Poetry by Manmeet Soni:आधुनिक कविता के मनमोहक रचयिता भाई मनमीत सोनी की कविता प्रस्तुत करते समय सदैव आनंद सहित एक अभिमान का भाव भी अनुभूत होता है..
वह मेरे पापा के समय की हीरोइन है
वह मेरे समय की भी हीरोइन होना चाहती है
इस ज़िद ने उसे अपने प्रति क्रूर बना दिया है
अब वह गालों पर इंजेक्शन लगवाती है
जबकि इस उम्र में उसका एक पोता होना चाहिए था –
इसलिए मैं
उसे उपहार में
बेनाम अनाथालयों के बहुत सारे बच्चे सौपना चाहता हूँ :
क्योंकि थिएटर में
अब उसे उतनी और वैसी ऑडियंस नहीं मिल सकती!
—
बीस बरसों तक
वह नाची ही नाची है
उसकी नस-नस जानती है यह कैलकुलेशन
कि कौनसे एक्सप्रेशन पर
कितनी और कैसी तालियां आएँगी
किस अदा पर
लहालोट हो जाएंगे बूढ़े-डोकरे
लार टपकने लगेगी जवान लौंडो की
लड़कियां मन ही मन सोचने लगेंगी :
काश! हमारा भी फिगर ऐसा ही होता!
घरेलू स्त्रियां
जो अपने पतियों के लिए बोरिंग हो चुकी थी
उन घरेलू स्त्रियों को
दो दशकों तक
जवान बनाए रखा उसकी कमर की लचक ने
उसके ठुमकों ने
दो पीढ़ियों को
सौंदर्य के सागर में उतारा है
डुबोया है और इस सागर से पार किया है
—
लेकिन अब उसके गालों को देखिये :
वे रफ काग़ज़ जैसे लगते हैं जो बारिश में भीग गए हैं!
लेकिन अब उसके स्तनों में वह कसाव नहीं :
उनके क्लीवेज गहरे और आकर्षक नहीं रह गए हैं!
लेकिन अब उसके पार्श्व से उसे देखो तो दया आती है :
वे जाँघेँ जैसे ईंटों का हिलता हुआ कोई क्रिकेट स्टम्प है!
लेकिन अब उसकी नंगी पीठ चूमने का दिल नहीं करता :
चाहे वह डीप कट ब्लाउज़ पहने या बैकलेस ब्लाउज़!
उम्र ने
उसे बेचारी बना दिया है
अगर वह पूरे कपड़ों में लिपटी हुई होती
तो उसका सौंदर्य
गांधी की “गीता माता” से रत्ती भर कम नहीं होता
लेकिन हाय!
उसकी यह ज़िद
कि मैं अब भी खींच सकती हूँ
वासना की चुंबक से
हज़ारों लाखों टन लोहा!
—
वह अब भी नाच रही है
वह इसे ही कला मानती है
उसे सर पर चढ़ाने वाले कहते हैं
वह नाचने के लिए ही पैदा हुई है
लेकिन मैं तोड़ देना चाहता हूँ उसकी पाज़ेब
मैं उसके घूँघरू फेंक देना चाहता हूँ
मैं बंद कर देना चाहता हूँ तेज़ आवाज़ वाले लाउड स्पीकर
मैं उसे सिर्फ़ इतना कहना चाहता हूँ :
“बहुत नाच ली आप
समय समाप्त हुआ
अब आप अपने लिए नाचिये
कमरा बंद कर लीजिये
कृष्ण का स्मरण करिये
और बिना किसी कोरियोग्राफर के ऐसे नाचिये
जैसे मीरा नाचती थी चित्तौड़ में
राजभवन के बीचो-बीच
आत्मा के मंदिर में
भावनाओं की झाँझ पर”
लेकिन हाय!
फिर वही उसकी यह ज़िद
कि मैं अब भी खींच सकती हूँ
वासना की चुंबक से
हज़ारों लाखों टन लोहा!
—
कला के क़ातिल
घूमते हैं इर्द गिर्द
अशोक वाजपेयी से लेकर
मुकेश अम्बानी तक
गुटखा बेचने वाले अरबपतियों से लेकर
शराब बेचने वाले धनपशुओं तक
हीरों के गुजराती व्यापारियों से
सट्टा खेलने-खिलाने वाले मारवाडियों तक
और नाचती ही जाती है
कभी कोई माधुरी दीक्षित तो कभी कोई शिल्पा शेट्टी
फिर बरामद होती है
कभी किसी श्रीदेवी या परवीन बॉबी की लाश
और मैं अपनी कविता के कटोरे में
वाह वाह के कुछ सिक्के लिए कहता ही रह जाता हूँ :
“अपने लिए भी नाचो”
“अपने लिए भी लिखो”
“अपने लिए भी गाओ”
—
कब बदलेगी यह दुनिया
कब मिलेगी मेरी जीवित आत्मा को शांति
कब मुक्त होंगी
माधुरियां दीक्षितियाँ
कब जागेगा वह निर्भार कला बोध
कब होगा वह लास्य वह तांडव
कब कोई डमरू उस तरह बजेगा
जिस तरह युद्ध होता है आत्मा के कुरुक्षेत्र में –
आह!
फिर कहता हूँ
और कहता ही जाता हूँ..
लेकिन हाय!
फिर फिर फिर
उसकी यही ज़िद :



