Chandra Shekhar Azad की एक शानदार याद जो बताती है भारत माता के लाल कितने उत्कृष्ठ चरित्र के संदेशवाहक थे..
एक अंग्रेज अफसर ने चन्द्र शेखर आज़ाद के बारे में लिखा हैं कि मैं रेलवे क्रोसिंग पर चेकिंग कर रहा था। सूचना मिली कि आजाद शहर मे हैं। दो थानो की मय फोर्स भी साथ थी। आजाद बुलेट से रुकते हैं, मैं उनको जाने देता हूँ। तभी साथी मातहत सिपाही टोकता हैं, साहब ये पण्डित जी ही हैं। कांधे पे जनेऊ, तगड़ी कद काठी, रौबदार मूछे बस आजाद की ही हो सकती हैं।
ये सुन कर उस अंग्रेज अफसर ने भारतीय सिपाही से मुखातिब होते हुए कहा था कि मुझे अपनी जान की परवाह नही हैं। हां पर इस तरह के अकेले बागी को रोकने के लिये ये फोर्स काफी नही हैं।
कानपुर मे अपने भूमिगत रहने के दौरान आजाद एक जगह किराये का रूम लेकर स्टूडेंट बनकर रहते थे। आसपास कई परिवार और कुछेक स्टूडेंट भी किराये पर रहते थे। परिवार लेकर रहने वाले लोग ज्यादेतर कानपुर मे जॉब ही करते थे। उन दिनों कानपुर और कोलकाता हब भी था।
आजाद अकेले रहने के कारण कई बार एक टाइम खाना बनाते और एक टाइम नही बनाते थे। जब उनके रूम से स्टोप जलने की आवाज नही आती तो बगल मे रहने वाली एक महिला उनको खाना देने आती थी। वो शिष्टाचार के साथ दोनो हाथ जोड़ मना कर देते थे।
आजाद गम्भीर व्यक्तित्व के धनी थे। मोहल्ले के लोग उस महिला के पति के शराब पीकर अपने पत्नी से झगड़ा करने, मारपीट करने और उनके बच्चों के रोने के कारणों से त्रस्त भी थे। हाँ पर कोई उस महानगरीय वातावरण मे उनका निजी मामला होने के कारण उनको कुछ बोलता नही था।
ऐसे ही एक रोज उस महिला का पति शराब पीकर अपनी पत्नी से लड़ रहा था तो आजाद वहाँ धमक पड़े थे। किसी से कभी न बोलने वाले आजाद को देख उस महिला के पति की सिट्टी पिट्टी गुम हो गयी थी। जैसे ही बोला तुम कौन होते हो, हमारे बीच दखल देने वाले, आजाद ने बोला, ये मेरी बहन हैं, कभी गलती से भी हाथ उठाये तो हाथ तोड़ दूसरे हाथ मे पकड़ा दूँगा।
पहली बार मोहल्ले के लोगो ने आजाद की आवाज सुनी थी। फिर ये ड्रामा भी बंद हो गया। जब कभी उनके कमरे से स्टोप जलने की आवाज नही आती तो उस महिला का पति अपने बच्चो से या पत्नी से उनको खाना भी भेजवा दिया करता, आलसी पर स्वाभिमानी आजाद हर बार की तरह शिष्टाचार के साथ मना कर देते थे।
फरारी के दिनों मे एक बार पूरे शहर मे नाकाबंदी थी। रात छिपने के लिये आजाद एक वृद्ध महिला के घर मे आसरा लेते हैं। घर मे बस माँ बेटी दो ही लोग थे। माता जी ने आजाद को आसरा तो दे दिया हैं पर उनकी रात की नींद उचट गई। घर में जवान लड़की है, ऐसे में एक अजनबी को घर पर रात में ठहराने में खतरा तो है।
आजाद परिस्थिति को बिन बोले ही समझ गये। वे माता जी के पास आये और उन्होंने माता जी से कहा – यदि आप भी मुझे अंग्रेजी सरकार की तरह समझती हैं तो अभी पुलिस बुलाकर गिरफ्तार करा दीजिये। ईनाम के पैसे से आप मेरी बहन की शादी भी कर दीजियेगा।
यह सुन कर माता जी रोने लगीं। उन्होंने कहा – अरे पागल, मैं देशद्रोही नही हूँ, बस एक माँ हूँ, तुम नही समझोगे। खैर मैं भूल गयी थी मेरा पाला एक पण्डित से पड़ा हैं।
सुबह जब माता जी की नींद खुली तब तक आजाद जा चुके थे। उनके बिस्तर पर तकिये के नीचे एक चिट्ठी उनको मिली। माता जी ने चिट्ठी अपनी लड़की को देकर उसे पढ़ने के लिये कहा। आजाद रात भर मे उस घर की कहानी समझ चुके थे। चिट्ठी में लिखा था कि दस हजार की छोटी सी रकम अपनी बहना की शादी के लिये – सादर चरण स्पर्श सहित माताजी आपका आजाद।
भगत सिंह से जेल मे लोग पूछते थे कि आजाद दिखते कैसे हैं ? आजाद की कोई फोटू अंग्रेजी खुफिया ब्यूरो फोब्स 32 के पास भी नही थी। एक मोछ पर ताव देते हुए उनके साथी द्वारा खिंची पिक ही पब्लिक डोमेन में थी।
भगत सिंह ने बोला था, जो कभी गम्भीरता ओढ़े कभी गलती से हँसता भी न हो, इरादे फौलादी पर अंदर से मोम हो, समझ लेना आजाद हैं।
आज हम इस दुनिया की चकाचौंध में उन लोगों को भूल गए है जिनकी वजह से हम खुलकर जिंदगी जी रहे है, जिनकी वजह से हमने आजादी पाई लेकिन अफसोस हम उनके बलिदान पर 2 शब्द नहीं लिख सकते।
(अज्ञात वीर)



