Acharya Anil Vats जी के इस लेख में पढ़िये नारद जी के माध्यम से भगवान कृष्ण ने गोपियों की सेवा का जो मर्म बताया है वह अद्भुत है..
श्री शंकर जी ने देव ऋषि नारद जी से श्री राधा कृष्ण की उपासना उनके स्वरूप और मंत्र आदि के विषय में बहुत रहस्य की बातें कही है उनमें से कुछ का दिग्दर्शन यहां करते हैं।
एक बार भगवान शंकर ने नारद जी से कहा देव ऋषि मैं भगवान के मंत्र का जाप और उनका ध्यान करता हुआ बहुत समय तक कैलाश पर रहा तब भगवान ने प्रकट होकर मुझे दर्शन दिए और वर मांगने को कहा मैंने बारंबार प्रणाम करके उनसे प्रार्थना की कृपा सिंधु आपका जो सर्वानंद मय समस्त आनंदो का आधार नित्य मूर्ति मान रूप है जिसे विद्वान लोग निर्गुण निष्क्रिय शांत ब्रह्म कहते हैं हे परमेश्वर मैं उसी रूप को अपनी आंखों से देखना चाहता हूं।
भगवान ने कहा आप यमुना जी के पश्चिमी तट पर मेरे वृंदावन में जाइए वहां आपको मेरे स्वरूप के दर्शन होगे इतना कह कर भगवान अंतर्ध्यान हो गए मैं उसी क्षण मनोहर यमुना तट पर जाकर देखा समस्त देवताओं के ईश्वरों के ईश्वर भगवान मनोहर गोप रूप धारण किए हुए हैं उनकी सुंदर किशोर अवस्था है श्री राधा जी के कंधे पर अपना अति मनोहर बायां हाथ रख वे सुंदर त्रिभंगी से खड़े मुस्कुरा रहे हैं आपके चारों ओर गोपियों का मंडल है शरीर की कांति सजल सदृश्य स्निग्ध श्यामवर्ण है आप आखिर कल्याण के एकमात्र आधार हैं।
इसके बाद भगवान श्री कृष्ण ने अमृतोपम मधुर वाणी में मुझसे कहा शंकर जी आपने अब मेरा यह परम अलौकिक रूप देखा है सारे उपनिषद मेरे इस घनीभुत निर्मल प्रेम में सच्चिदानंदघन रूप को ही निराकार निर्गुण सर्वव्यापी निष्क्रिय और परातपर ब्रह्म कहते हैं मुझ में प्रकृति से उत्पन्न कोई गुण नहीं है और मेरे गुण अनंत है उनका वर्णन नहीं हो सकता मेरे यह गु्ण तात्विक दृष्टि से सिद्ध नहीं होते इसलिए यह सब मुझको निर्गुण कहते हैं महेश्वर मेरे इस रूप को चरम चक्षुओं के द्वारा कोई देख नहीं सकता इसलिए वेद इसको अरुप या निराकार कहते हैं मैं अपने चैतन्यास के द्वारा सर्वव्यापी हूं इसलिए विद्वान लोग मुझको ब्रह्म कहते हैं और मैं इस विश्व प्रपंचका रचयिता नहीं हूं इसलिए पंडितजन मुझको निष्क्रिय बतलाते हैं शिव वस्तुतः सृष्टि आदि कोई भी कार्य में स्वयं नहीं करता मेरे अंश ब्रह्मा विष्णु रूद्र ही माया गुणों के द्वारा सृष्टि संहार का कार्य किया करते हैं।
देव ऋषि भगवान के इस प्रकार कहने और कुछ अन्य उपदेश करने पर मैंने उनसे पूछा नाथ आपकी इस युगल स्वरूप की प्राप्ति किस उपाय से हो सकती है इसे कृपा करके बतलाइए भगवान ने कहा हम दोनों के शरणापन होकर जो गोपी भाव से हमारी उपासना करते हैं उन्हीं को हमारी प्राप्ति होती है अन्य किसी को नहीं।
