Tuesday, February 17, 2026
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Casteism: ये क्या जाति-वाति लगा रखा है? क्या फायदा है इसका आज की तारीख में ?

Casteism: किसको क्या देने वाला है ये जातिवाद ? क्या मिलता है इससे? भूलो यह सब। क्या फायदा है इन सबका? यहां पढ़िये सच्चाई क्या है ..

Casteism: किसको क्या देने वाला है ये जातिवाद ? क्या मिलता है इससे? भूलो यह सब। क्या फायदा है इन सबका? यहां पढ़िये सच्चाई क्या है ..

आपसे मैं पूछूं कि आप क्या हैं, तो आपका जवाब क्या होगा? आप कुछ तो बताएंगे न कि मैं इंसान हूँ, भारतीय हूँ, हिन्दू हूँ, टीचर हूँ, सैनिक हूँ, किसान हूँ।

आप बताएं कि आप इंडियन हैं, और अगला कहें कि क्या भाई, आज की ग्लोबल दुनिया में क्या इंडियन क्या ग्रीक। सब अपना कमा-खा रहे हैं। इंडियन अमेरिका में कमा रहा है, ग्रीक कनाडा में, नाइजीरियन इंडिया में। तो ये किस बात का गर्व लिए बैठे हो कि तुम इंडियन हो?

सुनकर कैसा लगा? कैसा लगेगा आपको जब कोई कहे कि छोड़ो खुद को इंडियन कहना। और ये क्या लगा रखा है हिन्दू-हिन्दू। टीसीएस में जॉब कर रहे हो, बगल में ईसाई बैठा है, बॉस मुसलमान है, बड़ा बॉस यहूदी है, साथ में जॉब कर रहे, वीकेंड पर साथ में पार्टी कर रहे, तो क्या ये खुद को हिन्दू बोलकर गर्व पाले बैठे हो?

ले के बैठे हो कि हम तो जी ब्राह्मण हैं, हम हैं राजपूत, हम हैं जाट के छोरे, जी हम तो बनिया हैं जी। क्या कोई लाभ मिलता है खुद को ये ब्राह्मण-ठाकुर-बनिया वगैरह पहचान बताने से?

सच कहें तो कोई लाभ नहीं मिलता। बिल्कुल एक पैसे का, एक रत्ती लाभ नहीं है। पर हाँ, हम लेकर बैठे हैं, चिपके हैं अपनी इस पहचान से।

आपने शक्तावत और चूंडावत का नाम सुना है? हरावल जानते हैं? हरावल मतलब सेना का वो भाग जो सबसे पहले दुश्मन से लड़ने जाता है। सबसे पहले जाता है, तो यह तो पक्की बात है कि सबसे ज्यादा सैनिक इसी टुकड़ी के मरेंगे।

एक राजा हुए अपने राजस्थान में। मेवाड़ के राणा लाखा। उनके बेटे थे चुण्डा।

पड़ोसी राज्य ने इन युवराज से अपनी राजकुमारी की शादी के लिए नारियल भेजे (रिश्ता भेजा)। राणा लाखा को लगा कि उनके लिए रिश्ता आया है। बाद में बात क्लियर हुई तो चुण्डा बोले कि अब जो हो, पिताजी को भले गलती से राजकुमारी का रिश्ता अपने लिए लगा, पर लग ही गया तो अब वो मेरी माँ समान हो गई।

शादी तो पिताजी को ही करनी चाहिए। लड़की वाले बोले कि ये क्या बात हुई।

हम तो इसलिए आपसे शादी करवा रहे थे अगले राजा आप होंगे तो हमारी लड़की रानी बनेगी, होने वाले बच्चे राणा बनेंगे तो वो राजमाता बनेगी। अभी आपके पिता से शादी हुई तो उसके बच्चे तो सामंत भर ही बन पाएंगे, क्योंकि आप हो युवराज, कल को आप राणा बनोगे। तो चुण्डा जी बोले कि यही बात है तो जाओ, मैं वचन देता हूँ कि मैं राणा नहीं बनूंगा, मेरे पिता और इन राजकुमारी से जो बेटा होगा, वो राजा बनेगा।

