RSS के 100 साल: भैयाजी दाणी का जीवन संघ के इतिहास का वह अध्याय है, जिसने त्याग, निष्ठा और नेतृत्व का असाधारण उदाहरण प्रस्तुत किया..
आरएसएस के सौ वर्षों की यात्रा में अनगिनत व्यक्तित्वों ने अपनी छाप छोड़ी है, लेकिन भैयाजी दाणी का नाम उन लोगों में सबसे ऊपर आता है जिनके बिना इस संगठन का इतिहास अधूरा माना जाएगा। वह न केवल संघ के पहले विवाहित प्रचारक थे, बल्कि दो बार सरकार्यवाह जैसे अत्यंत महत्वपूर्ण पद पर बने रहने वाले भी गिने जाते हैं। इस कड़ी में भैयाजी दाणी की वही अनोखी और प्रेरक कहानी प्रस्तुत है, जिसने संघ के शुरुआती दशकों को नई दिशा दी।
गुरु गोलवलकर का आह्वान और भैयाजी दाणी का निर्णायक कदम
साल 1942 में गुरु गोलवलकर ने सभी स्वयंसेवकों से यह आग्रह किया कि वे परिवार से दूर रहकर, पूर्णकालिक रूप से संघ कार्य में उतरें और प्रचारक के रूप में काम संभालें। यह बात सुनकर भैयाजी दाणी ने अपने जीवन का गंभीर आत्ममंथन किया। उन्हें लगा कि संघ के लिए उन्हें आगे बढ़ना चाहिए। इसी निर्णय के बाद वे इतिहास में दर्ज पहले ऐसे प्रचारक बने, जो विवाहित थे और गृहस्थ जीवन छोड़कर संघ के लिए समर्पित हो गए।
जनसंघ की स्थापना और हिंदू महासभा का तनावपूर्ण दौर
जब जनसंघ की नींव रखी गई, तब हिंदू महासभा के कई प्रभावशाली नेता संघ से रुष्ट हो गए। उनका विचार था कि संघ को राजनीतिक रास्ता अपनाना चाहिए और महासभा के साथ मिलकर काम करना चाहिए। इनमें उत्तर प्रदेश के नेता विशन चंद्र सेठ लगातार गुरु गोलवलकर को पत्र लिखते रहते थे। गुरुजी हर बार सिर्फ इतना उत्तर देते—“ये बातें पत्र में नहीं हो सकतीं, सामने मिलेंगे तब चर्चा होगी।”
संयोग ऐसा बना कि एक रेल यात्रा के दौरान गुरुजी की भेंट अचानक विशन चंद्र सेठ से हो गई। साथ बैठे भैयाजी की ओर इशारा करते हुए गुरु गोलवलकर ने कहा – “ये हमारे सरकार्यवाह हैं। संगठन से जुड़ी सारी प्रमुख बातें ये देखते हैं। मैं मार्गदर्शक हूं, आप अपनी बात इनसे कीजिए।” इसके बाद भैयाजी ने पूरी स्थिति को अपने तरीके से समझाकर शांत किया।
सरसंघचालक मार्गदर्शक, सरकार्यवाह संघ का ‘मुख्य संचालन अधिकारी’
संघ की व्यवस्था में सरसंघचालक का स्थान मार्गदर्शक का होता है, जबकि सरकार्यवाह पूरे संगठन के संचालन, कार्यक्रमों और योजनाओं के वास्तविक प्रमुख होते हैं। जितना विशाल संघ का ढांचा है—प्रांतों से लेकर हजारों शाखाओं तक—उतनी ही बड़ी जिम्मेदारी सरकार्यवाह के पास रहती है।
इसीलिए भैयाजी दाणी की भूमिका और रोचक बन जाती है, क्योंकि वे पहले गृहस्थ प्रचारक भी थे और एकमात्र ऐसे सरकार्यवाह, जिन्होंने बीच में विराम लेने के बाद दोबारा वही पद संभाला।
भैयाजी दाणी: नागपुर के ‘श्रीमंत’ परिवार से संघ के मूल स्तंभ तक
भैयाजी दाणी का पूरा नाम प्रभाकर बलवंत दाणी था। उनका जन्म नागपुर जिले की उमरेड तहसील के एक संपन्न परिवार में हुआ था। उनके पिता लोकमान्य तिलक के अनुयायी थे और तिलक जब उमरेड आए थे, तो दाणी परिवार के घर ही ठहरे थे।
नागपुर में पढ़ाई के दौरान भैयाजी का संबंध डॉ. हेडगेवार, परांजपे, बापट और मुंजे जैसे राष्ट्रवादी नेताओं से जुड़ने लगा। इन्हीं संपर्कों ने भैयाजी को संघ के शुरुआती दौर में ही एक महत्वपूर्ण चेहरा बना दिया। संघ के नामकरण वाली बैठक में भैयाजी दाणी भी मौजूद थे और “महाराष्ट्र स्वयंसेवक संघ” नाम का सुझाव भी उन्होंने ही दिया था।
