RSS के 100 वर्ष: डॉ. हेडगेवार के स्मृति मंदिर के निर्माण का वृत्तांत जिसमें गुरु गोलवलकर, हाकिम भाई जैसे लोगों की भूमिका और कई भावनात्मक तथा ऐतिहासिक प्रसंग जुड़े हुए हैं..
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के 100 साल पूरे होने के अवसर पर उसकी विरासत से जुड़ी कई ऐसी कहानियाँ सामने आती हैं, जिन्होंने संगठन को उसकी मौजूदा पहचान दिलाई। इन्हीं घटनाओं में से एक प्रमुख कथा है—डॉ. हेडगेवार के स्मृति मंदिर के निर्माण की, जिसमें गुरु गोलवलकर, हाकिम भाई जैसे लोगों की भूमिका और कई भावनात्मक तथा ऐतिहासिक प्रसंग जुड़े हुए हैं।
स्मृति मंदिर की शुरुआत—गुरु गोलवलकर का दृष्टिकोण
जब संघ संस्थापक डॉ. हेडगेवार का स्मृति मंदिर बनाने पर चर्चा शुरू हुई, तो गुरु गोलवलकर ने साफ कहा कि यह केवल एक स्मारक नहीं, बल्कि राष्ट्रीय महत्व का प्रतीक है। उन्होंने जोर देकर कहा कि हर स्वयंसेवक की भावनाएँ इससे जुड़ी हैं, इसलिए इसमें देश के प्रत्येक स्वयंसेवक का योगदान होना चाहिए। इसी सोच के साथ यह निर्णय लिया गया कि ‘एक स्वयंसेवक–एक रुपया’ अभियान चलाया जाएगा।
जबलपुर दंगों के बीच संघ मुख्यालय में काम कर रहे थे 22 मुस्लिम मजदूर
साल 1956 में गुरु गोलवलकर का 51वां जन्मदिन पूरे देश में मनाया गया। उसी समय संघ में डॉ. हेडगेवार की समाधि पर बनने वाले स्मृति मंदिर की भव्य योजना भी चर्चा में आई। संघ की केंद्रीय समिति ने निर्णय लिया कि स्मृति मंदिर के निर्माण के लिए एक विशेष समिति बनेगी, और इसकी अध्यक्षता स्वयं सरसंघचालक गुरु गोलवलकर करेंगे। 1957 में इस समिति का रजिस्ट्रेशन भी कराया गया।
उस समय संघ के पास ‘गुरु दक्षिणा’ से जितनी धनराशि आती थी, वह मुख्यतः संगठन संचालन और विस्तार के काम में खर्च हो जाती थी। इसलिए यह तय किया गया कि स्मृति मंदिर का निर्माण भी स्वयंसेवकों के सहयोग से ही किया जाएगा।
हालाँकि निर्माण की लागत इतनी अधिक नहीं थी कि उसे सिर्फ नागपुर या विदर्भ क्षेत्र वहन न कर सके, लेकिन गुरु गोलवलकर का मानना था कि यह राष्ट्रीय स्मारक है—इसलिए हर स्वयंसेवक का योगदान आवश्यक है। इससे संगठनात्मक जुड़ाव और भी मजबूत होगा।
राम मंदिर आंदोलन में जिस तरह प्रस्तावित मंदिर का मॉडल घर-घर भेजा गया था, उसी प्रकार ‘स्मृति मंदिर’ की तस्वीर भी प्रत्येक स्वयंसेवक तक भेजी गई। इसका गहरा भावनात्मक असर हुआ और स्वयंसेवक इस अभियान से व्यक्तिगत रूप से जुड़ गए।
21 अक्टूबर 1959 को गुरु गोलवलकर ने इस संबंध में एक विस्तृत बयान भी जारी किया, जिसे हर स्वयंसेवक तक पहुँचाया गया। इसी वर्ष स्मृति मंदिर की आधारशिला भी रख दी गई।
डिज़ाइन के पाँच मूल निर्देश