और यही हुआ। इस त्याग के कारण चुण्डा को राजस्थान का भीष्म कहा गया। चुण्डा ने राजा बनाया, तो यह परम्परा बनी कि अब चुण्डा के वंशज, चुण्डावत ही बताएंगे कि अगला राजा कौन बनेगा (राणा के बच्चों में से कौन सबसे योग्य है, इस आधार पर)। इन चुण्डावतों को हरावल का अधिकार भी मिला, कि जब भी लड़ाई होगी, सबसे पहले वह जायेगे। एक राणा अपने अयोग्य पुत्र को राजा बना गए तो चुण्डावतों ने अपने अधिकार का प्रयोग कर योग्य को राजा बना दिया था, जिसका नाम सुनकर आप नतमस्तक हो जाते हैं, महाराणा प्रताप।

प्रताप के एक भाई थे, शक्ति। उनके वंशज शक्तावत कहलाये। किसी युद्ध के समय शक्तावत अड़ गए कि क्या हरावल पर हर बार चुण्डावतों को भेजा जाता है, हम भी वीर हैं, हमें भेजिए। चुण्डावत अड़ गए कि ये अधिकार तो हमारा है। राणा बोले कि ऐसा करो, आप दोनों अपनी टुकड़ी लेकर जाओ। जो पहले किले में प्रवेश करें, हरावल का अधिकार उसका।

शक्तावतों ने किले के दरवाजों पर धावा मारा। दरवाजों पर बड़ी-बड़ी कीलें। हाथी टक्कर न मारे। तो शक्तावत-प्रमुख ने खुद ही को दरवाजे से चिपका दिया कि अब हाथी भेजो, भेजो कि वह मेरी पीठ पर धक्का मारे। हाथी किलों से बिदक रहे थे, इंसानी शरीर से उसे क्या दिक्कत। हाथी ने मारी टक्कर और दरवाजा टूटने लगा।

उधर चुण्डावतों ने यह देखा कि पुरखों का कमाया अधिकार बस जाने ही वाला है तो चुण्डावत-प्रमुख ने अपने साथी से अपनी ही गर्दन कटवा कर किले में फिंकवा दी।

आप सोचिए जरा। ये प्रतियोगिता किसलिए? कि देश के लिये पहले मरने का अधिकार हमें मिले।
ये विरासत, ये लेगेसी कैसे भूले कोई?

आपने सुना होगा कि जब देश आजाद हुआ तो सरकार नाथू सिंह जी को आर्मी चीफ बनाना चाहती थी। उन्होंने मना कर दिया जो महाराज राजेन्द्र सिंह जड़ेजा को कहा कि आप बन जाइये। इन दोनों का जवाब था कि जब काबिल ऑफिसर, सीनियर ऑफिसर करियप्पा साहब हैं तो हमें क्यों बना रहे हैं। किसी को भारत देश की सेना का सर्वोच्च अधिकारी, पहला भारतीय चीफ बनाया जाए और वह अपने किसी साथी ऑफिसर के लिए इतना बड़ा पद छोड़ दे, यह कैसे सम्भव है? सैकड़ों अफसर चीफ बनेंगे भारतीय सेना में, पर पहला चीफ, उसका नाम तो तब तलक रहेगा, जब तक भारत देश रहेगा। इतिहास में दर्ज होगा नाम, पर नहीं चाहिए।

पाकिस्तानी में भी तो वही ब्रिटिश इंडियन आर्मी थी, पर वहां तो अफसरों ने अपने साथी अफसर के लिए मिलता हुआ पद नहीं छोड़ा। पहला मौका आते ही लपक पड़े। आज हमारी और उनकी आर्मी की तुलना कर लीजिए। कौन गौरवोन्मत्त है? हमारी फौज में यह नैतिकता किसकी वजह से है? क्या नाथू सिंह जी, राजेन्द्र सिंह जी जैसों के कारण नहीं। क्यों किया इन अफसरों ने ऐसा?

आपको नहीं लगता कि युवराज चुण्डा जैसे अनेकोनेक राजपूतों के कृत्यों का प्रभाव होगा उनपर? वे भूल जाते कि वे राजपूत हैं, वे भूल जाते कि राजपूत पुरखों ने क्या किया है, तो ये नैतिक आधार कहाँ होता हमारे पास, जिसपर आज हम गर्व करते हैं?

