क्या तुमने कभी अपने जिगर के टुकड़े को अपनी ही गोद में ऑक्सीजन के अभाव में तड़पते और नीले पड़ते देखा है? क्या तुमने कभी उस असहनीय गंध और चीत्कारों को महसूस किया है, जब बाबा राघव दास (बीआरडी) मेडिकल कॉलेज के बदहाल वार्डों और गंदे फर्शों पर दर्जनों गरीब माताएं अपने दम तोड़ते मासूमों के ठंडे पड़ चुके शरीरों से लिपटकर छातियां पीट रही थीं?
चार दशक तक गोरखपुर और पूरे पूर्वांचल की हवाओं में केवल कफ़न उड़ते रहे। एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम (AES) और जापानी इंसेफेलाइटिस (JE) की विभीषिका में 50,000 से अधिक मासूम नौनिहालों की सांसें तिल-तिल कर बुझ गईं। वह केवल एक बीमारी नहीं थी, बल्कि प्रशासनिक संवेदनहीनता, नीतिगत पक्षाघात और सत्ता के आपराधिक संरक्षण का जीता-जागता नरसंहार था। उस दौर में लखनऊ के सत्ताधीश अपने राजनीतिक महलों में विलासिता, जातिवादी गोलबंदी और दलाली के गठजोड़ में मस्त थे।
उस दौर की भारतीय संसद का वह दृश्य स्मरण कीजिए। साल 2006 में 34 वर्ष का एक युवा भगवाधारी सांसद जब लोकसभा के पटल पर पूर्वांचल के उन अनाथ बच्चों का दर्द बयां करते हुए फफक-फफक कर रो पड़ा था, तो वह किसी राजनेता का घड़ियाली आंसू नहीं था। वह उस व्यवस्था की छाती पर संन्यासी का वज्रप्रहार था, जो हजारों बच्चों की लाशों पर बैठकर सत्ता की मलाई चाट रही थी। उस समय एयर-कंडीशनर कमरों में बैठकर आयातित क्रांतियों की बासी जुगाली करने वाले छद्म बुद्धिजीवी ठहाके लगा रहे थे। उन्हें लगा था कि एक संन्यासी का रुदन उसकी विवशता है।
वे अज्ञानी भूल गए थे कि जब एक संन्यासी रोता है, तो वह केवल विलाप नहीं करता, बल्कि एक पूरे युग के परिवर्तन का संकल्प बोता है।
जिस 22 वर्ष के नौजवान ने अपनी जीवित काया का स्वयं पिंडदान कर दिया हो, जिसने सांसारिक वैभव, कुल, जाति और ऐश्वर्य को लात मारकर अपनी भरी जवानी गुरु गोरखनाथ की अखंड धूनी में समर्पित कर दी हो, जिसके कानों की नसें चीरकर वैराग्य के कुंडल धारण कराए गए हों—उसे चंद दरबारी ‘केवल वस्त्र ओढ़ने वाला’ कहकर अपनी कुंठा शांत करेंगे? संन्यास किसी एयर-कंडीशन यूनिवर्सिटी के वामपंथी पर्चों पर छपने वाला सिद्धांत नहीं है; संन्यास वह भस्म है जिसे माथे पर मलकर साधक मृत्यु और भय के अहंकार को अपने पैरों तले कुचल देता है।
उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः।
न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः॥
(हितोपदेश)
अर्थात: कार्य केवल कोरी कल्पनाओं और खोखले नारों से सिद्ध नहीं होते, पुरुषार्थ की भट्ठी में तपने से होते हैं। सोए हुए सिंह के मुख में शिकार स्वयं चलकर नहीं आता।
