Poetry by Manmeet Soni: आप धार्मिक हैं तो भी और मानव हैं तो भी आपके नेत्रों में आनंद के अश्रु तो आने ही हैं मनमीत सोनी की इस कविता को पढ़ कर..
गीताप्रेस की दुकान पर
ख़रीदने गया था कोई पुस्तक
और वहाँ देखी एक स्त्री
अपनी छोटी बच्ची के साथ
अपने लड्डूगोपाल के लिए
बाल खरीदती हुई!
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चहक रही थी बच्ची
दस बारह साल की बच्ची
कभी हनुमान जी की फ़ोटो को देखती
कभी दुर्गा के गालों पर पप्पी लेती
कभी राधा कृष्ण की फ़ोटो लेने की ज़िद करती
कभी पूछती यह माला कौनसी है
दूकानदार बताता :
“यह चंदन की माला”
“यह तुलसी की माला”
“यह रुद्राक्ष की माला”
“यह नीम की माला है बेटी”
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लड्डूगोपाल के लिए
तीन तरह के बाल दिखाए दुकानदार ने
बीस के
तीस के
चालीस के!
बीस वाले बाल लेने से
मना कर दिया उस बच्ची ने
क्योंकि वे बहुत छोटे थे
तीस वाले बाल लेने से भी
मना कर दिया उस बच्ची ने
क्योंकि वे छोटे तो नहीं थे लेकिन उलझे हुए थे
चालीस वाले बाल पसंद आए बच्ची को
वे लम्बे भी थे
वे नर्म भी थे
और बहुत ज़्यादा काले भी थे
—
बच्ची ने
दुकानदार से पूछा :
“अंकल अंकल! क्या इन बालों के कंघी कर सकते हैं?”
दुकानदार ने कहा :
“कर सकते हैं बेटा!”
बच्ची ने
फिर दुकानदार से पूछा :
“अंकल अंकल! क्या इनको शेम्पू भी कर सकते हैं?”
दुकानदार ने कहा :
“अपनी मम्मी से पूछ लेना बेटा!”
बच्ची ने
दुकानदार से आख़िरी सवाल पूछा :
“अंकल अंकल! मेरे लड्डू के बाल मम्मी के बालों की तरह टूटेंगे तो नहीं?”
और फिर
हँसी छूट गई मम्मी और दुकानदार की भी
मेरे हाथों से भी छूट गया
“श्री राधा माधव चिंतन” का भारी ग्रंथ!
___
चली गई बच्ची
चालीस रुपये के बाल लेकर
पीछे पीछे देखने गया उसको
जब तक ओझल नहीं हो गई आँखों से
फिर देर तक बात करता रहा
उस बच्ची के सवालों के बारे में
उस दुकानदार से मैं
—
भगवान की कसम
मुझे ऐसा लगा दोस्तो
कि हनुमान जी, दुर्गा माता और राधा कृष्ण
बाहर निकल आए हैं
अपनी अपनी तस्वीरों से
और उस बच्ची के पीछे पीछे
उसके घर तक जाना चाहते हैं
कितना सौभाग्यशाली है
वह लड्डूगोपाल
जिसके बाल बनाएगी वह बच्ची
इस समय
जब लिख रहा हूँ यह कविता
वह कंघी कर रही होगी
अपने लड्डूगोपाल के बालों में
हो सकता है
पहले शेम्पू करे
फिर तेल लगाए लड्डू के बालों में
अहा!
कौनसा शेम्पू करेगी वह बच्ची?
डव!
क्लिनिक प्लस!
सनसिल्क!
आयुर!
अहा!
कौनसा तेल लगाएगी वह बच्ची?
डाबर आमला!
पतंजलि!
घृतकुमारी!
सरसों या नारियल या बादाम या जैतून का तेल!
___
गीताप्रेस की दुकान से
जब मैं बाहर निकला
तो रात हो गई थी
और चारों ओर लहरा रहे थे
लड्डूगोपाल के काले बाल
चालीस रुपये के काले बाल!
—
अपने बालों में हाथ फिराते हुए
स्कूटर पर घर लौटा मैं
और सीधे गया घर के पूजाघर में
और दादी के लड्डूगोपाल के बाल देखे
मैंने उन रूखे बालों को
कंघी से सुलझाया
और दो बूँद पतंजलि तेल लगा दिया
उन बालों में
और हल्की सी मालिश भी कर दी
—
याद नहीं पड़ता दोस्तो!
कि आख़िरी बार
इससे पहले
कब की थी मैंने इतने मन से पूजा :
हो सकता है
आज रात मेरे सपने में
वह बच्ची
राधा बनकर
और लड्डूगोपाल
कन्हैया बनकर आए!



