Monday, March 9, 2026
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Poetry by Manmeet Soni: दिमाग़ में गूँजता रहता है बस एक शब्द -बदला !

Poetry by Manmeet Soni:  संवेदना मानव बना देती है पाषाण को..संवेदना के कवि मनमीत की कविता को अनुभव करने हेतु एक संवेदनशील मानव हृदय चाहिये..

Poetry by Manmeet Soni:  संवेदना मानव बना देती है पाषाण को..संवेदना के कवि मनमीत की कविता को अनुभव करने हेतु एक संवेदनशील मानव हृदय चाहिये..

 

महीना भर हो गया था
मेरी शादीशुदा बहिन घर आ कर बैठ गई थी
मैं पूछता था :
“बात क्या हुई है कुछ बता तो सही”
और वह टाल देती थी!
मैंने और माँ ने
बहुत समझाया उसे :
दारू तो आजकल सामान्य बात है!
पी कर तुझे मारते थोड़ी हैं कंवर साब?
लेकिन बहन नहीं मानती थी
कहती थी :
मैंने शादी से पहले
यही शर्त रखी थी
कि दूल्हा दारू पीने वाला नहीं होना चाहिए!
एक दिन देर शाम
धुत्त होकर जीजाजी घर पर ही आ गए
और नाक रगड़ने लगे
बहुत नाक रगड़ी
बहुत माफ़ी मांगी
बहुत हाथ जोड़े
इतना ड्रामा किया कि पिघल गई मेरी बहिन
माँ और पापा ने भी
यही ठीक समझा
कि बात बढ़ाना अच्छी बात नहीं!
_
चली गई बहिन
छह महीने हो गए थे
चहकते हुए फोन करती थी
कहीं कोई शिकायत नहीं
लेकिन मेरा मन कहता था
कोई तो गड़बड़ है!
_
एक दिन
बहन के घर
बिना बताए पहुँच गया मैं
तो देखकर दंग रह गया
दो गिलास पड़े थे पीले रंग के पानी से भरे
जीजाजी ने बिठाया मुझे सामने
भुजिया की प्लेट सरकाई
कटे हुए टमाटर और खीरे आगे रख दिए
और एक टांग पर दूसरी टांग रख कर बोले :
“तेरी बहन कोई सती सावित्री नहीं है हरामज़ादे!”
“और मैं कोई चूतिया नहीं जो बेइज्जती भूल जाऊं!”
_
उस दिन से आज तक
बहन का फोन तो आता है
लेकिन उसकी चहचहाट ग़ायब हो गई है
मेरे दिमाग़ में गूँजता रहता है
बस एक शब्द :
बदला! बदला! बदला! बदला!
(मनमीत सोनी)
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