स्मारक समिति बनने से पहले ही गुरु गोलवलकर ने मुंबई के प्रसिद्ध वास्तुकार गोविंद वासुदेव दीक्षित से स्मृति मंदिर का डिजाइन तैयार करने को कहा था। दीक्षित ने अक्टूबर 1956 में मुंबई में आकर यह डिजाइन सौंप दिया। इससे पहले संघ के अधिकारियों ने अगस्त 1956 में इसकी आंतरिक रूपरेखा पर विस्तार से चर्चा कर ली थी।
इस डिजाइन से पाँच महत्वपूर्ण निर्णय सामने आए –
मूल समाधि स्थल में कोई बदलाव नहीं होगा।
समाधि को एक कमरे के भीतर रखा जाएगा, जिसके चारों ओर दीवारें होंगी, एक मुख्य द्वार होगा और उसके ऊपर डॉ. हेडगेवार की प्रतिमा स्थापित की जाएगी।
पूरा निर्माण केवल पत्थरों से किया जाएगा।
सजावट में अनावश्यक खर्च नहीं होगा; सब कुछ सादगी और तार्किकता आधारित होगा।
आर्किटेक्चर पूर्णतः भारतीय होगा और निर्माण में स्वदेशी सामग्री ही प्रयोग की जाएगी।
गुरु गोलवलकर को दीक्षित की डिजाइन में कहीं-कहीं मुगल स्थापत्य जैसा प्रभाव दिखा, जिसे उन्होंने बदलने का सुझाव दिया।
समाधि पर पहले हुए हमले की कहानी
जिस स्थान पर हेडगेवार की समाधि थी, वहाँ पहले केवल एक चबूतरा था। गांधीजी की हत्या के बाद फैले माहौल में संघ के खिलाफ भड़काए गए गुस्से के कारण एक उन्मादी भीड़ ने इस समाधि को नुकसान पहुँचाया था। संघ पर लगे प्रतिबंध के कारण तुरंत कुछ नहीं किया जा सका।
डेढ़ साल बाद प्रतिबंध हटने पर इसकी मरम्मत की गई और एक अस्थायी ढांचा बनाकर उसे ढका गया।
इस ढांचे में देशभर से मंगाए गए विभिन्न पत्थरों का उपयोग किया गया था—कांगड़ा, जैसलमेर, वडोदरा का ग्रीन स्टोन, मकराना का संगमरमर और मैसूर के चामुंडा हिल्स का लाल ग्रेनाइट।
पत्थर की खोज और हाकिम भाई का प्रवेश
स्मृति मंदिर के निर्माण के लिए उपयुक्त पत्थर की खोज शुरू हुई। उम्मीद थी कि महाराष्ट्र में अच्छा पत्थर मिल जाएगा, लेकिन ऐसा संभव नहीं हुआ। अंततः यह खोज राजस्थान के जोधपुर के बलुआ पत्थर और महाराष्ट्र के बेसाल्ट पत्थर पर आकर समाप्त हुई।
डॉ. हेडगेवार की प्रतिमा बनाने का कार्य प्रसिद्ध मूर्तिकार नानाभाई गोरेगांवकर को दिया गया। रानी लक्ष्मीबाई की उनकी प्रतिमा का उद्घाटन 1958 में राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद कर चुके थे। काम शुरू तो मई 1959 में हो गया था, लेकिन अगस्त तक नींव का कार्य पूरा कर लिया गया। जनवरी 1960 तक पहली मंजिल लगभग तैयार हो चुकी थी।
इसी समय समस्या आई कि स्थानीय कारीगर बलुआ पत्थर पर काम करने के अभ्यस्त नहीं थे। ऐसे में राजस्थान से बुलाए गए हाकिम भाई, जो इस काम के विशेषज्ञ थे, ने प्रोजेक्ट संभाल लिया।
जबलपुर दंगे और मजदूरों का डर
हाकिम भाई के साथ आए उनके 22 मुस्लिम मजदूर तेज गति से काम कर रहे थे, लेकिन अचानक जबलपुर में दंगे भड़क गए। नागपुर से दूरी कम होने के कारण मजदूर भयभीत हो गए कि वे हिंदुओं के सबसे बड़े संगठन के मुख्यालय में काम कर रहे हैं—अगर स्थिति बिगड़ी तो उनकी सुरक्षा कौन करेगा?
