Sunday, June 14, 2026
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Poetry by Manmeet Soni: सेजल पंवार के नाम

Poetry by Manmeet Snoi: घटियापन में एक औरत ने लाजवाब तरक्की की है और पुरुष जननांग के प्रति अपने मन में पनप रही वहशी सोच को जगजाहिर कर दिया है..

Poetry by Manmeet Snoi: कविता से भी बद-दिमाग लोगों को सीख दी जा सकती है- मिसाल आपके सामने है मनमीत की कविता जिसने एक व्यभिचारी मस्तिष्क को राह दिखाई है !!
सेजल!
मेरी बेटी!
“उसकी” लम्बाई पर मत जाओ
वह दो इंच तीन इंच चार इंच पांच इंच छह इंच सात इंच का
हो भी सकता है
और नहीं भी हो सकता है
लेकिन उसी से तुम बनी हो
उसी से बनी है सृष्टि!
मेरी बेटी!
हँसो मत
यह हँसने की चीज़ नहीं है
इसकी लम्बाई मत मापो
दुनिया की कोई स्केल इसे इंच में नहीं नाप सकती
एक नपुंसक से पूछो इसकी महत्ता
एक बाँझ से पूछो इसकी कीमत
एक अनबुझ आग से पूछो इसकी ज़रूरत!
मेरी बेटी!
मरने के बाद
सब कुछ सिकुड़ जाता है
ज़ाहिर है यह भी सिकुड़ जाता होगा
लेकिन किसी मृतक को देखने के बाद
बड़ा हो जाना चाहिए किसी जीवित का हृदय –
तुम्हारा हृदय क्यों सिकुड़ गया?
मैं यह सोच कर हैरत में हूँ!
मेरी बेटी!
केवल लिंग मत देखो
देखो सूखी घास की तरह रूखे केश
देखो पेट में भरा हुआ पानी
देखो हमेशा के लिए बंद हो चुकी आँखें
देखो वे पाँव जो अब कभी नहीं दौड़ेंगे
देखो वह दिल जो अब धड़कता ही नहीं
देखो…
उस दरवाज़े को ढूंढो
जिससे प्राण पखेरू उड़ गए और वैज्ञानिकों को अब तक नहीं पता –
आदमी ज़िंदा क्यों रहता है?
आदमी मर क्यों जाता है?
कितने ग्राम होता है आत्मा का वज़न?
आत्मा होती भी है या नहीं होती?
मेरी बेटी!
मैं तुमसे उम्र में बड़ा हूँ
अश्लीलता में और भी बड़ा
तुम लिंग के आकार पर अटकी हो
तुम कहो तो मैं लिंग के प्रकार तक गिनवा सकता हूँ
लेकिन हरेक लिंग ने
छुई है
कभी किसी स्त्री की योनि
इसलिए लिंग पवित्र है –
इतना पवित्र है
जितना शिवलिंग स्वयं!
मेरी बेटी!
हँसो
तो उस अज्ञान पर हंसो
जो तुम्हारे भीतर रह रह कर बिजली के झटके मारता है
जो यह कहता है
हम केवल ख़ून पीब हड्डी चमड़ी और गोश्त के बने हैं
और हमें एक दिन जल कर ख़त्म हो जाना है
जैसे डस्टबिन का कचरा!
सेजल!
मेरी बेटी!
मेरी बात ध्यान से सुनो
अगली बार जब किसी मृतक के लिंग को देखो
तो उसे प्रणाम करना
कहना :
हे परमपिता परमेश्वर!
हमने तुझे नहीं देखा
लेकिन इस अंग को देखा है
हालांकि हम इस शरीर की चीर-फाड़ करेंगे
लेकिन ढक देंगे इस अंग को सफ़ेद कपड़े से
हे परमपिता परमेश्वर!
हमारी संतानों के लिंग स्वस्थ हों
हमारी संतानों की योनियाँ स्वस्थ हों
यह पृथ्वी सदा हरी-भरी रहे
सदा बहे दूध और पानी की नदियां!
मेरी बेटी!
काश…
तुझ तक पहुंचे यह कविता
रोए तू अकेले में
पश्चाताप से गीली हो जाएं तेरी आँखें
धुल जाए सारा मैल..
और अगली बार
जब तू किसी मृतक के लिंग को देखे
तो तेरे फूलों जैसे होंठों पर
नाचें यह शब्द :
अहा पिता!
अहा चाचा!
अहा प्रेमी!
अहा दादा!
अहा नाना!
अहा पुरुष!
(मनमीत सोनी)
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