एक सत्य बात और है वह यह है कि पूरे प्रयत्न के साथ इस भाव की प्राप्ति के लिए श्री राधिका की उपासना करनी चाहिए है रुद्र यदि आप मुझे वश में करना चाहते हैं तो मेरी प्रिया श्री राधिका जी की शरण ग्रहण कीजिए।
अब प्रश्न होता है कि गोपी भाव क्या है और श्री राधा की शरणागति कैसे प्राप्त हो सकती है।
श्री कृष्ण सुख के लिए सरव त्याग यही गोपी की विशेषता है और यही गोपी भाव है निज सुख के लिए लोग बहुत कुछ त्याग करते हैं परंतु केवल कृष्ण सुख के लिए सर्व त्याग करना केवल गोपी में ही संभव है वस्तुतः यह कृष्ण सुख गोपी प्रेम का स्वरूप लक्षण है।
निज सुख कामना को प्रीति रस की उपाधि कहा गया है गोपी प्रेम में यह उपाधि नहीं है इसी से गोपी प्रेम को निरुपाधि प्रेम कहते हैं वस्तुत श्री कृष्ण सुख ही गोपी का सुख है स्वतंत्र सुख अनुसंधान की उसमें कल्पना भी नहीं है।
गोपी का वस्त्राभूषण धारण करना श्रृंगार करना खाना पीना जीवन धारण करना सभी सहज ही श्री कृष्ण सुख के लिए है।
श्री कृष्ण ने स्वयं कहा है हे पार्थ गोपिया अपने अंगों की रक्षा या देखभाल भी इसीलिए करती है कि उनसे मुझे सुख मिलता है गोपियों को छोड़कर मेरा निगुढ प्रेम पात्र और कोई नहीं है गोपिया अपने देह की रक्षा कर सार सांभर तथा श्रृंगार सजा करती है यह सत्य है अवश्य यह साधन राज्य में एक नई बात है सभी साधन क्षेत्र में शरीर की इतनी देखभाल साधन में बाधक मानी जाती है सभी देह को तुच्छ समझ कर देह की सेवा छोड़ देने की सम्मति देते हैं यह अनोखी प्रणाली तो गोपी भाव की ही है।
पुजारी प्रतिदिनपूजा के प्रत्येक पात्र को मांचझकर उज्जवल करता है और सजाता है गोपियों का यह विश्वास तथा अनुभव है कि श्री कृष्ण की सेवा में जिन-जिन उपचारों की आवश्यकता है उनमें उनका शरीर भी एक आवश्यक उपचार है इसलिए भी शरीर रूप इस पात्र को नित्य उज्जवल करके श्री कृष्ण पूजा के लिए सुसज्जित करती है पूजा का उपचार वस्तु तथा पुजारी की संपत्ति नहीं होती वह तो भगवान की ही संपत्ति है पुजारी तो उसकी देखरेख संभाल सजावट करने वाला है इसी प्रकार गोपियों के शरीर श्री कृष्ण की संपत्ति है गोपियों के ऊपर तो उनके यथायोग्य यत्नपूर्वक संभाल करने का भार है गोपियों के तन मन सभी यः स्वामी श्री कृष्ण है शरीर को धो पौंछ कर वस्त्राभूषणों से सजाने पर उसे देखकर श्री कृष्ण सुखी होगे इस कृष्ण सुख कामना को लेकर ही यह प्रातः स्मरणीय ब्रज देवियां श्री कृष्ण के सेवोपचार के रूप में अपने शरीर की सावधानी के साथ सेवा करती है यह शरीर सेवा श्री कृष्ण सेवा के लिए ही है अतः यह भी एक परम साधन है प्रेम का लक्षण है।
(प्रस्तुति – आचार्य अनिल वत्स)