Friday, July 24, 2026
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Parakh Saxena writes: ये नया गिद्ध भी अपने बच्चों की कसम खायेगा !

Parakh Saxena writes: जातिवादी बात नहीं है और आंदोलन भी धीरे धीरे ठंडा पड़ रहा है परंतु देखा जाये तो सामान्य वर्ग के छात्रों को कुछ समझाने की जरूरत है..

Parakh Saxena writes: जातिवादी बात नहीं है और आंदोलन भी धीरे धीरे ठंडा पड़ रहा है परंतु देखा जाये तो सामान्य वर्ग के छात्रों को कुछ समझाने की जरूरत है..

दिमाग को ठंडा करो और पीछे हो जाओ, ये लड़ाई आपकी तो बिल्कुल भी नहीं है। आपका प्राथमिक संघर्ष आज भी वही है कि आपका सिलेक्शन 500 मे भी नहीं होगा और किसी का 300 मे भी हो जायेगा, आप सरकार को इस मुद्दे पर घेर सकते है लेकिन जैसे ही घेरोगे दाए बाए वाले कॉकरोच आपको कुचल देंगे।

कॉकरोच तो आपके विरुद्ध ये तक नारा दे रहे है कि तिलक तराजू और तलवार को मारो। मोदीजी की दिवंगत माताजी को अपशब्द कह रहे है क्या ये आपके घरो की परवरिश हो सकती है। बचपन मे जिन बच्चो के साथ खेलने को मना किया जाता था ये वही बच्चे है।

इतिहास किताब पढ़ने वाले बनाते है ना कि रील्स स्क्रॉल करने वाले, इसलिए इस अलगोरीदम के जाल से निकलिए। ये आंदोलन नहीं फूहड़ता है जहाँ नारा ए तकबीर के नारे लग रहे है, इस पूरे फसाद मे तीन लोग है पीछे दंगाई, बीच मे आप और सामने लाठी पकड़े सत्ता। दोनों ही दिशा मे आपकी पिटाई होना तय है।

ये दृश्य है जहाँ पुलिस की गाडी तोड़ने वालो के फिंगर प्रिंट उठ रहे है। यदि आपने हाथ भी लगाया है तो फिंगर प्रिंट मिलेगा और कार्रवाई होंगी, जो बच्चे गिरफ्तार होंगे उनका आगे पूरा करियर खत्म है।

यहाँ न्याय और समता का आंदोलन नहीं हो रहा है, खुल्ले नारे लग रहे है कि तिलक तराजू और तलवार को मारो। एक बार इन दंगाईयों को बोलकर देखो कि आरक्षण पर चर्चा ही कर ले आपको फ़ौरन आपकी हैसियत दिखा दी जायेगी। ये आंदोलन छात्रों का नहीं है, जैसे जेपी आंदोलन से लालू जन्मा और अन्ना आंदोलन से केजरीवाल उसी तर्ज पर एक तीसरा गिद्ध जन्म लेगा।

ये तीसरा गिद्ध भी अपने बच्चो की कसम खायेगा, आपके दम पर उठेगा और बड़ा होकर उसी बीजेपी के गले मिलेगा जिसे उखाड़ने की आप बात कर रहे हो। आपके हाथ रह जायेगी जेल की सलाखे और खुली किताबों मे पड़ा आपका भविष्य।

सामान्य वर्ग वालो के लिए इसलिए भी है क्योंकि इस वर्ग मे ज्यादातर लोग मिडिल क्लास है, कुछ सिंगल चाइल्ड भी होंगे। यदि आप जेल गए तो पीछे आपका परिवार है, 18 साल की पूरी मेहनत तबाह हो जाएगी सिर्फ इस चक्कर मे कि किसी को राजनीति चमकानी थी तो उसने आपको आगे कर दिया।

पत्थर पीछे से पड़े या लाठी आगे से चले दोनों स्थिति मे मरण होना है, इसलिए बेहतर है समय रहते लौट जाओ जैसे बाकि बच्चे लौट रहे है। ये आंदोलन 20 को उग्र था, 21 को शांत पड़ गया और 22 को राजनीतिक संगठन के कार्यकर्ताओ के चलते फिर बढ़ गया और आज 23 को फिर शांत हो रहा है।

धीरे धीरे मूल छात्र पीछे हो रहे है और राजनीति वाले आगे आ रहे है, अब सिर्फ दंगे होने है और गिरफ्तारी होंगी। आपकी तो निश्चित होंगी क्योंकि राजनीति वाला आगे तो नहीं आएगा, एक बार गिरफ्तार होंगे और सबकुछ समाप्त। माता पिता वकीलों के पीछे भाग रहे होंगे, ये जो आज कुछ डॉक्टर और वकील समर्थन कर रहे है ये पूछने भी नहीं वाले।

रहा प्रश्न सत्ता परिवर्तन का, तो वो दंगों से तो नहीं होगी। इसलिये भी क्योंकि हम ही नहीं होने देंगे, वोट आप कर सकते हो। राहुल गाँधी का एक विकल्प है, स्टैंफोर्ड से पढ़कर आया है, जीनियस है पिछले 12 साल से तो हम खुद उसके समर्थको से हर साल सुनते आ रहे है कि अब वो मैच्योर हो गया है।

हमें तो अच्छा विकल्प नहीं लगा इसलिए इन्हे बैठा दिया था, आपको अच्छा लगे तो पाड़े को बैठाओ। बाकि धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे से कुछ बदल जाएगा तो कुछ नहीं होगा, विलासराव देशमुख के इस्तीफे के बाद भी कोई आतंकी हमला नहीं रुका था।

इन सबसे जरुरी, व्यवस्था मे परिवर्तन करना है तो आपका जेल से बाहर रहना जरुरी है। आपके पास सीटें कम है, प्रतियोगिता बड़ी है, आज 100 मैदान मे हो तो लगभग एक लाख इस समय घर मे पढ़ाई कर रहे है। जो आपके इर्द गिर्द है वो 30-35% मे भी जंग जीत लेंगे, इसलिए आपका कुरुक्षेत्र जंतर मंतर नहीं बल्कि पुस्तके है।

छात्र धीरे धीरे लौट रहे है आप भी लौट आइये, इससे पहले कि बहुत देर हो जाये और पछतावा रह जाए।

(परख सक्सेना)

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