Chicken Neck देश की सुरक्षा के लिये बहुत महत्वपूर्ण – असम के जंगलों में बनेगा भूमिगत हथियार भंडारण केंद्र, केंद्र सरकार ने दे दी है रणनीतिक मंजूरी..
भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा को नई मजबूती देने की दिशा में केंद्र सरकार ने एक अत्यंत अहम और दूरगामी फैसला लिया है। असम के मोरीगांव जिले में स्थित सोनाकुची रिजर्व फॉरेस्ट के 299 हेक्टेयर क्षेत्र को एक टनल-आधारित भूमिगत हथियार भंडारण सुविधा के लिए सैद्धांतिक (इन-प्रिंसिपल) मंजूरी दे दी गई है। यह परियोजना देश के उस बेहद संवेदनशील भू-भाग से सीधे जुड़ी हुई है, जिसे रणनीतिक भाषा में ‘चिकन नेक कॉरिडोर’ कहा जाता है—वही संकरा गलियारा जो पूरे पूर्वोत्तर भारत को शेष देश से जोड़ता है।
बदलते भू-राजनीतिक हालात में बड़ा रणनीतिक कदम
केंद्र सरकार ने स्पष्ट किया है कि पूर्वी थिएटर में बदलते अंतरराष्ट्रीय और क्षेत्रीय समीकरणों, सीमा पर बढ़ती अस्थिरता और चीन से जुड़ी सुरक्षा चुनौतियों को देखते हुए यह परियोजना अत्यंत रणनीतिक महत्व रखती है। इस अंडरग्राउंड हथियार भंडारण नेटवर्क के जरिए भारत की त्वरित सैन्य प्रतिक्रिया क्षमता को कई गुना मजबूत किया जाएगा। प्रस्तावित स्टोरेज सिस्टम को एयर फोर्स स्टेशन दिगारू से जोड़ा गया है, जिससे भविष्य में पूर्वी सेक्टर और चीन सीमा पर सैन्य तैयारियों को और मजबूती मिलेगी।
क्या है ‘पाताल लोक’ जैसा यह गुप्त सैन्य ढांचा?
इस परियोजना के तहत कुल 299 हेक्टेयर वन भूमि का उपयोग किया जाएगा। इसमें से लगभग 265.513 हेक्टेयर क्षेत्र में भूमिगत हथियार भंडारण सुरंगें बनाई जाएंगी, जबकि 33.688 हेक्टेयर भूमि पर सतही ढांचे जैसे प्रशासनिक भवन, सुरक्षा चौकियां, बाड़बंदी और संपर्क सड़कें विकसित की जाएंगी। राहत की बात यह है कि यह पूरा क्षेत्र किसी भी संरक्षित वन्यजीव अभयारण्य या ऐतिहासिक धरोहर स्थल से 10 किलोमीटर के दायरे में नहीं आता।
परियोजना के लिए लगभग 203 पेड़ों के कटान का अनुमान लगाया गया है, जिसकी भरपाई के लिए राज्य सरकार ने बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण की योजना प्रस्तुत की है।
क्यों जरूरी है यह भूमिगत हथियार भंडारण केंद्र?
सरकारी समिति को दी गई जानकारी के अनुसार, भूमिगत हथियार भंडारण से कई बड़े सामरिक लाभ मिलेंगे—
-हथियार और संवेदनशील सैन्य सामग्री दुश्मन की नजर, सैटेलाइट निगरानी और हवाई हमलों से सुरक्षित रहेंगी।
-आपात स्थिति या युद्ध के समय हथियारों की त्वरित तैनाती संभव होगी।
-पूर्वी थिएटर में किसी भी अस्थिरता की स्थिति में भारत की सैन्य तैयारी कहीं अधिक प्रभावी होगी।
-सेना और वायुसेना की लॉजिस्टिक सप्लाई चेन को अभूतपूर्व मजबूती मिलेगी।
इस तरह यह परियोजना केवल एक सैन्य ढांचा नहीं, बल्कि पूर्वोत्तर भारत में दीर्घकालिक सुरक्षा रणनीति का अहम हिस्सा मानी जा रही है।
पर्यावरण संतुलन और वन्यजीव सुरक्षा पर भी जोर
राज्य सरकार ने बताया है कि 85.75 हेक्टेयर क्षेत्र में काटे जाने वाले पेड़ों की भरपाई के लिए नए पौधे लगाए जाएंगे। इसमें से 68 हेक्टेयर भूमि को वृक्षारोपण के लिए उपयुक्त माना गया है और इसके लिए 10 वर्षों की रखरखाव योजना भी तैयार की गई है। निरीक्षण के दौरान कुछ स्थानों पर कच्चे रास्ते और खेती के निशान मिले थे, लेकिन राज्य सरकार ने स्पष्ट किया है कि ये वन गश्त मार्ग हैं और किसी भी प्रकार का अवैध अतिक्रमण हटाया जाएगा।
केंद्र सरकार की सख्त शर्तें
परियोजना को मंजूरी देते समय केंद्र ने कई अहम शर्तें भी तय की हैं—
-एक विस्तृत वन्यजीव संरक्षण योजना लागू की जाए।
-मानव–हाथी संघर्ष को रोकने के लिए विशेष उपाय किए जाएं।
-प्राकृतिक जल स्रोतों की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए और आवश्यकता पड़ने पर वैकल्पिक जलाशय विकसित किए जाएं।
-वन्यजीवों की प्राकृतिक आवाजाही किसी भी हालत में बाधित न हो।
-खुदाई से निकलने वाले मलबे के वैज्ञानिक निपटान और ढलानों के स्थिरीकरण की पुख्ता व्यवस्था की जाए।
भारत की सुरक्षा रणनीति में क्यों माना जा रहा है ‘गेम चेंजर’?
पूर्वोत्तर भारत में बढ़ते सामरिक दबाव, सीमा पर चीन की सक्रियता और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र की अनिश्चितता के बीच यह भूमिगत हथियार भंडारण सुविधा भारत के लिए कई स्तरों पर निर्णायक साबित हो सकती है। यह परियोजना—
-सैटेलाइट और हवाई निगरानी से बचाव प्रदान करेगी।
-युद्धकाल में तेज और सुरक्षित लॉजिस्टिक समर्थन देगी।
-हथियारों और सैन्य संसाधनों की सुरक्षा को बहुस्तरीय बनाएगी।
-पूर्वी थिएटर में स्थिरता और संतुलन कायम करने में अहम भूमिका निभाएगी।
-‘चिकन नेक’ जैसे संवेदनशील इलाके को मजबूत बैकअप सुरक्षा देगी।
इसी वजह से इस परियोजना को भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा नीति का एक मजबूत स्तंभ माना जा रहा है, जो आने वाले वर्षों में पूर्वोत्तर की सामरिक तस्वीर को पूरी तरह बदल सकता है।



