Poetry by Manmeet Soni: जीवन के वृत्त में अन्तर्मन का कोना सदा स्याह अंधेरों की चादर से ढका होता है..वहाँ पहुंच कर संबन्धों के सच को कौन भाँप सकता है, पढ़िये मनमीत की कलम का मनोवैज्ञानिक कवित्त..
बड़े ख़ुश हैं आप
आपको फिर एक शिकार मिल गया –
मिल गया
एक और मछुआरा
किसी सुनहरी मछली के जाल में तड़पता हुआ
—
अब आप चीख़ चीख़ कर कहेंगे :
जवाहर लाल नेहरू – एडविना माउन्टबेटन
बिल क्लिंटन – मोनिका लेवेंसकी
जॉन एफ कैनेडी – मरलिन मुनरो
फ़्रांस्वा ओलांद – जूली गाये
शशि थरूर – सुनंदा पुष्कर
दिग्विजय सिंह – अमृता राय
और अब
नरेन्द्र मोदी – फ़लानी / फ़लानी / फ़लानी
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कितना भयानक समय है
मछलियों के बयानों पर हँसी आती है
विश्वास करने का मन नहीं करता
कि इन्हें फंसाया गया होगा जाल में
—
कौन घुस सका है
स्त्री और पुरुष के मन में
कौन झाँक सका है
चद्दर के नीचे किसने किसे कहाँ चूमा
कौन जान सका है
किसने किसे पहली बार क्या कहा
कौन गारंटी से कह सकता है
किसकी महक से कौन हुआ पागल
कौन एफिडेविट दे सकता है
किसका मन किससे भर गया
और किसने किसे किसलिए छोड़ दिया
—
इतना रहस्य
इतनी हिंसा
इतनी नीचता
इतनी कमीनगी
इतनी हरामज़दगी होती है स्त्री – पुरुष के संबंध में
कि समंदर को स्याही करें
और धरती को काग़ज़
तब भी नहीं लिखा जा सकता पूरा का पूरा सच
—
ऐसा कौन विवाहित है
जिसका अपने मोहल्ले और गाँव में चक्कर नहीं चला
ऐसी कौन सुहागिन है
जिसकी जांघ पर विवाह से पहले
अपने ही नाखूनों के निशान नहीं
ऐसा कौन किशोर है
जो आधी रात को
उठकर बिस्तर से भागा नहीं
कि साली चड्डी गीली हो गई
ऐसी कौन किशोरी है
जिसके पेट में मरोड़ न उठे हों
जिसकी अंगड़ाई ने
सफ़ेद घोड़े पर सवार राजकुमार को
बांहों के धनुष में नहीं कस लिया हो
और-तो-और
ऐसा कौन नपुंसक है
जिसके भीतर न धधकी हो ज्वाला
जिसने सीने के बाल न नोंच लिए हों
उपाड़ न लिए हों सर के बाल
—
किस रमेश का किस सुनीता से
किस सुनीता का किस विक्रम से
किस विक्रम का किस विनीता से
किस विनीता का किस सुनील से
किस सुनील का किस लक्ष्मी से
किस लक्ष्मी का किस राजू से चक्कर नहीं चला?
—
हुआ तो यहाँ तक है
होता ही आया है
आगे भी होता ही रहेगा
कि सुनीता का विनीता से
कि सुनील का रमेश से भी चक्कर चलेगा
कौन समझ सका है
मस्तिष्क के रसायनों का खेल
कौन गिरफ्तार नहीं हुआ
पसीनों की कच्ची नर्म धाँस वाली खुशबुओं में
—
सच पूछिए तो
डर लगने लगा है प्यार करने में
किसी के हाथ चूमकर
उसे अपना बनाने का मन करता है
तो डर लगता है
वह यह नहीं कह दे :
मेरे अन्तर्वस्त्रों में हाथ डाल दिया इसने!
ट्रेन में सामने की सीट पर बैठी हुई बच्ची को
टॉफी तक नहीं दे सकते आप
उसकी मम्मी कह सकती है :
“आप इसे बेहोश करके
इसका फ़ायदा उठाना चाहते थे!”
कम होते जा रहे हैं प्रेमी
कतराने लगे हैं लड़के-लड़कियाँ एक दूसरे से
आदर्शों की हिंसा से भर गया है समाज
गुलाब बेवजह खिल रहे हैं
वसंत का मतलब नहीं रह गया
बारिश होती है तो शोले नहीं भड़कते सीने में
—
ज़बरदस्ती
ज़बरदस्ती
ज़बरदस्ती
माफ़ कीजिये देवियो!
इतनी ज़बरदस्ती भी नहीं हुई है अभी
कि सब पर शक किया जाए
कि सबके माथे पर लिख दिया जाए
सब मर्द साले एक जैसे होते हैं
जीवन
फेसबुक का इनबॉक्स नहीं है
कि स्क्रीनशॉट स्क्रीनशॉट खेलकर
बटोरे जाएं लाइक्स और कमेंट्स
उन निर्वीर्य कमीनों से दूर रहिये
जो फैला रहे हैं अफवाहें
कि चारों ओर बलात्कार ही बलात्कार हैं
—
दोस्तो!
सबके होते हैं दो चेहरे
मेरे भी हैं
आपके भी हैं
इन दो चेहरों की वजह से ही
माँ के धोक खाई जाती है
और पत्नी को चूमा जाता है
इन दो चेहरों की वजह से ही
पिता के आगे हाथ जोड़े जाते हैं
और दोस्तों की पेंट तक खोल दी जाती है
इन दो चेहरों की वजह से ही
ख़ुद की बहन इज़्ज़तदार लगती है
और दूसरे की बहन पटाखा
इन दो चेहरों की वजह से ही
बहुत रंगीन है यह दुनिया
एक चेहरा इस दुनिया को बीमार कर देगा
—
रहने दीजिये
नेहरू के दिल में थोड़ी-सी एडविना
रहने दीजिये
शाहिद कपूर के दिल में थोड़ी-सी करीना
रहने दीजिये
ऐश्वर्या राय के दिल में
सलमान खान के नाम की कसक
रहने दीजिये
मनमीत के दिल में
पूर्व प्रेमिकाओं के स्क्रीनशॉट्स
—
ओ दुनिया!
धड़ के ऊपर की तस्वीर लेनी सीख!
धड़ के नीचे
हम सभी एक जैसे हैं :
नंगे
कमीने
हरामज़ादे
बेशर्म
लोलुप
कामुक
और
कुंठित!
ओ दुनिया!
धड़ के ऊपर की तस्वीर लेनी सीख!
(मनमीत सोनी)



