International Migrants Day 2025: कौन-सा धर्म सबसे ज्यादा करता है देश छोड़ने का फैसला? चौंकाने वाले वैश्विक आंकड़े खोलते हैं बड़ी सच्चाई..
हर साल 18 दिसंबर को अंतरराष्ट्रीय माइग्रेंट डे (International Migrants Day) मनाया जाता है। यह दिन उन करोड़ों लोगों की याद दिलाता है, जो बेहतर जीवन, सुरक्षा, स्वतंत्रता और अवसरों की तलाश में अपना देश छोड़कर दूसरी भूमि पर बस जाते हैं। हालिया वैश्विक अध्ययनों और सर्वेक्षणों से सामने आया है कि प्रवासन के पीछे सिर्फ आर्थिक कारण ही नहीं, बल्कि धार्मिक उत्पीड़न, वैचारिक स्वतंत्रता और व्यक्तिगत आस्था से जुड़े फैसले भी बड़ी भूमिका निभा रहे हैं।
इन आंकड़ों में सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि अलग-अलग धर्मों में प्रवासन और धर्म से दूरी बनाने का पैटर्न समान नहीं है। कुछ समुदायों में देश छोड़ने और धर्म से अलग होने की प्रवृत्ति कहीं अधिक दिखाई देती है।
प्रवास और आस्था: हर धर्म में अलग-अलग रुझान
दुनिया भर में प्रवासियों की संख्या लगातार बढ़ रही है, लेकिन यह बढ़ोतरी सभी धार्मिक समूहों में एक जैसी नहीं है। Pew Research Center सहित कई अंतरराष्ट्रीय अध्ययनों के अनुसार, ईसाई समुदाय के लोगों में अपने मूल देश को छोड़ने की दर अन्य धर्मों की तुलना में अधिक देखी जा रही है।
सिर्फ इतना ही नहीं, पश्चिमी देशों में बसने के बाद ईसाई समुदाय के एक बड़े वर्ग में अपने पारंपरिक धर्म से दूरी बनाने की प्रवृत्ति भी सामने आ रही है। यूरोप और अमेरिका में खासतौर पर युवा और शिक्षित ईसाई आबादी “नो रिलिजन” या नास्तिक श्रेणी में शामिल होती जा रही है।
इसके पीछे प्रमुख कारणों में उच्च शिक्षा, व्यक्तिगत स्वतंत्रता, आधुनिक जीवनशैली और धार्मिक परंपराओं को लेकर सवाल उठाने की प्रवृत्ति को माना जा रहा है।
कौन-से धर्म के लोग कम छोड़ते हैं अपना देश और आस्था?
जहां ईसाई समुदाय में प्रवासन और धर्म परिवर्तन की दर अपेक्षाकृत अधिक दिखती है, वहीं हिंदू और मुस्लिम समुदायों में यह प्रवृत्ति काफी कम पाई गई है।
हिंदू प्रवासी मुख्य रूप से आर्थिक प्रगति, करियर और बेहतर शिक्षा के लिए अमेरिका, कनाडा, यूरोप और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों की ओर जाते हैं। हालांकि, विदेश में बसने के बावजूद वे अपनी धार्मिक पहचान, परंपराओं और त्योहारों से जुड़े रहते हैं।
इसी तरह, दक्षिण एशिया और मध्य-पूर्व से आने वाले मुस्लिम प्रवासी भी नए सामाजिक और आर्थिक परिवेश में ढलते हुए अपनी धार्मिक आस्था को बनाए रखते हैं और सामुदायिक पहचान को महत्व देते हैं।
ईसाई समुदाय: प्रवासन के साथ बदलती धार्मिक पहचान
मध्य-पूर्व और कई मुस्लिम बहुल देशों में रहने वाले ईसाई अल्पसंख्यकों को लंबे समय से भेदभाव और धार्मिक उत्पीड़न का सामना करना पड़ता रहा है। इसी वजह से बड़ी संख्या में ईसाई परिवार यूरोप, अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में पलायन कर रहे हैं।
वहीं, पश्चिमी देशों में पहले से बसे ईसाई समुदाय के भीतर भी एक अलग बदलाव देखने को मिल रहा है। धार्मिक रूढ़िवादिता, संस्थागत चर्च व्यवस्था और सामाजिक दबावों से असहमति के कारण कई लोग अपने पारंपरिक धर्म से दूरी बना रहे हैं। इसे आधुनिक सोच, व्यक्तिगत आज़ादी और आत्मनिर्णय का प्रतीक माना जा रहा है।
अन्य धर्मों में क्या है स्थिति?
बौद्ध समुदाय में भी कुछ देशों, खासकर दक्षिण कोरिया जैसे विकसित एशियाई देशों में, धार्मिक पहचान से दूरी का रुझान सामने आया है। यहां आर्थिक प्रतिस्पर्धा, शिक्षा और शहरी जीवनशैली इसके प्रमुख कारण माने जाते हैं।
इसके उलट, हिंदू और मुस्लिम प्रवासी अपने धार्मिक त्योहारों, सांस्कृतिक परंपराओं और सामुदायिक जुड़ाव को विदेशों में भी जीवित रखते हैं। मंदिर, मस्जिद, धार्मिक सभाएं और सामुदायिक कार्यक्रम उनकी पहचान का अहम हिस्सा बने रहते हैं।
शरणार्थियों के रूप में यह मजहब है सबसे ऊपर
शर्णार्थियों के तौर पर यूरोप, अमेरिका और कनाडा जैसे धनी कांटीनेन्ट्स में सर्वाधिक आने वालों की संख्या जिस मजहब से जुड़ी है वो है इस्लाम। यद्यपि खाड़ी देशों में मुस्लिम जनसंख्या शरणार्थियों के रूप में बहुत कम देखी जाती है परंतु यूरोप और अमेरिका में अथवा दुनिया के स्तर पर सबसे अधिक शरणार्थी मुस्लिम ही देखे जाते हैं।
अंततोगत्वा कहा जा सकता है कि
अंतरराष्ट्रीय माइग्रेंट डे के मौके पर सामने आए ये आंकड़े यह साफ करते हैं कि प्रवासन केवल सीमाएं पार करने की कहानी नहीं है, बल्कि यह पहचान, आस्था और सोच में होने वाले गहरे बदलावों को भी दर्शाता है। जहां कुछ समुदायों में देश छोड़ने के साथ-साथ धर्म से दूरी बढ़ रही है, वहीं कुछ धर्मों में प्रवासन के बावजूद आस्था और परंपराएं मजबूती से बनी हुई हैं।
(एनएचजी ब्यूरो)



