Tuesday, March 3, 2026
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Poetry by Manmeet Soni: आओ होली के बाद भी होली खेलें

Poetry by Manmeet Soni: सुन्दर रंगों से सजी सार्थक कविता होली पर मनमीत के संग - अनुभव कीजिये शब्दों के भावों के रंग..

Poetry by Manmeet Soni: सुन्दर रंगों से सजी सार्थक कविता होली पर मनमीत के संग – अनुभव कीजिये शब्दों के भावों के रंग..

 

आओ, होली के बाद भी होली खेलें !

दोस्तो!
आप अपनी
हथेलियाँ या गर्दन या पैरों के नाखून देखिये :
उनमें होली के बाद
अब भी
थोड़ा-सा लाल
या काला
या गुलाबी रंग मौजूद होगा!
हम हर होली पर यह सोचते हैं
इस बार पानी से होली नहीं खेलेंगे
लेकिन कोई न कोई
तोड़ ही देता है यह नियम
और फिर हम
पक्के रंगों से होली खेलने लगते हैं
कितनी अच्छी लगती है
पक्के रंग वाली होली
चेहरे पर कस जाता चमड़े-सा कुछ
बालों में मिट्टी-जैसी भर जाती है
दोस्त रगड़ देते हैं
पेट
पीठ
चेहरा
अगवाड़ा
पिछवाड़ा तक
लेटा देते हैं ज़मीन पर साले
गोबर तक से खेली जाती है होली
मिट्टी और कचरे से भी परहेज़ नहीं होता
बनियान फट जाती है
अंडरवियर मुश्किल से बचा पाते हैं हम!
__
कितना भी नहा लो
चाहे कपड़े धोने वाली साबुन लगा लो
लेकिन उतरता ही नहीं रंग
बंदर-सा चेहरा लिया
हम देखते हैं आईना
ऊपर से कहते हैं : “न जाने कैसे उतरेगा रंग?”
भीतर से सोचते हैं : “क्या मस्त होली खेली है?”
अपने आप पर फ़िदा रहते हैं
कम से कम दो-तीन दिन
जब भी हाथ मुँह धोते हैं
अपनी गुलाबी हथेलियों को देखते हैं
याद आ जाती हैं
कितनी सारी होलियाँ!
—-
दोस्तो!
ग़ुलाल की होली
तिलक की होली
फूलों की होली में
वह बात नहीं
जो पक्के रंग की होली में है
होली के बाद भी
पेट और पीठ और गर्दन पर लगा रंग
सफ़ेद बनियान ख़राब कर देता है
लेकिन ख़ुशी होती है सफ़ेद बनियान ख़राब करके
अहा!
कितना महकते हैं हम
यह जानते हुए भी
कि यह पक्के रंग
असली फूलों से नहीं
ख़तरनाक रसायनों से बने हैं!
आज
अब
अभी
चुपचाप बैठा हूँ धुलण्डी के बाद
कमरे में उदास
कि चली गई होली सब रंग लेकर
अपने कान से
झटक रहा हूँ ग़ुलाल
जो नहाते समय साफ़ करना भूल गया था
क्या आप भी भूल गए
कान साफ़ करना
या कान के पीछे की जगह साफ़ करना?
दोस्तो!
मैं इस फेसबुकिया कविता के नीचे
कमेंट बॉक्स में
देखना चाहता हूँ आपके चेहरे
लाल बंदरों जैसे चेहरे
काले भूतों जैसे चेहरे
क्या आप मुझे अपने चेहरे दिखाएंगे?
दोस्तो!
हम सब लोगों के अधिकतर काम
शर्म के मारे मुँह छुपा लेने जैसे हैं
लेकिन होली हमें मौका देती है
एक बार फिर रंग उतारने के बहाने
अपने अपने मुखौटे उतार फेंकने का –
आइये!
उतार फेंकें अपने मुखौटे
सामने आएं एक-दूसरे के
रंगों में रंग घुलने का दिन भले ही गया
लेकिन चेहरों में चेहरे घुलने का मौसम
कभी नहीं जाएगा –
दोस्तो!
आपका चेहरा किस रंग का है?
मेरा तो लाल रंग का है!
आओ दोस्तो!
बचे हुए तीन सौ चौंसठ दिन
इन बचे हुए रंगों से
फिर से होली खेलें हम
एक सच्ची
पंथनिरपेक्ष
जातिरहित
धर्मविहीन
राष्ट्ररहित
नस्लों से परे
महाद्वीपों से ऊपर उठकर :
धरती और आकाश के रंगों की होली!
(मनमीत सोनी)
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