Supreme Court: गलतफहमी से हुआ सब कुछ – पर क्या हुआ ये पता नहीं – दुष्कर्म हुआ या शादी का वादा हुआ या शादी की उम्मीद हुई? – जो भी हुआ अब आरोपी प्रसन्न है..
भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने एक अहम फैसले में बलात्कार के एक मामले में दोषी ठहराए गए युवक की सजा और दोषसिद्धि को रद्द कर दिया है। यह फैसला उस स्थिति में दिया गया, जब यह सामने आया कि आरोपी युवक और शिकायतकर्ता युवती ने बाद में आपस में विवाह कर लिया था।
अदालत ने अपने आदेश में कहा कि उसे अपने “छठे इंद्रिय बोध” से यह महसूस हुआ कि दोनों के बीच फिर से मेल-मिलाप और एक सुखद दांपत्य जीवन की संभावना मौजूद है। शीर्ष अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि दोनों के बीच बना संबंध आपसी सहमति पर आधारित था और एक गलतफहमी के कारण आपराधिक शिकायत दर्ज कराई गई थी।
पक्षकारों की पृष्ठभूमि
युवक और युवती की पहली मुलाकात वर्ष 2015 में एक सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के माध्यम से हुई थी। धीरे-धीरे दोनों के बीच दोस्ती गहरी होती गई और आगे चलकर उनका शारीरिक संबंध भी आपसी सहमति से स्थापित हुआ।
विवाद की वजह
कुछ समय बाद युवती को यह आशंका होने लगी कि युवक ने उससे विवाह का झूठा वादा किया है। साथ ही युवक द्वारा शादी की तारीख आगे बढ़ाने की बात कहे जाने से युवती को असुरक्षा की भावना हुई। इसी मानसिक दबाव और भ्रम के चलते युवती ने नवंबर 2021 में युवक के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज करा दिया।
निचली अदालत का फैसला
मामले की सुनवाई के बाद ट्रायल कोर्ट ने युवक को दोषी करार देते हुए उसे दस वर्षों के कठोर कारावास की सजा सुनाई। इसके बाद युवक ने हाई कोर्ट में सजा पर रोक लगाने की अपील की, लेकिन वहां से भी उसे कोई राहत नहीं मिली।
सुप्रीम कोर्ट की दखलअंदाजी
इसके बाद युवक ने सर्वोच्च न्यायालय का रुख किया। सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने न केवल दोनों पक्षों से बातचीत की, बल्कि उनके माता-पिता से भी संवाद किया। इस बातचीत के आधार पर अदालत को यह आभास हुआ कि दोनों के बीच समझौते और सुखद वैवाहिक जीवन की पूरी संभावना है। इसी के मद्देनज़र अदालत ने युवक को अंतरिम जमानत प्रदान की, जिसके बाद दोनों ने जुलाई 2025 में विवाह कर लिया।
अंतिम निर्णय
दिसंबर 2025 में दिए गए अपने अंतिम फैसले में सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत “पूर्ण न्याय” करने की अपनी विशेष शक्तियों का प्रयोग करते हुए युवक की दोषसिद्धि, सजा और मूल पुलिस शिकायत (एफआईआर) को निरस्त कर दिया। अदालत ने यह भी आदेश दिया कि युवक की सरकारी नौकरी बहाल की जाए और उसे बकाया वेतन का भुगतान भी किया जाए।
अदालत ने यह स्पष्ट किया कि यह एक असाधारण मामला था, जिसमें आपसी सहमति से बने संबंध को एक गलतफहमी के कारण विवाह के झूठे वादे के रूप में समझ लिया गया और उसी भ्रम के चलते आपराधिक कार्रवाई की गई।



