Poetry by Manmeet Soni: गीले बालों को सुखाते हुए..उस स्त्री का कुछ न कुछ गुनगुनाना..कितना सुंदर लगता है..
अगर आपने
छत पर बाल सुखाती स्त्री को नहीं देखा है..
तो आप
एक ऐसे दृश्य से वंचित रह गए हैं
जो आपको
नास्तिक से आस्तिक
और आस्तिक से भक्त बना सकता था!
—
अहा!
सूरज जैसे
सुलगते हुए शोले पर
गीले बालों की बूँदों का पड़ना
भीगे हुए तौलिए का
गीले बालों से टकरा कर
“झट झट” की वह आवाज़ करना
बाल सुखाती स्त्री का
यह मानना
कि इस समय उससे सुंदर
कोई अप्सरा- वप्सरा नहीं
वह मदमाता दर्प
वह लहरदार सर्पीला घना यौवन
कि जिसे देखकर
उमड़ती है श्रद्धा ही श्रद्धा
—
छत पर
धूप में
रेलिंग के पास
बाल सुखाती स्त्री को देखकर
कभी नहीं उमड़ती वासना
बल्कि यही इच्छा होती है
कि आँखों की खिड़की में
स्थिर हो जाए यह महान दृश्य
और मन में
वह कंघा बनने की इच्छा होती है
जो सुलझाता है
उस स्त्री के गीले बाल
—
गीले बालों को सुखाते हुए
उस स्त्री का कुछ न कुछ गुनगुनाना
कितना सुंदर लगता है
जी करता है
उस स्त्री के होंठों के पास
अपने कान गिरवी रख आएं
वह मुड़ी हुई कमर
जैसे गली मुड़ती है कोई
दूसरी गली की ओर
—
उस स्त्री का देखना
कि उसे देख तो नहीं रहा कोई
और यह देखकर
कि उसे देख रहा है कोई मुझ जैसा
सूरज की तरफ़
उसका पीठ कर लेना
उसकी गोरी पीठ पर पड़ना
सूरज की किरणों का
उसकी गोरी पीठ का बदल जाना
एक चमकते हुए दर्पण में
कौन पागल होगा
जो यह दृश्य छोड़कर
ऑफिस जल्दी पहुंचना चाहेगा
—
कितना अलग होता है
सूरज की गर्मी से बालों को सुलझाना
अच्छा है कि अब भी
बहुत कम स्त्रियां हैं
जो “ड्रायर” से सुखाती हैं अपने बाल
कितना अच्छा लगता है
मोटे-पतले दाँतों वाले कंघे से बालों को सुलझाना
टूटना कमज़ोर बालों का
बजाय किसी महंगे “स्ट्रेटनर” के
और फिर दोनों हाथों की अंगुलियों से
ले जाना बालों को पीछे
मुग्ध होना
नीले आसमां के दर्पण में
ख़ुद को देखकर
इतना आत्मविश्वास
कि इन लम्बे काले घने केशों की बदौलत
जीत सकती हूँ मैं
कठोर से कठोर हृदय के पुरुष को
—
हम जैसे सौंदर्य के पुजारी तो
पहले ही हारे हुए जुआरी है स्त्रियों
कि तुम्हारी जीत
और हमारी हार में छुपी है
इस महान धरती के महान सौंदर्य की जीत
—
लो!
चली गई नीचे वह स्त्री
सीढियों पर हवाई चप्पलों की आवाज़
यहाँ तक सुनाई देती है
भूल गया था आज
सूरज को कलसी ढालना
लेकिन मैंने यूं भी पूजा कर ली सूरज देवता की
भरी धूप में
मेरे चारों ओर लहरा रहे हैं
काले घने लम्बे बाल
मैं
एक काली सुगंधित घाटी से
एक नक़ली और बोरियत भरी दुनिया में प्रवेश कर रहा हूँ
—
चारों ओर
सनसिल्क – डव – क्लिनिक प्लस शैम्पू की सुगंध है
मेरे सीने से उठ रही है मीठी भाप
सुलग रहा हूँ
एक महीन ठंडी आग में
पक रही है
कल्पना की खिचड़ी
कि शाम को घर पहुँचते ही
जल्द से जल्द
अपनी पत्नी के बालों में गुम हो जाऊँगा!
—
नहीं देखी
तो कभी ज़रूर देखिये
छत पर बाल सुखाती स्त्री को
यदि आप नास्तिक हैं
तो आस्तिक बन जाएंगे
और आस्तिक हैं
तो बन जाएंगे
इस नश्वर जीवन के अनश्वर भक्त!
(मनमीत सोनी)