Freedom Fighters-2: जिन्हें नाज़ है हिन्द पर वो कहाँ हैं? – कुछ याद उन्हें भी कर लो जो लौट के घर न आये..ये है हमारे क्रान्तिवीर बाघा जतीन की सच्ची कहानी..
उनका शरीर हड्डियों के ढांचे में बदल चुका था। मांस गल चुका था, पसलियाँ साफ दिखाई देने लगी थीं और अब उनके पास इतना बल भी नहीं बचा था कि वे खुद को बिस्तर पर सीधा रख सकें। लेकिन उनकी आत्मा अभी भी उतनी ही अडिग थी जितनी पहले दिन थी।
जब अंग्रेजी हुकूमत ने देखा कि यह 25 वर्ष का युवक अपने इरादे से टस से मस नहीं हो रहा, तो उन्होंने अमानवीय तरीकों का सहारा लिया। जेल अधिकारियों ने जबरन उनकी नाक में एक नली डालकर दूध पिलाने की कोशिश की, लेकिन नली गलती से श्वसन नली में चली गई। परिणामस्वरूप दूध उनके फेफड़ों में भर गया। वे असहनीय पीड़ा से तड़पते रहे, खून की उल्टियाँ हुईं, लेकिन उन्होंने अपना अनशन नहीं तोड़ा।
13 सितंबर 1929 को लाहौर जेल के भीतर एक क्रांतिकारी ने देश की गरिमा के लिए अपने प्राण त्याग दिए। यह कोई एक-दो दिन का उपवास नहीं था — यतींद्र नाथ दास लगातार 63 दिनों तक बिना एक दाना अन्न ग्रहण किए रहे।
इतिहास अक्सर भगत सिंह की फांसी को याद करता है, लेकिन उसी जेल में शहीद हुए उस साथी को भूल जाता है जिसने भगत सिंह की गोद में दम तोड़ा था। वही थे यतींद्र नाथ दास, जिन्हें पूरा देश प्यार से ‘जतिन दा’ कहता था।
पेशे से वे विस्फोटक निर्माण में निपुण थे, लेकिन जब हथियार छीन लिए गए, तो उन्होंने अपने शरीर को ही संघर्ष का माध्यम बना लिया। वे चाहें तो माफी माँगकर, खाना खाकर जीवन बचा सकते थे, लेकिन उनकी केवल एक मांग थी — भारतीय राजनीतिक कैदियों के साथ हो रहे अमानवीय व्यवहार को तुरंत रोका जाए।
अंग्रेजों को विश्वास था कि भूख उन्हें तोड़ देगी, लेकिन वे नहीं समझ पाए कि यह देह मिट्टी की नहीं, बल्कि संकल्प की बनी हुई थी।
जैसे-जैसे उनकी हालत गंभीर होती गई, अंग्रेजी प्रशासन की क्रूरता भी बढ़ती गई। जेल के डॉक्टरों और सिपाहियों ने उन्हें पकड़कर नाक से नली डालने की कोशिश की। दर्द असहनीय था, चीखें गूंज उठीं, लेकिन उनका आत्मबल नहीं टूटा।
जब उनकी शहादत की खबर जेल की दीवारों से बाहर पहुँची, तो पूरे देश में शोक की लहर दौड़ गई। कहा जाता है कि जब उनका पार्थिव शरीर लाहौर से कोलकाता ले जाया गया, तो हर रेलवे स्टेशन पर हजारों लोग फूलों के साथ उन्हें अंतिम प्रणाम करने के लिए खड़े थे। कोलकाता में उनकी अंतिम यात्रा में छह लाख से अधिक लोग शामिल हुए।
स्वतंत्रता संग्राम के महान नेता सुभाष चंद्र बोस ने स्वयं उनके पार्थिव शरीर को कंधा दिया था।
आज सवाल यह है कि क्या हम उस 63 दिनों की तपस्या को सच में याद करते हैं?
मरते समय जतिन दा ने कहा था – “मैं कोई साधु नहीं हूँ, मैं केवल एक सामान्य व्यक्ति हूँ, जो अपने देश के सम्मान के लिए प्राण देना चाहता है।”
यह बहस हो सकती है कि आज़ादी किस मार्ग से आई, लेकिन यह सच्चाई अटल है कि स्वतंत्रता की नींव में यतींद्र नाथ दास जैसे अनगिनत युवाओं की कुर्बानियाँ दबी हुई हैं।
हमें यह स्वतंत्रता की सांसें आज अंग्रेजों से उपहार में नहीं मिली हैं। किसी ने अपने जीवन के 63 दिन भूख में गुज़ार कर इसे सींचा है। हम सभी भारतीयों का कर्तव्य है कि हम समजें कि जिस स्वतंत्र हवा में हम आज साँसें ले रहे हैं, उसकी कीमत क्या रही है।
यह लेख उन्हीं भूले-बिसरे क्रान्तिवीरों को देश के प्रत्येक राष्ट्रभक्त की अश्रुपूरित श्रद्धांजलि है, जिनके बलिदान पर आज का भारत खड़ा है। इसे साझा करें, ताकि आने वाली पीढ़ियाँ जान सकें कि हमारे असली नायक दरअसल कौन थे।
(प्रस्तुति – त्रिपाठी पारिजात)



