Battle of Panipat: ऐसा लगता है कि पानीपत की अहम लड़ाई में हार का कारण लापरवाही ज्यादा था..और शायद यही लापरवाही आजके भारत की पराजय का कारण न बन जाये..
मराठा वीर तो थे मगर रणनीतिक रूप से उतने कुशल नहीं थे जितनी आवश्यकता थी। आत्ममुग्धता में मस्त होने के कारण उन्हें पानीपत के मैदान में अहमद शाह अब्दाली के साथ मुकाबले में मुंह की खानी पड़ी। इनकी वीरता की प्रषंसा करने की बजाय इस पहलू पर गम्भीरता से चिंतन और मनन करने की जरूरत है कि मराठे संख्या में अधिक होते हुए भी पानीपत के मैदान में क्यों हारे?
भारतीय इतिहास के इस महत्वपूर्ण युद्ध की रणनीति का विष्लेषण करने के बाद कुछ सूत्र ऐसे हैं जिनको नजरअंदाज करना घातक है:
कारण प्रथम
मराठाओं ने पहली बार परम्परागत गुरिल्ला युद्ध को छोड़कर मैदान में युद्ध लड़ा मगर उसके लिए प्रर्याप्त तैयारी नहीं थी।
कारण द्वितीय
पहली बार मराठा महिला और बच्चों को भी युद्ध भूमि में साथ लाए। कुरूक्षेत्र के समीप दस हजार महिला और बच्चों का उन्होंने जो शिविर स्थापित किया था उनकी सुरक्षा की कोई व्यवस्था नहीं की जिसके कारण अब्दाली ने युद्ध से एक महीने पूर्व ही इन सभी महिलाओं और बच्चों को बंदी बना लिया। इससे मराठा सैनिकों के मनोबल को भारी धक्का लगा।
कारण तृतीय
मराठा सिपाहसलार सदाशिवराव भाउ वीर तो था मगर बेहद अहंकारी और दंभी था। इसलिए उसने किसी भी भारतीय राजा से सहायता लेने का प्रयास नहीं किया। भरतपुर नरेश सूरजमल को अपमानित करके युद्ध भूमि से वापस लौटने पर विवश कर दिया।
कारण चतुर्थ
इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि विभिन्न मराठा सरदार पेशवा श्रीमंत की बढ़ती हुई शक्ति से भयभीत थे। इसलिए उन्होंने पानीपत के मैदान में मराठाओं की हार के लिए परोक्ष रूप से भारी भूमिका निभाई। इसका संकेत इस बात से मिलता है कि होलकर के जिन पठानों को दिल्ली और पानीपत के बीच रसद की सप्लाई की सप्लाई की जिम्मेवारी सौंपी गई थी वह अब्दाली से मिल गए और रसद की सप्लाई ठप हो गई जिससे मराठा शिविर में भीषण अकाल की स्थिति उत्पन्न हो गई जो कि मराठाओं के हार का मुख्य कारण बनी।
कारण पंचम
मराठे एक महीने तक पानीपत में डेरा डाले रहे। उन्होंने अब्दाली के शिविर पर धावा बोलने का कोई प्रयास नहीं किया। बाद में अकाल और वर्षा से दुखी होकर उन्हें युद्ध करना पड़ा जिसके लिए वे मानसिक रूप से तैयार नहीं थे।
कारण षष्ठम
पेशवा दरबार में भी कई तत्व ऐसे थे जो यह नहीं चाहते थे कि पानीपत के मैदान में मराठाओं की विजय हो। इसलिए उन्होंने इस बात का पूरा प्रयास किया कि पेशवा श्रीमंत पानीपत में और सेना न भेजे। यही मोटे कारण थे जिनके कारण मराठाओं का भारत में हिंदवी साम्राज्य स्थापित करने का स्वपन धूल में मिल गया।
यह भी जानना आवश्यक है कि वलीउल्लाह ने उत्तर भारत के सभी मुसलमान शासकों और उललमा को वयक्तिगत से मिल कर और पत्र लिखकर मराठो के खिलाफ और अबबदाली के समर्थन में एक जुट कर दिया था। जब कि मराठो कौ अकेले ही उन का सामना करना पडा़। किसी हिन्दू शासक ने उन का साथ नहीं दिया। सभी राजपूत, जाट और गुजर तमाशा देखते रहे। जहाँ तक सिक्खों का संबंध है, उनहोंने खुल कर अबबदाली का साथ दिया। पांच प्रमुख सिक्ख राजाओं ने अबबदाली से नवाबी की खिलातें और जागीरें ली और बदले में युद्ध उनकी में सहायता भी की। सब से गंभीर बात यह है कि कुछ प्रमुख मराठा सेनापतियों ने पेशवा के खिलाफ अब्दाली से गुप्त समझौता करके आपनी सेनाओं को हरवाने मे आपना कृतघ्न योगदान दिया।
(मनमोहन शर्मा)



