Saturday, May 16, 2026
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Poetry by Manmeet Soni: न ये बाबरों की ज़मीन है

Poetry by Manmeet Soni: वो कवि कवि नहीं जो खरी-खरी कहने का साहस न रखता हो, मगर युवा कवि मनमीत की कविता चाहे तुकान्त हो अथवा आधुनिक- किसी को क्षमा नहीं करती !.. 

Poetry by Manmeet Soni: वो कवि कवि नहीं जो खरी-खरी कहने का साहस न रखता हो, मगर युवा कवि मनमीत की कविता चाहे तुकान्त हो अथवा आधुनिक- किसी को क्षमा नहीं करती !.. 

 

न ये बाबरों की ज़मीन है! न ये अकबरों की ज़मीन है!
ये जो मस्जिदें है नमाज़ियो! हमीं काफ़िरों की ज़मीन है!
कहीं कृष्ण हैं कहीं राम हैं कहीं शिव दफ़न कहीं कोई और
ज़रा खुल के गाइये आरती! कि ये घण्टियों की ज़मीन है!
इतिहास का जो है आईना! किसी धूल से क्यों रहे सना?
वो जो बोया था वही काटिये! कि ये आईनों की ज़मीन है।
तिरे दिल में कोई ख़ुदा रहा! है कमाल तुझ से जुदा रहा!
कभी दिल की तू तलाशी ले! कि ये ख़ामियों की ज़मीन है।
जो तेरा ख़ुदा वो मेरा ख़ुदा! जो मेरा ख़ुदा वो तेरा ख़ुदा!
मुझे क्या गरज़ थी ये कहने की कि ये मंदिरों की ज़मीन है?
यहाँ बंसरी की वो तान थी! जो हमारे देस की जान थी!
यहाँ गाएँ चरती थीं घास पर कि ये नंदियों की ज़मीन है!
मिले ख़ाक में वो बदन मगर उन्हें छू सकी न कोई नज़र
तुम्हें क्या बताएं अरे वहशियो कि ये जौहरों की ज़मीन है!
(मनमीत सोनी)
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