Wednesday, December 17, 2025
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Bihar Elections 2025: नीतीश की जीत का सबसे बड़ा आधार – ‘महिलाएँ’

Bihar Elections 2025: चुनाव के नतीजे घोषित हुए और एक बार फिर NDA सत्ता में लौट आई। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि आख़िर कौन-सी ताकत थी जिसने नतीजों की दिशा बदल दी..

Bihar Elections 2025: चुनाव के नतीजे घोषित हुए और एक बार फिर NDA सत्ता में लौट आई। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि आख़िर कौन-सी ताकत थी जिसने नतीजों की दिशा बदल दी..

इसका सीधा जवाब है—महिला मतदाता। अक्सर कहा जाता है कि जब जाति के समीकरण बिगड़ जाते हैं, गठबंधन अस्थिर दिखाई देते हैं और सत्ता-विरोधी लहर तेज़ होती है, तो ऐसे समय में महिला वोटर चुपचाप मतदान केंद्र पहुँचकर माहौल को पूरी तरह पलट देती है।

नीतीश कुमार ने इस बात को न सिर्फ़ समझा बल्कि महिलाओं को लाभार्थी से आगे बढ़ाकर भागीदार बनाने का मॉडल तैयार किया और उसे लगातार मजबूत किया। इसी कारण 2025 में महिलाओं ने खुलकर मतदान किया और उनकी संख्या निर्णायक शक्ति बनकर उभरी। बिहार में महिलाओं का पुरुषों से ज्यादा मतदान करना नया नहीं है, लेकिन इस बार यह अंतर और भी बढ़ गया। कई सीटों पर महिलाओं का मतदान प्रतिशत पुरुषों से 5–7% अधिक रहा। चुनाव आयोग के मुताबिक, खासकर ग्रामीण इलाकों में महिलाओं ने बड़ी संख्या में वोट डाले।

नीतीश कुमार लंबे समय से कहते आए हैं कि उनकी शासन व्यवस्था की मजबूती में महिला सशक्तिकरण मुख्य आधार है। यही वजह है कि महिलाओं के लिए शुरू की गई उनकी योजनाएँ उनकी सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत बन गईं।

इनमें महिलाओं को सीधे 10,000 रुपये देने की योजना सबसे बड़ा कारण साबित हुई। इसके साथ 50% पंचायत आरक्षण, साइकिल योजना, जीविका दीदी नेटवर्क, महिला रोजगार ऋण योजना, कन्या उत्थान योजना, छात्राओं के लिए पोशाक योजना, कानून-व्यवस्था की मजबूती और 2025 में चलाया गया महिला संवाद अभियान शामिल है।

विशेषज्ञों का मानना है कि 10,000 रुपये सीधे खाते में पहुंचने से महिलाओं में मजबूत राजनीतिक झुकाव बना। अब महिलाएं जाति की राजनीति नहीं करतीं, बल्कि योजनाओं के आधार पर फैसला लेती हैं। नीतीश कुमार ने उन्हें सिर्फ़ लाभ नहीं दिया, बल्कि उन्हें निर्णय प्रक्रिया का हिस्सा बनाया। यही उनका सबसे बड़ा राजनीतिक आधार बन गया।

नीतीश सरकार का एक और बड़ा कदम था—पंचायत और नगर निकायों में महिलाओं को 50% आरक्षण देना। इसके परिणामस्वरूप राज्य में लगभग 1.35 लाख महिला प्रतिनिधि—चाहे वह मुखिया हों, सरपंच हों या वार्ड सदस्य—सीधे सत्ता के केंद्र में पहुंचीं। यह आरक्षण महिलाओं को केवल घरों तक सीमित नहीं रखता, बल्कि उन्हें नेतृत्व की भूमिका में स्थापित करता है।

लड़कियों की स्कूल छोड़ने की दर 40% से घटकर 18% रह गई है। 2007 से हर साल 14 लाख से भी अधिक साइकिलें बच्चों को दी जाती हैं। इस साइकिल योजना ने लड़कियों की पढ़ाई, आवागमन और आत्मविश्वास, तीनों में बढ़ोतरी की। कई परिवार कहते हैं—“नीतीश जी ने हमारी बेटियों को उड़ने के पंख दिए।” यही कारण है कि यह योजना महिला सशक्तिकरण का प्रमुख प्रतीक बन गई है और अधिक मतदान की बड़ी वजह भी।

