतना दम नहीं है कि हिन्दी का मान घटा सके।
हालांकि हिन्दी भाषी राज्यों को हिन्दी के प्रचार मे अब आगे आने की आवश्यकता है। हर राज्य हिन्दी के लिये बजट बना रहा है मगर उससे कोई विकास नहीं हो पा रहा। आवश्यकता है कि दक्षिण मे कुछ NGOs खोले जाए और राज्य सरकारे उन्हें फंड करें।
मध्यप्रदेश, हरियाणा, उत्तरप्रदेश और उत्तराखंड जैसे राज्य जहाँ कांग्रेस के लौटने की संभावना नहीं है कम से कम वे इसे आरंभ कर सकते है। तमिल भाषा से कोई विरोध नहीं है ऊपर से बटेंगे तो कटेंगे वाला समय चल रहा है।
लेकिन जिस दिन जेहाद की समस्या खत्म हुई उस दिन ये प्रान्तवादी पार्टियां सही मायनो मे समझेगी कि हिन्दी इम्पोजिशन वास्तव मे कैसा दिखता है तब तक भाषा का झुनझुना पकडे रहो।
हिन्दी किसी भाषा को नहीं खाती, उल्टे दूसरी भाषाओ का विस्तार होता है। आप कभी गणेश जी की आरती या भजन ध्यान से सुनिए, आप पाएंगे उसमे ना जाने कितने शब्द मराठी साहित्य के है। नवरात्री के गरबा भजनो मे गुजराती भाषा का एकतरफा बोलबाला होता है।
जबकि ये दोनों भाषा बोलने वाले लोग सहिष्णु है हिन्दी प्रयोग मे भी लाते है बावजूद इसके मराठी और गुजराती खत्म नहीं हुई उल्टे हिन्दी पट्टे पर इनका साहित्य चाव से पढ़ा जा रहा है। इन भाषाओं के कुछ शब्द बिना ध्यान मे आये नॉर्थ ईस्ट तक मे प्रयोग हो जाते है।
अब आप ही सोचिये कि ये विस्तार हुआ या भक्षण, थोड़ा नस्लभेदी लगेगा मगर यथार्थ है कि तमिल पार्टियों ने तमिलनाडु की एक बड़ी आबादी को कुए का मेंढक बना दिया है। खैर देर सबेर सूर्योदय भी हो जाएगा।
(परख सक्सेना)