Poetry by Manmeet Soni: सच को सच कहना और संवेदना के अंतिम छोर तक कहना ही यथार्थ साहित्य सेवा है..युवा कवि मनमीत सोनी की इस कविता के भीतर उतरिये और अनुभव कीजिये बड़ी सच्चाई का..
खामनेई, ट्रम्प और नेतान्याहू
ख़ुश हूँ कि नहीं हूँ लेकिन दुखी नहीं हूं :
कि खामनेई मर गया
कि नेतन्याहु जीतने वाला है
कि ट्रम्प अब इस धरती का नया ख़ुदा है
मैं
चूरू (राजस्थान) से बैठकर यह सब देख रहा हूँ
और मेरे भीतर
ईरान की लाखों कब्रों पर
तरह-तरह के रंगीन फूल खिलने लगे हैं!
—
बर्दाश्त कर सकता हूँ
नेतन्याहु को
बर्दाश्त कर सकता हूँ
ट्रम्प को
बर्दाश्त कर सकता हूँ
राहुल को
मोदी को
ममता को
केजरीवाल को
यहाँ तक कि
पवन खेड़ा संबित पात्रा सुप्रिया श्रीनेत को
लेकिन खामनेइयों को बर्दाश्त नहीं कर सकता मैं
कि जिसने
चाँद जैसे रौशन चेहरों पर
काले बादलों का कड़ा हिजाब डाल दिया
और हुक्म दिया :
!काले बादलों के पीछे
सिर्फ़ अपने शौहरों के लिए चमको ईरान की औरतो!”
—
मार डाले गए हज़ारों लड़के
जिनकी दाढ़ी-मूंछ भी नहीं आई थी
अब वे खजूर के पेड़ों तरह
रेगिस्तान में हरे-भरे बुलंद ओ बाला नज़र आएँगे
फेसबुक
इंस्टाग्राम
ट्विटर जैसे खिलौने
ईरान के बच्चों के हाथों में पहुंचेंगे
लड़के
लड़कियों से प्यार कर सकेंगे
लड़कियां
लड़कों से प्यार कर सकेंगी
साहिर का लिखा गीत
कोई बंजारा
जलते हुए रेगिस्तान में खजूर के पेड़ के नीचे दोहराएगा :
“ये इश्क़ इश्क़ है इश्क़ इश्क़ ये इश्क़ इश्क़ है इश्क़”
—
मज़हब का बोझ
कम होगा कुछ इदारों पर से
शैतानी आयतों को भी
क़ुराने पाक में थोड़ी-सी जगह मिलेगी
कलम नहीं घोंपी जाएगी
खिलाफ़ लिखने वालों की गर्दनों में
जेल में नहीं डाल दिए जाएंगे
आवाज़ बुलंद करने वाले
हज़ारों कैदियों की रूह तक उतरेगी
रूह अफ़ज़ा शरबत की ठंडक
—
शहीद नहीं है खामनेई
बस इतना हुआ है
कि नेतन्याहु और ट्रम्प नाम के बड़े हत्यारों ने
एक छोटे हत्यारे को मार गिराया है
कल को मुमकिन है
कोई नेतन्याहु और ट्रम्प से बड़ा हत्यारा
किसी नेतन्याहु को मार कर दावा करे :
मैंने आज़ाद कर दिया इज़राइल को!
—
कितने सुख से हैं हम
कि हमें नेहरू, शास्त्री, इंदिरा, राजीव, अटल, मनमोहन और मोदी मिले
वैश्विक हत्यारों के बीच
हमारी चुनी हुई सीधी-सादी लोकतान्त्रिक गायों ने
अपने सींगों से पीछे खदेड़ दिया
चीन
रूस
अमेरिका जैसा आदमखोर जानवरों को!
—
भारत माँ की क़सम
न कोई पक्ष है
न कोई विपक्ष
झूम-झूम कर गा रहा हूँ भारत माता की जय
अच्छा लगने लगा है
विपक्ष का हर नेता
सत्ता पक्ष कितना उदार लगने लगा है
AIMM और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से भी
एक शग़फ़ महसूस कर रहा हूँ
मेरे भीतर हरेक शै जुड़ गई है
लेकिन मुझे खामनेई से कोई सहानुभूति नहीं
मैं
ईरान की जनता से
चालीस दिन का शोक नहीं
चालीस दिन का जश्न मनाने को कहता हूँ
और भारतीय मुसलमानों से कहता हूँ :
“आप समझिये और नहीं समझ सकते तो चुप रहिये!”
—
ऐ मेरी नीली हरी पृथ्वी
तेरे ज़ख्मों को चूमता हूँ
कि तू सदियों-सदियों से ज़ख्मी है
मैं
अपनी चमड़ी काट-काट कर
पंचर बनाता रहा हूँ
एक फूटे हुए टायर का
मैं
ट्रम्प
नेतान्युह
पुतिन
शी जिनपिंग
किम जोंग
जैलेंसकी से कहना चाहता हूँ
मरने से पहले ही
मर गए हो तुम लोग
क्योंकि तुमने धोखा दिया है पृथ्वी को
तानाशाहो!
भारत से सीखो
सीखो भारत से
असहनीय को सहना
उन्हें भी
छाती पर सहना
जो दिन रात
मूंग दलते हैं हमारी छाती पर!
(मनमीत सोनी)