2017 में जब उसी संन्यासी के हाथों में उत्तर प्रदेश का राजदंड आया, तो आलोचक कहने लगे कि मठ चलाने वाला साढ़े पच्चीस करोड़ की आबादी का सबसे जटिल राज्य कैसे चलाएगा? लेकिन उस संत ने राजनीति नहीं की, उसने शासन के संपूर्ण ‘काल-चक्र’ को ही उलट दिया।
इंसेफेलाइटिस का समूल संहार और स्वास्थ्य क्रांति: जिस दिमागी बुखार को अंतरराष्ट्रीय एजेंसियां और पूर्ववर्ती सरकारें ‘असाध्य’ मानकर हाथ खड़े कर चुकी थीं, उसकी रीढ़ संन्यासी के प्रशासनिक अनुशासन ने तोड़ दी। स्वास्थ्य, पंचायती राज, ग्रामीण विकास और जल शक्ति विभागों को एक सूत्र में पिरोकर जमीनी स्तर पर ‘दस्तक अभियान’ चलाया गया। उथले हैंडपंपों को सील कर हर घर तक शुद्ध पेयजल की पाइपलाइन पहुंचाई गई, क्लोरीन की गोलियां बांटी गईं और स्वच्छता को युद्ध स्तर पर लागू किया गया। परिणाम यह हुआ कि जिस बीमारी से हर साल हजारों बच्चे मरते थे, वहां 95% से अधिक मौतों को हमेशा के लिए इतिहास के पन्नों में दफन कर दिया गया। गोरखपुर में 1,000 बेड का एम्स (AIIMS), बीआरडी मेडिकल कॉलेज का विश्वस्तरीय कायाकल्प और हर जिले में मेडिकल कॉलेज का जाल उन आलोचकों के मुंह पर सबसे करारा तमाचा है।
माफिया तंत्र का अंत और ‘जीरो टॉलरेंस’: वह दौर याद कीजिए जब शाम छह बजते ही बाज़ार अपनी दुकानें बंद कर लेते थे, अपराधियों की गाड़ियों से असलहे बाहर लटकते थे और व्यापारी रंगदारी के डर से अपनी पैतृक जमीनें बेचकर पलायन कर रहे थे। सत्ता के संरक्षण में पलने वाले मुख्तार और अतीक जैसे दुर्दांत माफिया समानांतर सरकार चलाते थे। संन्यासी ने कानून की मर्यादा को पुनर्स्थापित किया। आज वही माफिया पुलिस की गाड़ी का सायरन सुनकर कांपते हैं, अदालतों में व्हीलचेयरों पर जान की भीख मांगते हैं और दुर्दांत अपराधी गले में तख्तियां लटकाकर थानों में आत्मसमर्पण करते हैं। अपराधियों द्वारा हड़पी गई 4,000 करोड़ से अधिक की अवैध संपत्तियों पर जब सरकार का बुलडोजर चला, तो उसी जमीन पर गरीबों और बेघरों के लिए आशियाने बनाए गए।
बीमारू राज्य से देश का औद्योगिक ग्रोथ इंजन: 2017 से पहले उत्तर प्रदेश को देश का ‘बीमारू राज्य’ और कानून-व्यवस्था के नाम पर कलंक माना जाता था। आज वही उत्तर प्रदेश 8 लाख करोड़ से अधिक की जीएसडीपी के साथ देश की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की दहलीज पर खड़ा है। पूर्वांचल एक्सप्रेसवे, बुंदेलखंड एक्सप्रेसवे, मेरठ एक्सप्रेसवे और निर्माणाधीन गंगा एक्सप्रेसवे ने यूपी को ‘एक्सप्रेसवे प्रदेश’ बना दिया। जेवर का नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट, डिफेंस इंडस्ट्रियल कॉरिडोर और हर जिले के हुनर को पहचान देने वाली ‘वन डिस्ट्रिक्ट वन प्रोडक्ट’ (ODOP) योजना ने यह साबित कर दिया कि जब नीति साफ और नीयत फौलादी हो, तो विकास हवा में नहीं, जमीन पर दौड़ता है।
