Gang Rape Ignored by Media:देश का मीडिया अपनी जिम्मेदारी के साथ रेप करे तब भी मामला आपराध का बनता है..एक 13 साल की बच्ची के साथ तीन होटलों में 9 दिनों तक सामूहिक दुष्कृत्य का शिकार बने और देश का मीडिया खामोश रहे तो..
बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ वाले देश के श्रीगंगानगर के नामी होटलों में हुआ है ये खौफनाक कांड जिस का सच किसी को भी अंदर तक हिला देगा। जानिए कैसे एक रिक्शा वाले की घिनौनी चाल ने एक मासूम को सामूहिक दुष्कर्म के दलदल में धकेला और पुलिस ने कैसे किया इसका पर्दाफाश।
श्रीगंगानगर का वो खौफनाक सच
राजस्थान का एक शांत और सरहदी इलाका श्रीगंगानगर – जहां अमूमन सुबह की शुरुआत ठंडी हवाओं और शांत माहौल से होती है। मगर पिछले कुछ दिनों से इसी शहर की हवा में एक अजीब सा सन्नाटा और लोगों के दिलों में भारी गुस्सा भरा हुआ है। वजह बेहद खौफनाक है।
एक 13 साल की नन्ही सी बच्ची, जिसकी उम्र अभी ठीक से दुनिया को समझने की भी नहीं थी, उसे को बलात्कार के दलदल में धकेल दिया हैवानों ने। अगर चमत्कार न होता तो वहां से उसकी जिन्दा वापसी का रास्ता नामुमकिन था। यह कहानी सिर्फ एक अपराध की नहीं है, बल्कि यह उस सिस्टम और समाज के चेहरे पर तमाचा है जहां चंद रसूखदार लोग अपनी हवस मिटाने के लिए किसी भी हद तक गिर जाते हैं।
होटलों के बंद कमरों में नीलाम हुआ एक मासूम बचपन
पुलिस ने जब इस मामले की परतें खोलना शुरू किया तो उनके पैरों तले से भी जमीन खिसक गई। शहर के बड़े-बड़े नामी चेहरों के नकाब एक-एक कर उतरने लगे। जिन होटलों में कभी बड़े-बड़े लोग ठहरते थे, वहां प्रशासन के पीले पंजे यानी बुलडोजर गरजने लगे। इतना ही नहीं, जब जांच का दायरा बढ़ा तो पता चला कि इस घिनौने धंधे के तार सिर्फ भारत तक ही सीमित नहीं थे, बल्कि इसके कनेक्शन सात समंदर पार सीधे न्यूजीलैंड से जुड़े हुए थे।
इस पूरे खौफनाक सिलसिले की शुरुआत होती है 18 जून के उस मनहूस दिन से। वो मासूम बच्ची हमेशा की तरह अपने घर पर थी, लेकिन अचानक वो गायब हो गई। घरवाले परेशान थे, हर जगह ढूंढ रहे थे। इसी बीच शहर के ही एक शातिर रिक्शा चलाने वाले की नजर उस अकेली और लाचार बच्ची पर पड़ी। उसने मदद करने के बहाने उस मासूम को अपनी बातों के जाल में फंसाया।
बच्ची को लगा कि कोई उसकी मदद कर रहा है, मगर उसे क्या पता था कि वह रिक्शा वाला उसे सीधे साक्षात नर्क की तरफ ले जा रहा है। वह उसे बहला-फुसलाकर शहर के एक नामी होटल में ले गया। वहां ले जाकर उसने उस मासूम को महज एक बिकाऊ सामान की तरह दूसरों के हवाले कर दिया।
इसके बाद तो जैसे उस बच्ची की जिंदगी में कभी न खत्म होने वाली काली रात शुरू हो गई। शहर के तीन सबसे बड़े और नामी इलाके इस घिनौनी करतूत के मुख्य अड्डे बन गए। इनमें सुखाड़िया मार्ग पर बना होटल जॉय इन, बीरबल चौक के पास मौजूद होटल ड्रीम इन और मोटर मार्केट का जाना-माना होटल सैफ फायर इन शामिल थे। इन तीनों होटलों के बंद कमरों में दरिंदगी का यह खेल बेहद शातिराना और प्लान्ड तरीके से खेला जाने लगा।
अब जरा सोचिए कि कानून और पुलिस की नाक के नीचे यह सब कैसे चल रहा था? दरअसल, इन होटलों के मैनेजरों और इस धंधे को ऑपरेट करने वाले ठेकेदारों ने एक बहुत ही सेफ रास्ता निकाल रखा था। वे किसी भी आम इंसान या नए ग्राहक पर भरोसा नहीं करते थे ताकि कोई रिस्क न रहे। इस घिनौने खेल में एंट्री सिर्फ उन्हीं लोगों को मिलती थी जो उनके बहुत पुराने, खास और ‘भरोसेमंद’ कस्टमर हुआ करते थे।
