Acharya Anil Vats के इस लेख में पढ़िये शिव-शक्ति की अमर प्रेम कथा के विषय में जो उस मोड़ पर पहुंच रही है जहाँ देवी का ये पश्चाताप आने वाले समय में उनके प्रेमपूर्ण दाम्पत्य रिश्ते के बीच उठने वाली महाप्रलय का एक विकराल रूप लेने वाला है! ..
जब देवी सती, माता सीता का रूप धारण कर प्रभु राम की परीक्षा लेने पहुँचीं और श्रीराम जी ने उन्हें “माता श्री” कहकर सम्मानपूर्वक प्रणाम किया, तभी उनके हृदय में एक तीव्र कंपन हुआ ! जिन भगवान राम को वे अब तक एक साधारण मनुष्य मात्र मान कर चल रहीं थीं, उन्होंने न केवल उनके भीतर के वास्तविक रूप को पहचान लिया था, बल्कि उन्हें पूरे सम्मान, मर्यादा और ममता के भाव से “माता श्री” कहकर संबोधित भी किया था!
उनकी मुस्कान में कोई छल नहीं था, कोई कठोरता नहीं थी ! वहां मात्र एक इस प्रकार की शांति विद्यमान थी जो सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान और सर्वमित्रवत भगवान में ही होती है! यह वो क्षण था जब देवी सती का क्षद्म दर्प, आत्मबल और ज्ञान का अभिमान चूर-चूर हो चुका था! कथा के प्रारंभ में देवी सती के मन में उठा संदेह अब अपने सामने मौजूद श्रीराम के दैवीय रूप और लौकिक स्वरूप के समक्ष भीतर ही भीतर लज्जित हो रहा था!
सती अब न राम की ओर देख पा रही थीं, न ही अपने भीतर झाँकने का साहस ही कर पा रही थीं ! उनका अंतर्मन कह रहा था, “मैंने अनजाने में ईश्वर को परखा, जिन्होंने मेरी परीक्षा बिना पूछे ही ले ली ! उन्होंने मेरी माया को देखा, फिर भी न मेरी निंदा की, न उपेक्षा, केवल मातृ रूप में सच्चा सम्मान ही दिया! ”
वह लौट तो आईं शिवजी के पास,लेकिन मन में छिपे एक ऐसे अपराधबोध के साथ, जो भीतर ही भीतर उनको खाए जा रहा था ! जब शिवजी ने उनसे पूछा, “हे देवी! क्या तुमने प्रभु श्रीराम की सत्यता जानने के लिए उनकी परीक्षा ली ?”
तब देवी सती, जो उस क्षण अपने मन में उपजे भय, लज्जा और पश्चाताप में डूबी हुईं थीं,वो घबराहट में अनचाहे ही एक झूठ बोल गईं कि,”नहीं प्रभु, मैंने उनकी कोई परीक्षा नहीं ली!” यह झूठ एक साधारण स्त्री का बोला गया झूठ नहीं था, बल्कि यह तो साक्षात शक्ति स्वरूपा सती का झूठ था ! ये झूठ बोला भी गया तो भगवान शिव के सामने बोला गया, जो स्वयं अंतर्यामी हैं, तपस्वी हैं, और जिनका प्रेम निश्छल और निर्मल है !
शिवजी ने उस क्षण तो कुछ नहीं कहा, परंतु उनके भीतर अन्तर्मन में एक भयंकर झंझावात सा उठा ! वे देवी सती को ये भी नहीं कह सकते थे कि “देवी आपने आज साक्षात ईश्वर की परीक्षा लेने का महापाप किया है!” क्योंकि शिव का प्रेम, केवल वाणी के आधार पर न्याय नहीं करता, उनका न्याय तो मन में श्रद्धा या संदेह के भाव पर आधारित है ! ऐसी स्थिति में भगवान शिव के भीतर एक गहन मौन जन्मा, वह मौन जो देवी सती के “पत्नि रूप में अस्वीकार्यता” का संकेत था ! इस संवाद के पश्चात उन्होंने देवी सती को पत्नी की दृष्टि से देखना बंद कर दिया! उनके लिए अब देवी सती “मातृस्वरूपा” थीं, क्योंकि देवी सती ने श्री राम की परीक्षा के लिए माता सीता का रूप लिया था और शिवजी ठहरे श्रीराम के अनन्य भक्त, जो देवी सीता को माता मानते थे!
इस एक झूठ ने शिव-शक्ति के बीच “पति-पत्नि के प्रेमपूर्ण रिश्ते” के स्वरूप को पूरी तरह से बदल कर रख दिया था! अब वो केवल पति-पत्नी भर नहीं रह गए थे; क्यूंकि एक तरफ शिव के रूप में थे “मौन तपस्वी” और दूसरी ओर सती के रूप में थीं आत्मग्लानि और पछतावे में डूबी एक “पत्नि की आत्मा!”
देवी सती के मन में उपजी ये भावनायें अब स्वयं सती को भीतर ही भीतर, हर पल रिसते हुए पुराने घाव की तरह साल रहीं थीं ! उन्होंने सिर्फ़ एक संदेह के चलते अपने ही प्रेमपूर्ण दाम्पत्य के रिश्ते के स्वरूप को कलंकित कर लिया था! देवी सती अब बस ये ही बात दिन-रात सोचतीं कि, “आख़िर क्यूँ मैंने अपने प्रभु को ठगा, उनके विश्वास को चोट पहुंचाई और वह भी केवल अपने मन में ईश्वर के प्रति उत्पन्न हुए “संदेह तथा शंका के कारण”
यह पछतावा और आंतरिक वेदना, अब देवी सती को भीतर से गूगल की धीमी आंच की अज्ञारी के समान धीरे धीरे, हर पल सुलगा रही थी! जो न पूरी तरह से जल रही थी, न ही पूरी तरह से बुझ पा रही थी, बस हर ओर उसका धुआं ही धुंआ दिखाई देता था! इसी अंतहीन, दिशाहीन और चहुंदिशि में अनवरत उड़ते हुए धुएँ के समान ही सती के मन की स्थिति भी एकदम डांवाडोल सी थी ! वे जानती थीं प्रेम और विश्वास के बीच झूठ का कोई स्थान नहीं होता ! अब ये कथा उस मोड़ पर पहुंच रही है जहाँ देवी का ये पश्चाताप आने वाले समय में उनके प्रेमपूर्ण दाम्पत्य रिश्ते के बीच उठने वाली महाप्रलय का एक विकराल रूप लेने वाला है! ॐ नमो पार्वती पतये हर हर महादेव !
(प्रस्तुति -आचार्य अनिल वत्स)