Saturday, August 30, 2025
Google search engine
HomeदुनियादारीParakh Saxena writes: जो देश स्वदेशी बनाता है, अमेरिका के वर्चस्व के...

Parakh Saxena writes: जो देश स्वदेशी बनाता है, अमेरिका के वर्चस्व के लिये चुनौती बनता है

1995 के समय अमेरिका की जीडीपी 7.7 ट्रिलियन डॉलर थी और जापान की 5.5 ट्रिलियन डॉलर। जापान कुछ ही वर्षो मे अमेरिका को पछाड़ने वाला था। लेकिन आज जापान 5 ट्रिलियन से भी नीचे है और अमेरिका 30 को छू रहा है।
दरसल अमेरिका ने इसकी तैयारी 10 साल पहले कर ली थी और 1985 मे न्यूयॉर्क के प्लाजा होटल मे प्लाजा अकॉर्ड
जापान से हस्ताक्षरित करवा लिया था या यू कहे जापान ने इस बार खुद पर परमाणु बम गिरा लिया था।
उससे पहले जापान की स्थिति इतनी मजबूत थी कि कुछ सेक्टर्स मे तो जापान का निर्यात विश्व के निर्यात का 67% तक हो गया था। जापानी कम्पनिया एक ब्रांड का प्रतीक हो गयी थी और अमेरिका के बाजार मे छा चुकी थी।
फिर 1985 मे अमेरिका ने ब्रिटेन, पश्चिम जर्मनी, फ़्रांस और जापान को साथ बुलाकर डॉलर के अवमूल्यन का प्रस्ताव रखा। प्रस्ताव था कि डॉलर की वैल्यू घटाई जायेगी और अन्य सभी देश अपनी अपनी मुद्रा का मूल्य बढाएंगे।
जैसे एक साधारण भारतीय ये पढ़कर खुश हो गया होगा वैसे ही उस समय जापान भी हो गया और फिर इस ब्लंडर के नतीजे आने लगे। एक डॉलर के मुकाबले जापानी येन 285 पर था वो महज तीन सालो मे गिरकर 120 पर आ गया।
इससे हुआ ये कि जापानियों के लिये आयात करना आसान हो गया और निर्यात करना बेहद मुश्किल। हर जापानी उत्पाद क़ीमत मे लगभग दोगुना हो गया, 5-7 साल तो जैसे तैसे विदेशी ग्राहकों ने महंगे उत्पादों से काम चलाया।
मगर 1995 तक जेब जवाब दे गयी और जापानी उत्पादों के विकल्प बाजार मे सस्ते मे मिलने लगे। बस यही जापानी अर्थव्यवस्था का चरम था और उसके बाद या तो ये स्थिर रहती है या फिर गिरती है।
पिछले 30 वर्षो मे जापान ने अर्थव्यवस्था मे कुछ विशेष उपलब्धि हासिल नहीं की।
1992 मे इनकी आँखे भी खुली थी, इन्होने अमेरिका से बात की मगर राष्ट्रपति जॉर्ज एच डब्लू बुश के ऑफिस से जवाब आया कि जर्मनी का एकीकरण हो चुका है तो जिस पश्चिमी जर्मनी के साथ यह समझौता हुआ था वो देश ही अब नक़्शे से गायब है।
फिर अगले राष्ट्रपति बिल क्लिंटन को भी अप्रोच किया गया, उन्होंने कहा कि सोवियत संघ बिखर गया है अभी हम नए वर्ल्ड ऑर्डर का अध्ययन कर रहे है तो आर्थिक फैसले नहीं ले सकते।
जापान समझ गया था कि छल शह के खेल मे उसके हाथ मात आयी है। अपनी मुद्रा के उन्मूलन की क़ीमत जापान को आज भी चुकानी पड़ रही है, आप इससे अंदाज लगाइये कि उस समय भारत कितना पीछे था।
भारत ने पिछले 30 सालो मे आतंकवाद, नक्सलवाद और दोयम दर्जे की राजनीति के बावजूद आज जापान को पीछे कर दिया है। ये उन 30 सालो की कहानी है जिन्हे जापान का खोया हुआ समय कहा जा सकता है या भारत चीन का उदय काल।
लेकिन तब ही से ये सबक बन गया कि अमेरिका कैसे खेल खेलता है? तब जापान निशाने पर था फिर 2018 मे चीन निशाने पर आया और अब खुद भारत।
जो देश स्वदेशी बनाता है और अमेरिका के वर्चस्व के लिये चुनौती बनता है उन्हें ऐसे ही गिराया जाता है। लेकिन चीन का पता नहीं हम भारतीय इसे झेल जाएंगे, भारत का सूर्य अस्त नहीं होगा।
2004 वाली गलती हमने 2024 मे नहीं दोहराई ये इसका प्रमाण है।
(परख सक्सेना)
RELATED ARTICLES

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

- Advertisment -
Google search engine

Most Popular

Recent Comments