Wednesday, March 11, 2026
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Gun Salute: आखिर क्यों दी जाती है 21 तोपों की सलामी ? – क्या है इसका इतिहास?

Gun Salute: 21 तोपों की सलामी का इतिहास: आखिर क्यों दी जाती है यह सर्वोच्च सैन्य सलामी, क्या है इसकी परंपरा और महत्व?..

Gun Salute: 21 तोपों की सलामी का इतिहास: आखिर क्यों दी जाती है यह सर्वोच्च सैन्य सलामी, क्या है इसकी परंपरा और महत्व?..

रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन इन दिनों भारत दौरे पर हैं। नई दि

ल्ली स्थित राष्ट्रपति भवन में उनका औपचारिक और भव्य स्वागत किया गया, जहां उन्हें 21 तोपों की सलामी दी गई। भारत में इसे किसी भी विशिष्ट अतिथि को दिया जाने वाला सबसे बड़ा सैन्य सम्मान माना जाता है। हालांकि जब भी ऐसी सलामी दी जाती है, लोगों के मन में सवाल उठता है कि आखिर 21 तोपों की सलामी ही क्यों दी जाती है और यह परंपरा कैसे शुरू हुई।

21 तोपों की सलामी को पूरी दुनिया में सर्वोच्च राजकीय सम्मान का प्रतीक माना जाता है। भारत में इस परंपरा की जड़ें ब्रिटिश शासन काल से जुड़ी हैं। आज भी देश में राष्ट्रपति, राष्ट्रीय ध्वज के सम्मान और विशेष राज्य समारोहों के दौरान यही सलामी दी जाती है। आजादी से पहले नियम अलग थे और पद के अनुसार सलामी में इस्तेमाल होने वाली तोपों की संख्या भी बदलती रहती थी। उस समय राजा को 101 तोपों की सलामी दी जाती थी, जबकि वायसराय या गवर्नर जनरल को 31 तोपें दागी जाती थीं। विदेशी राष्ट्राध्यक्षों के लिए 21 तोपों की सलामी तय थी।

इस परंपरा का इतिहास सैकड़ों साल पुराना माना जाता है। माना जाता है कि इसकी शुरुआत 14वीं सदी में हुई, जब युद्ध में पहली बार तोपों का इस्तेमाल शुरू हुआ। उस दौर में जब कोई जहाज या किला अपनी सभी तोपें एक साथ चला देता था, तो इसका मतलब होता था कि वे शांति के इरादे से आए हैं, न कि युद्ध करने। उस समय युद्धपोत आमतौर पर 7 तोपें दागते थे, क्योंकि अंक सात को शुभ और धार्मिक रूप से खास माना जाता था। इसके जवाब में बंदरगाह तीन गुना यानी 21 गोलियां चलाते थे। धीरे-धीरे यही व्यवस्था पूरी दुनिया में सम्मान की मानक परंपरा बन गई।

आज के समय में भी भारत में गणतंत्र दिवस समारोह या किसी विदेशी राष्ट्राध्यक्ष के आधिकारिक स्वागत के दौरान 21 तोपों की सलामी दी जाती है। माना जाता है कि भारत में यह परंपरा लगभग 150 साल पुरानी है। आजादी के बाद पहली बार 26 जनवरी 1950 को डॉ. राजेंद्र प्रसाद के राष्ट्रपति बनने पर उन्हें 21 तोपों की सलामी दी गई थी। वर्ष 1971 के बाद यह अंतरराष्ट्रीय मानक तय हुआ कि केवल राष्ट्रपति और विदेशी राष्ट्राध्यक्षों को ही यह सलामी दी जाएगी।

अक्सर लोग समझते हैं कि 21 तोपों की सलामी के लिए 21 अलग-अलग तोपें लाई जाती होंगी, लेकिन ऐसा नहीं है। वास्तव में इस सम्मान के लिए केवल 8 तोपों का इस्तेमाल किया जाता है। इनमें से 7 तोपें तीन-तीन बार फायर करती हैं, जबकि आठवीं तोप को रिजर्व के तौर पर रखा जाता है। फायरिंग का समय भी पूरी तरह तय होता है—हर 2.25 सेकेंड में एक फायर किया जाता है और पूरी सलामी मात्र 52 सेकेंड में पूरी हो जाती है।

एक और खास बात यह है कि इन तोपों से असली गोले नहीं दागे जाते। इसके बजाय विशेष सेरेमोनियल कार्ट्रिज इस्तेमाल किए जाते हैं, जिनसे तेज आवाज और हल्का धुआं निकलता है, लेकिन किसी तरह का नुकसान नहीं होता।

इस तरह 21 तोपों की सलामी केवल एक सैन्य औपचारिकता नहीं है, बल्कि यह सदियों पुरानी परंपरा का प्रतीक है, जो आज भी सम्मान, गरिमा और उच्चतम राजकीय आदर का सबसे बड़ा संकेत मानी जाती है।

(प्रस्तुति -अर्चना शैरी)

 

 

 

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