कुछ मजदूर तो समझाने के बावजूद काम छोड़कर चले गए। स्थिति गंभीर होती देख पांडुरंग पंत क्षीरसागर ने उन्हें समझाया, सुरक्षा का भरोसा दिया। जब बात नहीं बनी, तो गुरु गोलवलकर स्वयं उनसे मिलने आए और इतने आत्मीय भाव से समझाया कि मजदूर रुक गए।
बाद में हाकिम भाई ने ‘ऑर्गनाइज़र’ को दिए इंटरव्यू में बताया कि काम खत्म होने पर गुरुजी ने उन्हें सम्मानित किया—शॉल, श्रीफल, सोने की अंगूठी और प्रमाणपत्र देकर। उनका परिवार आज भी इन उपहारों को घर में सहेजकर रखे हुए है।
कांची शंकराचार्य का विशेष संदेश
रंगा हरि की पुस्तक “The Incomparable Guru Golwalkar” के अनुसार, गुरुजी चाहते थे कि स्मृति मंदिर जैसे पवित्र स्थल का उद्घाटन किसी महान संत द्वारा ही हो। उन्होंने कांची कामकोटि पीठ के शंकराचार्य को आमंत्रित किया।
लेकिन शंकराचार्य उस समय केवल पैदल यात्रा करने का संकल्प लिए हुए थे और नागपुर आने में महीनों लग जाते। उद्घाटन की तारीख 5 अप्रैल 1962—डॉ. हेडगेवार की जयंती—पहले से तय थी।
इस स्थिति में शंकराचार्य स्वयं तो नहीं आए, लेकिन अपना संदेश, साथ में विभूति, कुमकुम और अभिमंत्रित अक्षत भेजे।
उनका संदेश समारोह में पढ़ा गया, जिसकी अंतिम पंक्तियाँ थीं – “कामना है कि यह स्मृति मंदिर हर भारतीय को डॉ. हेडगेवार की राष्ट्रभक्ति और त्याग का स्मरण कराए, और वे भी देश-धर्म के मार्ग को अपनाएँ।”
गुरु गोलवलकर की अंतिम इच्छाएँ
गुरु गोलवलकर ने अपने अंतिम दिनों में तीन पत्र लिखकर सुरक्षित रखे थे, जिन्हें उनकी अंतिम यात्रा के बाद खोला गया। इनमें से एक पत्र में उन्होंने अपने उत्तराधिकारी के रूप में बालासाहब देवरस का नाम लिखा था। दूसरे पत्र में उन्होंने कहा था कि यदि उनके व्यवहार से किसी का दिल दुखा हो, तो वे क्षमा चाहते हैं।
तीसरे और सबसे महत्वपूर्ण पत्र में उन्होंने लिखा:
“हमारे काम का उद्देश्य राष्ट्र की पूजा है; यहाँ किसी भी व्यक्ति-पूजा की जगह नहीं। संघ के संस्थापक के अलावा किसी और का स्मारक बनाने की आवश्यकता नहीं। मैंने स्वयं का आत्म-श्राद्ध संस्कार पहले ही कर दिया है, इसलिए किसी अन्य अनुष्ठान की जरूरत नहीं।”
संघ ने उनकी इच्छा का सम्मान किया, लेकिन उनका दाह संस्कार स्मृति मंदिर के पास ही किया गया। वहाँ एक स्मृति-चिन्ह के रूप में यज्ञ-ज्वाला स्वरूप एक प्रतीक स्थापित किया गया।
(प्रस्तुति -त्रिपाठी पारिजात)



