Wednesday, April 1, 2026
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Poetry by Manmeet Soni: पेट्रोल के कुओं में आग लगे

Poetry by Manmeet Soni:  पेट्रोल की गंध के आगे कुएं के पानी की सोंधी खुशबू हमेशा जीत जायेगी..सच जान लीजिये मनमीत की कलम से, दुनिया की जिन्दगी पेट्रोल से नहीं पानी से चल पायेगी..

Poetry by Manmeet Soni:  पेट्रोल की गंध के आगे कुएं के पानी की सोंधी खुशबू हमेशा जीत जायेगी..सच जान लीजिये मनमीत की कलम से, दुनिया की जिन्दगी पेट्रोल से नहीं पानी से चल पायेगी..

 

पेट्रोल के कुओं में आग लगे
पानी के कुओं में लबालब पानी हो!

हे ईश्वर!
पागल हो चुका है
तेरा सबसे बड़ा और सार्थक आविष्कार : मनुष्य
इसकी आँखों में
एक बूँद आँसू नहीं
और यह निचोड़ने में लगा है सारा पाताल!

पेड़
इसके लिए सूखी लकड़ी हैं
पानी
इसके लिए बिजली का कारखाना
हवा
इसके लिए “विंड एनर्जी” है
सूर्य
इसके लिए “सोलर एनर्जी”
बच्चों को
यह “ह्यूमन रिसोर्स” मानता है
स्त्रियों को
यह “सेक्स मशीन”
बुजुर्गों को
यह “बैगेज” समझता है
धरती को
यह माता नहीं “प्लेनेट” कहता है
अंतरिक्ष
इसके लिए “रिसर्च” का “एरिया” है
ईश्वर
इसके लिए लोगों को मूर्ख बनाने वाला “कांसेप्ट”

बरसों हुए
घोड़ों ने जूठा नहीं तालाब का पानी
नहाए नहीं
ऊंटों के जत्थे
किसी नखलिस्तान में
हिरन दौड़े नहीं
मृग मरीचिकाओं की ओर
भेड़-बकरियों ने
लूँग नहीं खाए जांटियों के
एक सुंदर गीला दृश्य देखने के लिए
तरस गई हैं
हमारी सूखी हुई आँखें

पेट्रोल डीज़ल को पी कर
धरती को कुचल देने वाले इन व्हीकलों के बोझ से
त्रस्त है धरती माता
धरती के गले में
फूलों की बेलों के हार उतार कर
टायर पहना दिए गए हैं
तीन सौ बरस पहले
भाप की शक्ति से
दौड़ क्या पड़ा रेल का इंजन
धरती की छाती पर रख दिया हमने
लोहे का पेपरवेट!

जंगलों के हरे बालों में
खोन्स दी गई
प्लास्टिक की क्लिपें
मनुष्य की आत्मा को
बंधुआ बना दिया
टीवी फोन और इंटरनेट जैसे हथियारों से
आख़िरी बार
कब किसी को दिल से याद किया था
और याद करने पर
वह सचमुच सामने आ गया था –
याद नहीं!

इस बार अच्छा बहाना है
कुवैत
कतर
दुबई
ईरान
इराक
सीरिया
सब के सब
पेट्रोल के कुओं में डाल दो माचिस की तिल्ली –
एक शताब्दी होने को आई
बैलगाड़ी में बैठकर
दुनिया के बच्चे
अपनी नानी-दादी के घर नहीं गए छुट्टियों में!

कितना सुंदर ज़माना था
जब पेट्रोल से भरे फाइटर प्लेन में नहीं
घोड़ों पर सवार होकर आते थे
हमारे गाँव में
काले साफ़े और काले तिलक वाले डाकू
कितने सभ्य और उदार थे हमारे डाकू
इस ट्रम्प
इस नेतान्याहु
इस खामेनेई
इस पुतिन से

मेरी दुआ है
यह दुनिया “ग्लोबल विलेज” से
फिर से
एक बहुत बड़े “ग्लोब” में बदल जाए
और एक जगह से दूसरी जगह जाने में
हालत ख़राब हो जाए लोगों की!

कितके कमाल के दिन थे
जब दंगों के लिए
पेट्रोल बम नहीं थे
सिर्फ़ आग थी
और आग को
पानी से क़ाबू किया जा सकता था!

मैं सचमुच चाहता हूँ
बंद हो जाए होर्मूज स्ट्रेट
और कुछ दिन लड़ें दुनिया के पागल तानाशाह
दुनिया के सारे देश नींद में चिल्लाएं :
पेड़ लगाओ ताकि लकड़ियाँ मिलें!

दुनिया सत्तर प्रतिशत पानी से बनी है
मनुष्य सत्तर प्रतिशत पानी से बना है
और मनमीत दावे से कहता है
आत्मा भी सत्तर प्रतिशत पानी से बनी है
कब तक चुराएंगे
हम पानी से आँख
कब तक बिठाए रखेंगे
पेट्रोल को तख़्त पर
उतारो इस कमीने को तख़्त से
पेट्रोल के कनस्तर को
पानी के गिलास से बदल दो
आओ दुनिया वालो
मेरा साथ दो!

मैं
दोनों हाथ उठाकर
अभी अभी इस काग़ज़ पर गिरी आँसू की बूँद को
साक्षी मानकर कहता हूँ :
इस बरस
पेट्रोल के कुओं में आग लगे
पानी के कुओं में लबालब पानी हो!
(मनमीत सोनी)
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