नागपुर से बाहर पहली शाखा और ‘गुरुजी की खोज’—दोनों का श्रेय भैयाजी को
डॉ. हेडगेवार चाहते थे कि भैयाजी नागपुर छोड़कर बीएचयू में पढ़ाई के लिए जाएं। इसी दौरान काशी में संघ की पहली शाखा खुली, जो नागपुर के बाहर संघ का पहला विस्तार था। भैयाजी दाणी ने ही बीएचयू में अलग-अलग प्रांतों के छात्रों को जोड़कर शाखा शुरू की। मालवीय जी के सहयोग से परिसर में संघ का कार्यालय भी बन सका।
इसी बीएचयू के वातावरण में भैयाजी दाणी ने गुरु गोलवलकर (तब बीएचयू के प्राध्यापक) की प्रतिभा को पहचानकर, उन्हें संघ से जोड़ने की दिशा में पहला कदम रखा। बाद में वही गुरु गोलवलकर, डॉ. हेडगेवार के उत्तराधिकारी बने।
गृहस्थ जीवन की बाधाएँ और गुरुजी का सहयोग
नागपुर लौटने के बाद, भैयाजी दाणी ने वकालत शुरू की। उनका घर गिरिपेठ में संघ कार्यालय जैसा ही बन गया था। इसी बीच परिवार के दबाव से उन्होंने विवाह भी किया, परंतु परिवार चाहता था कि वे घरेलू ज़िम्मेदारियों में समय दें। गुरु गोलवलकर ने इस स्थिति में परिवार से बात कर भैयाजी की सहायता की और धीरे-धीरे उन्हें फिर से संघ कार्य में पूरी तरह सक्रिय किया।
1942 का निर्णय—पहले विवाहित प्रचारक
गुरुजी के आह्वान के बाद भैयाजी दाणी ने गृहस्थी छोड़ दी और संघ के लिए निकल पड़े। उस समय विवाहित व्यक्ति का पूर्णकालिक प्रचारक बनना असामान्य था, लेकिन भैयाजी ने यह कदम उठाया।
उन्हें मध्य भारत का दायित्व सौंपा गया—इंदौर, उज्जैन, ग्वालियर जैसे क्षेत्रों में उन्होंने गहरी पकड़ बनाई। तीन वर्षों की दौड़भाग से उनका स्वास्थ्य बिगड़ा, परंतु संघ के लिए मध्य भारत मजबूत आधार बन गया।
प्रतिबंध, विभाजन और अशांति—सबसे कठिन समय में सरकार्यवाह के रूप में 11 वर्ष
1945 में भैयाजी को संघ का सरकार्यवाह चुना गया। उनके कार्यकाल के प्रारंभिक वर्ष अत्यंत संघर्षपूर्ण रहे—
देश स्वतंत्रता की दहलीज पर था..विभाजन से लाखों लोगों का जीवन बिखर गया..पुनर्वास के बड़े कार्यों का जिम्मा संघ ने उठाया..गांधीजी की हत्या के बाद संघ पर प्रतिबंध लगा
गुरुजी को जेल भेजा गया
उसी समय उमरेड में हजारों लोगों ने भैयाजी के घर पर हमला कर दिया, परंतु वे नागपुर में ही डटे रहे और संगठन को संभालते रहे। गुरुजी का संदेश उन्होंने हर जगह भेजा – “किसी भी हानि के बावजूद, हिंसा का मार्ग मत अपनाना।” संघ के प्रतिबंध हटाने, संविधान बनाने, नए संगठनों (जैसे ABVP और वनवासी कल्याण आश्रम) के निर्माण तक, हर मोर्चे पर भैयाजी केंद्र में रहे।
सत्ता की लालसा वालों को स्पष्ट संदेश
जब जनसंघ बना और कई स्वयंसेवक चुनाव हारकर निराश हुए, भैयाजी ने बैठक बुलाकर कहा—
“हमारी सेवा सत्ता पाने के लिए नहीं थी। जिसे सत्ता की चाह है, वह संघ से दूरी बना ले तो बेहतर है।”
उनके इन शब्दों ने संगठन को स्थिर रखा।
स्वास्थ्य गिरने पर विराम और फिर वापसी
1956 में पिता के निधन और स्वास्थ्य गिरने के कारण भैयाजी ने कुछ समय के लिए पद छोड़ा और उमरेड लौट गए।
छह साल बाद गुरुजी ने फिर से उन्हें वापस बुलाया और वे दोबारा सरकार्यवाह बने—यह संघ इतिहास में दुर्लभ घटना है।
अंतिम समय और उनकी विरासत
1965 में इंदौर प्रवास के दौरान उनकी तबीयत अचानक बिगड़ी और वहीं उनका निधन हो गया। उनके जाने के बाद उनकी संगठन क्षमता, विनोदप्रियता और सरल भाषा में कठिन परिस्थितियों को हल कर देने की कला की खूब चर्चा हुई।
(प्रस्तुति – त्रिपाठी पारिजात)



