America की साइलेंट स्ट्रैटेजी: बांग्लादेश में इस्लामी कट्टरपंथ को परोक्ष बढ़ावा, भारत की सुरक्षा पर मंडराता नया दक्षिण एशियाई खतरा..
अमेरिका दक्षिण एशिया में एक ऐसे नए संकट की नींव रखता दिख रहा है, जो आने वाले समय में पूरे क्षेत्र की स्थिरता को हिला सकता है। वॉशिंगटन पर यह आरोप तेज हो रहे हैं कि वह बांग्लादेश के इस्लामी कट्टरपंथी संगठनों को परोक्ष और गोपनीय समर्थन देकर अपने रणनीतिक हित साधने में जुटा है। इस कथित “सीक्रेट इंजेक्शन” का सीधा असर भारत की आंतरिक और सीमा सुरक्षा पर पड़ सकता है।
सूत्रों और विश्लेषकों के मुताबिक, अमेरिका बांग्लादेश के भीतर सक्रिय कट्टरपंथी इस्लामी संगठनों को राजनीतिक मुख्यधारा में लाने की कोशिश कर रहा है, ताकि क्षेत्र में चीन के बढ़ते प्रभाव को संतुलित किया जा सके। हालांकि, इस नीति का परिणाम यह हो सकता है कि बांग्लादेश का दशकों पुराना धर्मनिरपेक्ष ढांचा कमजोर पड़ जाए और चरमपंथी ताकतें खुलकर उभर आएं।
लोकतांत्रिक गिरावट और सत्ता संतुलन का बदलता खेल
ढाका में हालात तेजी से बदल रहे हैं। राजनीतिक अस्थिरता के बीच चुनावों की घोषणा तो हुई है, लेकिन उन पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। जिस राजनीतिक दल को जनता ने बार-बार शासन की जिम्मेदारी सौंपी थी, उसे सत्ता से बाहर कर दिया गया है। सत्ता परिवर्तन के बाद ऐसे संकेत सामने आए हैं कि नए नेतृत्व के साथ इस्लामी गुटों का प्रभाव बढ़ा है।
इन बदलावों के बाद बांग्लादेश में धार्मिक अल्पसंख्यकों, खासकर हिंदू समुदाय के खिलाफ हिंसा की घटनाओं में बढ़ोतरी दर्ज की गई है। कई रिपोर्टों में यह दावा किया गया है कि कट्टरपंथी तत्वों को खुली छूट मिल रही है, जिससे देश के भीतर डर और अस्थिरता का माहौल गहराता जा रहा है।
अमेरिका का भू-राजनीतिक दांव
अमेरिकी विदेश नीति का एक पुराना तर्क रहा है कि इस्लामी आंदोलनों को औपचारिक राजनीति में शामिल करने से वे उदार हो जाते हैं। लेकिन मध्य-पूर्व के अनुभव बताते हैं कि यह प्रयोग कई बार उलटा भी पड़ चुका है। इसके बावजूद, अमेरिका बांग्लादेश में इसी फार्मूले को आजमाता दिखाई दे रहा है।
बांग्लादेश में चीन की बढ़ती आर्थिक और रणनीतिक मौजूदगी अमेरिका के लिए चिंता का विषय बन चुकी है। बंदरगाहों, आधारभूत ढांचे और रक्षा सहयोग में बीजिंग की गहरी पैठ को देखते हुए वॉशिंगटन अब ऐसे राजनीतिक समूहों से संपर्क बढ़ा रहा है, जो सत्ता समीकरणों को प्रभावित कर सकते हैं।
कट्टरपंथी संगठनों से बढ़ती नजदीकियां
बीते महीनों में अमेरिकी राजनयिकों की बांग्लादेश के प्रभावशाली इस्लामी दलों, विशेषकर जमात-ए-इस्लामी और इस्लामी आंदोलन बांग्लादेश (IAB), के नेताओं से मुलाकातों की खबरें सामने आई हैं। उच्चस्तरीय बैठकों, मुख्यालय दौरों और वीजा जारी किए जाने को लेकर सवाल उठ रहे हैं।
इन संपर्कों को लेकर बांग्लादेशी समाज के एक बड़े हिस्से में यह धारणा बन रही है कि अमेरिका इन संगठनों को देश के राजनीतिक भविष्य के विकल्प के रूप में देख रहा है। यही वजह है कि इसे “साइलेंट सपोर्ट” या “गोपनीय इंजेक्शन” की संज्ञा दी जा रही है।
धर्मनिरपेक्ष पहचान पर संकट
विशेषज्ञों का मानना है कि बांग्लादेश की बहुलवादी और धर्मनिरपेक्ष पहचान धीरे-धीरे कमजोर होती जा रही है। मानवाधिकार संगठनों ने अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा, धार्मिक कट्टरता और जिहादी गतिविधियों में बढ़ोतरी को लेकर गंभीर चिंता जताई है।
आलोचकों का कहना है कि वाशिंगटन की मौजूदा कूटनीति उन ताकतों को अप्रत्यक्ष बल दे रही है, जो बांग्लादेश की सामाजिक संरचना को बदलने और धार्मिक ध्रुवीकरण को बढ़ावा देने पर आमादा हैं।
अगर जमात या IAB सत्ता में आई तो संभावित खतरे
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, यदि आगामी चुनावों के बाद जमात-ए-इस्लामी या IAB का प्रभावशाली रोल बनता है, तो बांग्लादेश को कई गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है:
सीमा पार कट्टरपंथी गतिविधियों में इजाफा
पश्चिम बंगाल और असम तक चरमपंथी नेटवर्क का विस्तार
पाकिस्तान की ISI को क्षेत्र में सक्रिय होने के अधिक अवसर
रोहिंग्या मुद्दे से जुड़े उग्र आंदोलनों में तेजी
बांग्लादेश और सीमावर्ती इलाकों में हिंदू समुदाय पर बढ़ता दबाव
दक्षिण एशिया में भू-राजनीतिक तनाव का तीव्र होना
भारत के लिए क्यों बढ़ रहा है खतरा
स्थानीय और अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों के मुताबिक, बीते एक वर्ष में अमेरिका के अलावा चीन, रूस, तुर्की, सऊदी अरब, ईरान और पाकिस्तान सहित 35 से अधिक देशों के राजनयिकों ने जमात या उससे जुड़े संगठनों से संपर्क किया है। इससे यह संकेत मिलते हैं कि बांग्लादेश का राजनीतिक भविष्य वैश्विक ताकतों के लिए एक रणनीतिक अखाड़ा बनता जा रहा है।
यदि इस्लामी दल चुनाव के बाद गठबंधन की धुरी या सत्ता के किंगमेकर बनते हैं, तो दक्षिण एशिया की सुरक्षा व्यवस्था पर गहरा असर पड़ सकता है। विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि ऐसी स्थिति में भारत को सबसे अधिक रणनीतिक, सामाजिक और सुरक्षा संबंधी चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।
(प्रस्तुति -त्रिपाठी पारिजात)