इस पूरे नेटवर्क को चलाने के लिए सोशल मीडिया का सहारा लिया जा रहा था। व्हाट्सएप और दूसरे ऐप्स पर ग्रुप्स बने हुए थे। इन ग्रुप्स में उस मासूम बच्ची की तस्वीरें इन चुनिंदा और अमीर ग्राहकों को भेजी जाती थीं। वहीं पर रेट तय होते थे और सौदेबाजी की जाती थी। जैसे ही डील फाइनल होती, होटल के कमरों को बेहद कम वक्त – महज एक-एक या दो-दो घंटे के लिए – 1500 से लेकर 2500 रुपये तक के भारी-भरकम किराए पर बुक कर दिया जाता था।
इसके बाद उस बेबस बच्ची को उन भूखे भेड़ियों के सामने परोस दिया जाता। इस पूरे खेल में पकड़े जाने का डर इतना ज्यादा था कि इन लोगों ने डिजिटल ट्रांजैक्शन से तौबा कर रखी थी। कोई भी ऑनलाइन पेमेंट, यूपीआई या कार्ड एक्सेप्ट नहीं किया जाता था; पूरा का पूरा लेन-देन सिर्फ और सिर्फ नकद यानी हार्ड कैश में होता था।
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि होटल के मेन विजिटर रजिस्टर में इन आने-जाने वाले रसूखदार ग्राहकों का कोई नाम-पता दर्ज नहीं किया जाता था। वे चाहते थे कि पुलिस के हाथ कभी कोई ऐसा डिजिटल या कागजी सबूत न लगे जिससे वे कभी पकड़े जा सकें।
कहा जाता है कि पाप का घड़ा चाहे कितना भी बड़ा हो, एक न एक दिन उसे फूटना ही होता है। इस मामले में भी यही हुआ। तारीख थी 22 जून। सदर थाना पुलिस की एक टीम हर बार की तरह होटलों की रूटीन चेकिंग और तलाशी के लिए निकली थी। चेकिंग के दौरान पुलिस को कुछ गड़बड़ी का अहसास हुआ।
इसके बाद शुरू हुआ एक बेहद सस्पेंस से भरा और कड़ा रेस्क्यू ऑपरेशन। पूरे पांच दिनों तक पुलिस की टीम ने जाल बिछाया और आखिरकार उस मासूम बच्ची को उन दरिंदों के चंगुल से सही-सलामत आजाद करा लिया। जब उस डरी-सहमी बच्ची को सुरक्षित माहौल मिला और उसने पुलिस के सामने रोते हुए अपने बयान दर्ज कराए, तब जाकर इस पूरे रैकेट की असली और खौफनाक हकीकत दुनिया के सामने आई।
बच्ची की आपबीती सुनकर पुलिस अधिकारियों के भी रोंगटे खड़े हो गए। मामले की गंभीरता को देखते हुए पुलिस ने तुरंत एक्शन मोड में आते हुए बड़े अधिकारियों को इसकी जानकारी दी और शहर के इन नामी होटलों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई शुरू कर दी।
इस पूरे मामले में एक और बड़ा मोड़ तब आया जब पुलिस को पता चला कि इस घिनौने कांड का एक मुख्य आरोपी कोई लोकल गुंडा नहीं, बल्कि न्यूजीलैंड में रहने वाला एक एनआरआई (NRI) है। वह पुलिस से बचने के लिए लगातार अपने ठिकाने बदल रहा था। भारत आने के बाद वह अपनी शादी की तैयारियों में जुटा था। वह हाथों में हिना यानी मेहंदी रचाकर दूल्हा बनने के सपने देख रहा था, लेकिन कानून के लंबे हाथों ने उसकी शादी से ठीक पहले उसके मंसूबों पर पानी फेर दिया।
पुलिस ने पूरी प्लानिंग के साथ घेराबंदी की और उस आरोपी को रंगे हाथों दबोच लिया। जिसके हाथों में शादी की मेहंदी लगनी थी, अब उसके हाथों में कानून की मजबूत हथकड़ियां लग चुकी थीं। इस गिरफ्तारी के बाद शहर के लोगों में न्याय की एक उम्मीद जगी है।
फिलहाल इस पूरे मामले की तफ्तीश बेहद तेजी से आगे बढ़ रही है। पुलिस हर एक उस चेहरे को बेनकाब करने में जुटी है जिसने इस घिनौने कांड में किसी भी तरह से साथ दिया था। होटलों की इमारतों पर चलते बुलडोजर इस बात का सबूत हैं कि अब अपराधियों की खैर नहीं है।
सबसे बड़ा सवाल आज भी यही बना हुआ है कि आखिर हमारे समाज में मासूमों का बचपन कब तक इस तरह चंद पैसों के लिए नीलाम होता रहेगा? क्या सिर्फ आरोपियों को पकड़ लेना काफी है, या हमें अपने आस-पास के माहौल को इतना सुरक्षित बनाना होगा कि फिर कभी किसी रिक्शा वाले या होटल मैनेजर की हिम्मत एक मासूम की तरफ आंख उठाने की भी न हो सके।
(त्रिपाठी पारिजात)