सांस्कृतिक अस्मिता और पर्यटन का स्वर्णकाल: अयोध्या में 500 वर्षों के संघर्ष और कोटि-कोटि सनातनियों की प्रतीक्षा के बाद भव्य श्रीराम जन्मभूमि मंदिर में रामलला का विराजमान होना, काशी विश्वनाथ धाम का अलौकिक नव्य-भव्य स्वरूप और प्रयागराज का दिव्य-भव्य कुंभ—यह केवल धार्मिक आयोजन नहीं हैं, बल्कि भारत के सांस्कृतिक स्वाभिमान की पुनर्स्थापना और खरबों रुपये की टूरिज्म इकोनॉमी का सशक्त आधार हैं। आस्था का सम्मान और आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर का यह अभूतपूर्व संतुलन स्वतंत्र भारत के इतिहास में किसी चमत्कार से कम नहीं है।
नारी सुरक्षा और सामाजिक मर्यादा: आज रात के बारह बजे भी जब किसी गांव या शहर की सड़क पर कोई बेटी बेखौफ होकर अपनी स्कूटी दौड़ाती है, तो उस निडरता के पीछे किसी छात्र संघ के खोखले पर्चे नहीं, बल्कि ‘मिशन शक्ति’ और पुलिस का वह स्पष्ट निर्देश होता है जो शोहदों और अपराधियों को पाताल से भी खोजकर मिट्टी में मिलाने का सामर्थ्य रखता है। ‘नो कर्फ्यू, नो दंगा’ केवल एक नारा नहीं, उत्तर प्रदेश का जीवंत यथार्थ बन चुका है।
यथा काष्ठमयो हस्ती यथा चर्ममयो मृगः।
यश्च विप्रोऽनधीयानस्त्रयस्ते नामधारकाः॥
(मनुस्मृति)
अर्थात: काठ का बना हाथी और चमड़े से मढ़ा गया हिरण जिस प्रकार केवल दिखावे की वस्तु होते हैं, ठीक उसी प्रकार त्याग, निष्ठा और प्रत्यक्ष कर्म के बिना मंचों पर क्रांति का ढोल पीटने वाले केवल नाममात्र के विदूषक और पाखंडी होते हैं।
मंचों पर खड़े होकर जहर उगलने वाले अवसरवादियों! तुम्हारी पूरी जिंदगी वैचारिक जुगाली और सत्ता की दलाली में बीती। तुमने जीवन में कभी किसी गरीब के आंसू नहीं पोंछे, और तुम उस कर्मयोगी पर सवाल उठाते हो जिसने अपनी नींद, अपना सुख, अपना परिवार, अपनी जाति और अपना सर्वस्व इस माटी के स्वाभिमान के लिए होम कर दिया?
जिसका न कोई निजी बैंक खाता है, न कोई पारिवारिक उत्तराधिकारी, न कोई तिजोरी—उसे तुम किस सत्ता का लोभ दिखाकर डिगाओगे? जो संन्यासी रोज सुबह चार बजे अपनी देह को जनता के आंसुओं को पोंछने और प्रदेश के नवनिर्माण के लिए तपाता हो, उसके पुरुषार्थ पर भौंकने वाले केवल अपनी बौद्धिक दिवालियापन का प्रदर्शन करते हैं।
सूरज की ओर मुंह करके थूकने वालों की लार हमेशा उनके अपने ही चेहरों पर गिरती है। तुम्हारी कुंठा, तुम्हारी गालियां और तुम्हारे दुष्प्रचार की उम्र केवल उस माइक के बंद होने तक है, लेकिन उस संन्यासी का पुरुषार्थ और तपस्या उत्तर प्रदेश के कायाकल्प और भारत के इतिहास की छाती पर लोहे की कील की तरह अमिट होकर दर्ज हो चुकी है।
तुम हॉस्टलों में मुफ्त की रोटियां तोड़कर गालियां बांटते रहे, और वो भस्म लपेटकर पूरे उत्तर प्रदेश की तकदीर बदल गया!
(अमरीश मनीष शुक्ल, प्रयागराज)