बिहार शराबबंदी लागू करने वाला प्रमुख राज्यों में से एक है। सर्वे बताते हैं कि शराबबंदी के बाद घरेलू हिंसा में 35% गिरावट आई और महिलाओं की बचत में 22% बढ़ोतरी हुई। यह नीति सिर्फ़ शराब रोकने का कदम नहीं, बल्कि महिलाओं की सुरक्षा और आर्थिक स्वतंत्रता को मजबूत करने का साधन बनी। इसने महिला मतदाताओं को स्वतंत्र रूप से निर्णय लेने का आत्मविश्वास दिया।

राज्य के 10 लाख से ज्यादा स्वयं सहायता समूहों से करीब 1.2 करोड़ महिलाएं जुड़ी हैं। ये जीविका दीदियां अब केवल ऋण लेने वाले समूह नहीं हैं, बल्कि राजनीतिक स्तर पर भी सक्रिय हैं और NDA का घर-घर अभियान चलाती हैं। 2025 के महिला संवाद अभियान में इन्हीं दीदियों ने दो करोड़ से अधिक घरों तक सरकार का संदेश पहुंचाया। महागठबंधन ने जीविका कार्यकर्ताओं को सरकारी नौकरी देने का वादा किया, लेकिन महिलाओं ने NDA की विश्वसनीयता को ज्यादा महत्व दिया।

हर पात्र महिला को 10,000 रुपये की वित्तीय सहायता और 2 लाख रुपये तक बिना गारंटी के ऋण की व्यवस्था की गई। 2024-25 में 18 लाख महिलाओं को इसका लाभ भी मिला। यह योजना केवल रकम बांटने की प्रक्रिया नहीं, बल्कि महिलाओं के छोटे व्यवसाय और आत्मनिर्भरता की शुरुआत बनती जा रही है। चुनाव से कुछ समय पहले 1.21 करोड़ महिलाओं को 10,000 रुपये दिए गए—और यही सीधा कैश ट्रांसफर NDA के लिए जीत का महत्वपूर्ण आधार रहा।

जन्म से लेकर स्नातक तक लड़कियों को 54,100 रुपये की सहायता की व्यवस्था है, जिससे 1.8 करोड़ बेटियों को लाभ मिला है। यह योजना केवल वित्तीय सहारा नहीं है, बल्कि लड़कियों की शिक्षा और समान अवसर की दिशा में मजबूत कदम है। महागठबंधन ने 30,000 रुपये वार्षिक सहायता का वादा किया, पर जनता ने लंबे समय से विश्वसनीय योजनाओं पर भरोसा दिखाया।

‘जंगलराज’ बनाम ‘सुशासन’ का मुद्दा भी महिलाओं पर गहरा असर छोड़ता है। PM मोदी से लेकर NDA के सभी नेताओं ने इस मुद्दे को प्रमुखता से उठाया। 2005 से पहले रात में सड़कें सुनसान रहती थीं। अब गांव-शहर में 22–24 घंटे बिजली, 26,000 किलोमीटर सड़कों का जाल और पुलिस थानों में महिला डेस्क जैसी सुविधाएँ हैं। इससे महिलाएं अब बेझिझक बाहर जा सकती हैं। यह बदलाव उनके अधिक मतदान का प्रमुख कारण बना।

चुनाव से लगभग दो महीने पहले विशेष संवाद अभियान शुरू किया गया। सवा लाख जीविका दीदियां हर घर गईं और संदेश दिया—“जो योजना आपकी, वही सरकार आपकी।” तेजस्वी यादव का ‘माई-बहिन’ प्लान इस अभियान की मजबूती के आगे फीका पड़ गया।

नीतीश कुमार की सबसे बड़ी राजनीतिक सफलता ‘लाभार्थी से भागीदार’ मॉडल है। महिलाएं अब योजनाओं की उपभोक्ता नहीं, बल्कि प्रशासनिक ढांचे की सक्रिय हिस्सा हैं। जीविका समूह की महिलाएं मीटिंग चलाती हैं, साइकिल वितरण प्रबंधन करती हैं, शराबबंदी की निगरानी करती हैं और स्थानीय स्तर पर निर्णय लेती हैं। इससे उनमें स्वामित्व की भावना पैदा हुई और वफादारी भी मजबूत हुई। जुलाई 2025 में महिलाओं के लिए 35% नौकरी आरक्षण और अगस्त में रोजगार योजना ने इसे और मज़बूत किया।

बिहार चुनाव 2025 ने एक बार फिर साबित कर दिया कि महिलाएं अब सिर्फ़ वोट डालने वाली जनता नहीं रहीं—वे चुनावी परिणाम तय करने वाली सबसे अहम ताकत बन चुकी हैं। नीतीश कुमार की जीत में महिला वोट बैंक ने निर्णायक भूमिका निभाई और पूरे चुनावी समीकरण को अपनी ओर मोड़ दिया।

(त्रिपाठी पारिजात)

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