Acharya Anil Vats द्वारा प्रस्तुत इस आलेख में आप पढ़ें भगवान् भोलेनाथ के ज्योतिर्लिंग एवं शिवलिङ्ग के प्रथम प्रादुर्भाव की कथा..
लिङ्ग के प्रथम प्रादुर्भाव-प्रकरण शिव पुराण और लिङ्ग पुराण दोनों में दिया हुआ है। स्कंद पुराण में भी इस कथा का वर्णन है।
वर्तमान स्वेतवाराह कल्प के पहले सारी सृष्टि जलमग्न और तमस (अंधकार) से आच्छादित थी। तब भगवान विराट को ब्रह्मा जी ने नारायणरूप से क्षीरसागर में शयन करते देखा। भगवान की माया से मोहित होकर ब्रह्मा जी ने उन्हें जगाया और कहा – तुम कौन हो ? भगवान उठे और हंसकर बोले – पुत्र ! स्वागत है। इस पर ब्रह्मा जी ने कहा कि मैं सृष्टि का पितामह हूं , तुम मुझे पुत्र कहते हो। तब विष्णु भगवान ने कहा कि सृष्टि के कर्त्ता-धर्त्ता हम हैं। दोनों में श्रेष्ठता को लेकर विवाद हो गया।
तभी एक अति प्रकाशवान ज्योतिर्लिंग उत्पन्न हुआ। उस लिंग के प्रादुर्भाव को देखकर दोनों ने यह निश्चय किया कि जो कोई उस लिङ्ग के अंतिम भाग को स्पर्श करेगा , वही श्रेष्ठ है। वह लिंग नीचे और ऊपर दोनों ओर था। ब्रह्मा जी हंस बनकर लिङ्ग का अग्रभाग खोजने ऊपर की ओर चले और विष्णु जी वराह बनाकर लिङ्ग के नीचे की ओर चल पड़े।
दोनों हजारों वर्ष तक यात्रा करते रहे , परंतु लिङ्ग का अंत नहीं पा सके। तब दोनों व्याकुल हो लौट आए और बार-बार उस ज्योतिर्लिंग को प्रणाम कर विचार करने लगे कि यह क्या है ? तभी उन दोनों को प्लुत स्वर से ” ओऽम्-ओऽम् ” का शब्द सुनाई पड़ा। शब्द का अनुसंधान करके जब लिङ्ग की ओर देखा , तो ” ॐकार स्वरूप ” स्वयं शिव दिख पड़े।
महेश्वर ने कहा – मेरे दो रूप हैं – सकल और निष्कल। दूसरे किसी के ऐसे रूप नहीं हैं। पहले मैं स्तंभरूप से प्रकट हुआ , फिर अपने साक्षात् रूप से। ‘ ब्रह्म भाव ‘ मेरा निष्कल रूप है और ‘ महेश्वर भाव ‘ मेरा सकल रूप है। ये दोनों मेरे ही सिद्धरूप हैं।
तदनन्तर महेश्वर की ब्रह्मा और विष्णु स्तुति करने लगे –
नमो निष्कलरुपाय नमो निष्कल तेजसे।
नम: सकलनाथाय नमस्ते सकलात्मने।।
नमः प्रणववाच्याय नमः प्रणवलिंगिने।
नम: सृष्ट्यादिकर्त्रे च नमः पंचमुखाय ते।।
शिव तथा शिवलिंग पर एक बहुत ही अच्छा प्रसंग शिव पुराण में है।
ऋषियों सहित शौनक जी ने सूत जी से पूछा – मूर्ति में ही सर्वत्र देवताओं की पूजा होती है , लिङ्ग में नहीं। परंतु भगवान शिव की पूजा सब जगह मूर्ति में और लिङ्ग में भी क्यों की जाती है ?
सूत जी ने कहा – एकमात्र भगवान शिव ही ब्रह्मरूप होने के कारण निष्कल (निराकार) तथा रूपवान होने के कारण सकल (साकार) भी कहे गये हैं। शिव के निष्कल-निराकार होने के कारण ही उनकी पूजा का आधारभूत लिङ्ग भी निराकार हुआ अर्थात् शिवलिङ्ग शिव के निराकार स्वरूप का प्रतीक है।
इसी भांति शिव के सकल या साकाररूप होने के कारण उनकी पूजा का आधारभूत विग्रह साकार प्राप्त होता है। शिव का साकार विग्रह उनके साकारस्वरूप का प्रतीक होता है। यही कारण है कि सब लोग लिङ्ग (निराकार) और मूर्ति (साकार) दोनों में ही सदा भगवान शिव की पूजा करते हैं।
सकल और निष्कल – दोनों रूप होने से शिव ” ब्रह्म ” शब्द से कहे जानेवाले परमात्मा हैं।
शिवजी से भिन्न जो अन्य देवता हैं , वे साक्षात् ब्रह्म नहीं हैं। इसलिए कहीं भी उनके लिए निराकार लिंग उपलब्ध नहीं होता।
अतएव पद्म पुराण में कहा गया है –
यो न पूज्यते लिङ्गम ब्रह्मादीनां प्रकाशकम्।
शास्त्रवित् सर्ववेत्तापि चतुर्वेद: पशुस्तु स:।।
अर्थ – ब्रह्मा आदि देवताओं के प्रकाशक अथवा ब्रह्मज्ञान आदि को प्रकाशित करनेवाले शिवलिङ्ग का जो पूजन नहीं करता, वह चारों वेदों का तथा शास्त्रों का ज्ञाता और सर्ववेत्ता होने पर भी पशु के समान है।
महाशिवरात्रि पर्व पर आपको हार्दिक शुभकामनाएं।
(आचार्य अनिल वत्स)