Iran War: परेशान और पगलाये ट्रंप को रास्ता दिखाया रूस ने – पहले सुनाई खरी खोटी फिर कहा — ” शांति चाहिये तो पाकिस्तान नहीं, भारत को चुनो”..
ईरान-अमेरिका युद्ध संकट के बीच रूसी विदेश मंत्री लावरोव ने ट्रंप को सीधी सलाह दी है कि शांति के लिए पाकिस्तान नहीं बल्कि भारत पर भरोसा करें। जानिए क्यों रूस ने भारत को बताया सबसे मजबूत मध्यस्थ और ट्रंप के चीन दौरे के पीछे क्या है असली मकसद।
दुनिया की राजनीति इन दिनों बेहद उथल-पुथल के दौर से गुजर रही है। एक तरफ ईरान और अमेरिका के बीच युद्ध का खतरा लगातार गहराता जा रहा है, तो दूसरी तरफ अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप इस संकट से बाहर निकलने का रास्ता तलाशते हुए बीजिंग की सड़कों पर नजर आ रहे हैं। लेकिन इसी बीच रूस ने एक ऐसा बयान दे दिया है, जिसने पूरी दुनिया का ध्यान खींच लिया है। रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने बिल्कुल साफ शब्दों में कहा है कि अगर ट्रंप सच में ईरान संकट का कोई ठोस और टिकाऊ हल चाहते हैं, तो उन्हें पाकिस्तान के बजाय भारत का दरवाजा खटखटाना चाहिए।
ट्रंप चीन क्यों गए — असली कहानी
सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि ट्रंप अचानक चीन दौरे पर क्यों निकल पड़े। दरअसल पश्चिम एशिया में अमेरिका की स्थिति इस वक्त बेहद कमजोर हो चुकी है। लगातार गलत फैसलों और बिगड़ती रणनीति की वजह से ट्रंप ईरान के मामले में चारों तरफ से घिर गए हैं। होर्मुज की खाड़ी में अमेरिका को करारा झटका लगा, जिसके बाद देश के भीतर भी उनकी आलोचना तेज हो गई।
अमेरिकी आम जनता इस वक्त दो बड़ी मुश्किलों से जूझ रही है — एक तरफ बढ़ती महंगाई है और दूसरी तरफ युद्ध की नीतियों से पैदा हुई अनिश्चितता। ऐसे में ट्रंप को लगा कि अगर वे चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग को मना लें और उनकी मदद से ईरान के साथ कोई शांति समझौता करवा लें, तो उनकी घरेलू और अंतरराष्ट्रीय छवि दोनों को फायदा होगा। यही सोचकर वे बीजिंग पहुँचे और शी जिनपिंग को रिझाने की कोशिश में जुट गए।
लावरोव ने क्या कहा और क्यों?
रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने BRICS के मंच से, दिल्ली में खड़े होकर, वाशिंगटन को एक सीधा और कड़ा संदेश भेजा। उन्होंने कहा कि ईरान और अमेरिका के बीच छिड़े इस संघर्ष को खत्म करने के लिए पाकिस्तान कुछ हद तक छोटी-मोटी भूमिका जरूर निभा सकता है, लेकिन अगर दुनिया को इस टकराव का कोई स्थायी और मजबूत समाधान चाहिए, तो इसके लिए भारत से बेहतर कोई विकल्प नहीं है।
लावरोव का तर्क बिल्कुल स्पष्ट था। उन्होंने कहा कि भारत के पास दशकों पुरानी कूटनीतिक परंपरा है। यह वह देश है जो गुटनिरपेक्षता की नीति पर चलते हुए हमेशा से दुनिया के अलग-अलग खेमों के साथ संवाद बनाए रखने में सफल रहा है। रूस, अमेरिका, ईरान, अरब देश — भारत के इन सभी के साथ स्वस्थ कूटनीतिक रिश्ते हैं। इसीलिए भारत उस मध्यस्थ की भूमिका निभाने में सक्षम है जिस पर दोनों पक्ष भरोसा कर सकें।
पाकिस्तान पर क्यों नहीं है भरोसा?
रूस का यह बयान एक बड़े सवाल को जन्म देता है — आखिर पाकिस्तान पर भरोसा क्यों नहीं किया जा सकता? इसका जवाब हाल की घटनाओं में छुपा है। कुछ समय पहले एक ऐसा मामला सामने आया जिसने अमेरिका को हिला कर रख दिया। पाकिस्तान ने ईरानी लड़ाकू विमानों को अपने नूर खान एयरबेस पर शरण दी थी। यह खबर जैसे ही अमेरिका तक पहुँची, वाशिंगटन में हड़कंप मच गया। जिस देश को अमेरिका मध्यस्थ बनाकर शांति की उम्मीद लगाए बैठा था, वही देश पर्दे के पीछे दूसरा खेल खेल रहा था।
रूस का साफ मानना है कि पाकिस्तान को अधिक से अधिक ‘फायर फाइटिंग’ यानी आग बुझाने के काम में इस्तेमाल किया जा सकता है। लेकिन दो कट्टर दुश्मनों को एक मेज पर बिठाने की, उन्हें समझौते के लिए राजी करने की, और फिर उस समझौते को टिकाऊ बनाने की ताकत — यह काम केवल भारत जैसे देश के बस की बात है।
भारत की साख — क्यों है यह अलग?
भारत की विदेश नीति की सबसे बड़ी खासियत यह है कि उसने कभी भी किसी एक खेमे में पूरी तरह खुद को नहीं डाला। शीत युद्ध के जमाने में जब दुनिया दो हिस्सों में बँटी हुई थी, तब भी भारत ने गुटनिरपेक्ष आंदोलन की अगुवाई की और अपनी स्वतंत्र पहचान बनाए रखी।
आज भी भारत की यही नीति उसे दुनिया में एक अनोखी स्थिति देती है। रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान जब पश्चिमी देश रूस के खिलाफ एकजुट हो गए थे, तब भारत ने अपना रास्ता खुद चुना। ईरान के साथ भारत के ऐतिहासिक व्यापारिक और सांस्कृतिक संबंध हैं। साथ ही अमेरिका के साथ भी भारत की रणनीतिक साझेदारी लगातार मजबूत हुई है। यही वजह है कि लावरोव ने भारत को सबसे भरोसेमंद मध्यस्थ बताया।
ट्रंप की मुश्किलें और आगे की राह
फिलहाल ट्रंप एक बेहद पेचीदा स्थिति में हैं। चीन से वे मदद माँगने गए हैं, लेकिन बीजिंग खुद अपने हितों को सर्वोपरि रखता है। रूस ने साफ कह दिया है कि भारत ही असली समाधान है। और पाकिस्तान पर से विश्वास पहले ही उठ चुका है।
ऐसे में सवाल यह है कि क्या ट्रंप रूस की इस सलाह को मानेंगे? क्या वे भारत की तरफ रुख करेंगे? अगर ऐसा हुआ, तो यह भारत की कूटनीति की एक बड़ी जीत होगी — और दुनिया की राजनीति में भारत का कद और भी ऊँचा हो जाएगा।
फिलहाल दुनिया की निगाहें बीजिंग में ट्रंप और शी जिनपिंग की मुलाकात पर टिकी हैं। लेकिन रूस के इस बयान के बाद एक बात तो तय है — इस पूरे खेल में भारत की भूमिका अब नजरअंदाज नहीं की जा सकती।
(त्रिपाठी पारिजात)



