Poetry by Manmeet Soni: अपने-अपने पापा से जुड़ती है मनमीत की ये कविता जो बताती है कितना संवेदनशील है यह संबन्ध पिता-पुत्र का जो सरल है तो जटिल भी है..
सरल है लेकिन सहज नहीं है
पापा को फोन करना
कुछ देर सोचना पड़ता है :
फोन करूँ या नहीं?
ज़रूरी काम तो नहीं कर रहे?
मूड कैसा होगा?
हो सकता है किसी बात पर गुस्से में हों?
लेकिन फिर भी कर लेता हूँ फोन –
मेरे पिता में अगर लोहा है
तो मुझमें भी है थोड़ा – बहुत चुम्बक!
—
फोन की घंटी जब जा रही होती है
तो सावधान हो जाता हूँ मैं
थोड़ा-सा औपचारिक
थोड़ा-सा अनुशासित
आप कितने ही बड़े हो जाएं
लेकिन आप मम्मी की तरह
अपने पापा को यह नहीं कह सकते :
“और पापा डार्लिंग! क्या हाल चाल है?”
यह छूट सिर्फ़ मम्मी के यहाँ है!!
—
फोन उठाते हैं पापा
भारी आवाज़ में कहते हैं :
“हेलो! हाँ! बोल! क्या बात हुई?”
डरे हुए रहते हैं पापा
पापा को हमेशा इस बात का ख़दशा रहता है
कि कहीं मेरे साथ कोई ग़लत बात नहीं हो गई है –
मैं कहता हूँ :
“कुछ नहीं हुआ / ठीक हूँ / ऐसे ही कर लिया था फोन”
पापा कहते हैं :
“अच्छा! तब ठीक!”
मैं
अच्छी तरह महसूस कर सकता हूँ
उस लम्बी गहरी सांस को
जो पापा ने अभी अभी ली है
ख़ुशी की सांस
इत्मीनान की सांस!
—
ज़्यादा बात नहीं करते पापा
बस दो-चार गिनी-चुनी रटी-रटाई बातें
“बाक़ी सब ठीक है?”
“पैसे हैं तेरे पास?”
“घर कब आएगा””
“टिकट टाइम पर करवा लेना”
“कोई ज़रूरत हो तो फोन कर देना”
और आख़िर में कहते हैं :
“ले! तेरी मम्मी से बात कर ले! यहीं पास में है!”
—
कुछ कहना चाहता हूँ पापा को
लेकिन मैं भी
कुछ गिनी-चुनी और रटी-रटाई बातें ही कह पाता हूँ :
“हाँ! सब ठीक है!”
“पैसे हैं मेरे पास!”
“जून जुलाई में आऊंगा”!
“टिकट टाइम पर करवा लूंगा”
“नहीं! ऐसी कोई दिक़्क़त नहीन है”
और आख़िर में कहता हूँ :
“हाँ! मम्मी से बात करवा दो!”
—
पापा से बात करता हूँ
तो उस ज़माने की याद आ जाती है
जब तार भेजे जाते थे
और एक-एक शब्द का पैसा लगता था
पापा से बात करता हूँ
तो सोचता हूँ :
कितना अजीब आदमी है
हमेशा एक ही मूड में रहता है
न हँसी न ख़ुशी
बस पैसा, टिकट और किसी तकलीफ़ का अंदेशा
लेकिन प्यार भी करता हूँ
इसी आदमी से
इसी आदमी की
बस एक हँसी
बस एक शाबासी भरी थपथपाहट के लिए
जाता हूँ ऑफिस
कमाता हूँ पैसा
चाहता हूँ इज़्ज़त
बहुत सारा नाम!
—
मम्मी के पास खड़े रहते हैं पापा
सुनते रहते हैं
मेरी और मम्मी की क्या बात हो रही है
बीच-बीच में कहते रहते हैं :
“और बिगाड़ ले इसको”
“मैं नहीं दूंगा पैसे”
“इसको कह दे ख़ुद भी कोई काम किया कर”
“तुम माँ-बेटे मेरा जनाज़ा निकालोगे एक दिन”
हँसते रहते हैं हम मम्मी-बेटे
हमें लाड आता रहता है पापा पर
डर भी लगता है थोड़ा बहुत
लेकिन हम अपनी चलाए बिना मानते नहीं हैं!
—
आख़िर में
जब कट जाता है फोन
पापा मेरे नाम को देखते हैं
बहुत प्यार से
उन्हें मेरे कॉन्टैक्ट नंबर याद हैं
भले ही वे तीन बरस में चार बार बदल गए हों
उन्हें मेरे दोस्तों के नाम पता हैं
उनके फोन में मेरे दोस्तों के नंबर हैं
यहाँ तक कि दोस्तों के बापों के नंबर भी हैं
पापा
हमेशा तैयार हैं
एक ऐसी मुसीबत के लिए
जो
कभी भी
कहीं से भी
किसी भी ओर से आ सकती है!
—
फोन काटने के बाद
मैं चूमता हूँ
मोबाइल पर
मम्मी-पापा का वालपेपर
मम्मी के गाल चूमता हूँ
पापा का माथा
एक दूरी के पुल पर खड़े हम
बाप-बेटे
हाथ मिलाते हैं
—
पापा!
उदास हो जाते हैं
जब मैं उन्हें नहीं
मम्मी को फोन करता हूँ
मम्मी से कहते हैं :
“नालायक! मुझे फोन क्यों नहीं करता?”
और मुझसे कहते हैं :
“अपनी मम्मी को फोन किया कर! मेरे पास और भी काम है!”
—
आह!
पिता का यह प्यार
इस पर क़ुर्बान
मेरी यह ज़िंदगी
मैं चूमता हूँ
पिता का माथा
हवा में उनका चित्र बनाकर!