एक सामंत नई दुल्हन के मोह में युद्ध पर नहीं जा रहा था तो उसकी पत्नी ने अपना सिर काटकर भेज दिया। एक गरीब राजपूत किसी सामंत के लिए बस इसलिए कट मरा कि उसने एक बार उसके यहां भोजन कर लिया था। कितनी कहानियां हैं कि एक गाय के लिए, एक अनजानी महिला के लिए, एक मामूली से मंदिर के लिए राजपूत, गाँव के साधारण किसान राजपूत पाँच गुनी, दस गुनी सेना से लड़ मरे।

कोई सगत सिंह क्यों ऊपर का आदेश होने पर भी नाथूला से नहीं हटा, क्यों वह ठोस आदेश होने पर भी मेघना नदी पर नहीं रुका, और बांग्लादेश कब्जा लिया? कमांडिंग अफसर कह रहा है कि वही रुको। बाकी आएंगे साथ, तब बढ़ना। पर वे बढ़ गए। राजपूती खून था इसलिए? क्या होता है राजपूती खून? वही लाल-लाल सा रंग, जो सबमें हैं? खून में क्या करामात। किसी जर्मन का, जापानी का, अफ्रीकी का खून भी चढ़ा दो बॉडी में, क्या फर्क पड़ेगा?

खून नहीं, वह कहानियां, देश के लिए, गौ-महिला-मंदिर-विद्वान के लिए बलिदान हो जाने वाली पुरखों की कहानियां, जो रगों में दौड़ती हैं। समय पर वहीं कहानियां उफनती हैं, वह पुरखों के कृत्य, एन्सेन्टिरी, ऐसे काम करवा जाती है कि कवियों को लिखने का मसाला मिल जाता है।

आप समाज के लिये अधिक से अधिक क्या कर सकते हो? वृत्रासुर को मारने के लिए उसके एक पुरखे दधीचि ने अपनी हड्डियां दे दी। समाज के लिए उसके एक पुरखे चाणक्य ने एक शुद्र को भारत का सम्राट बना दिया। राजाओं से लेकर आमजन तक को शिक्षित करने के लिए उसने खुद पर गरीबी ओढ़ ली। महान ब्राह्मणों में किसी अमीर का नाम नहीं लेता कोई गर्व से। द्रोणाचार्य से बड़ा गुरु न हुआ कोई, पर उनकी धन, सत्ता की लालसा के कारण कोई उन्हें महान ब्राह्मण नहीं कहता। महान कहता है पुष्यमित्र शुंग को, सत्ता उसने भी ली, पर सत्ता पाने के लिये नहीं, बल्कि राष्ट्र को सुरक्षित रखने के लिए। आज की इस भौतिक दुनिया में आपके मंदिरों में आपके दिए पैसे से पेट पालता हुआ, शादी-मुंडन पर मंत्र पढ़ता ब्राह्मण, क्या वो आम नौकरी नहीं कर सकता था। पर उसने यह कष्टसाध्य जीवन चुना क्योंकि उनके मस्तिष्क में उसकी जाति का गौरव घूमता रहता है कि थे वे भी लोग जिन्होंने भौतिक सुख नहीं, आध्यात्मिक दान का मार्ग चुना। आर्यभट्ट, वराहमिहिर, चरक, सुश्रुत, पतंजलि। कैसे-कैसे वैज्ञानिक। लगे रहे, खपते रहे।

इन्हीं के दम पर भारत को विश्वगुरु कह पाते हैं न? उपनिषदों को पढ़कर शोपेनहावर, फ्रेडरिक शेलिंग, पॉल ड्यूसन जैसे दर्शन के प्रकांड यूरोपीय विद्वान प्रभावित थे। और आप कहते हो कि क्यों खुद को ब्राह्मण कहकर गर्व करते हो? अरे क्यों न करें?

घूमिये किसी पुराने शहर में, गांवों में। मंदिर, प्याऊ, बावड़ी, तालाब, कुएं, सड़कें दिखेंगी जिसे किसी वैश्य ने बनाया होगा। बनिया कहकर धिक्कारते हो उसे। उसी बनिये ने जाने कितनी धर्मशालाएं बनवाई हैं। अपनी बेरोजगारी के दिनों में लखनऊ शहर में कितनी ही बार इन धर्मशालाओं में 20, 25, 50 रुपयों में रुका हूँ। गर्मियों में ठंडा पानी पीया है इनके लगाएं नलों से। क्या भामाशाह जैसे पुरखों को भूल जाएं ये? जाति ने ही सिखाया था इन्हें कि गरीब के लिए, आमजन के लिए कुछ भला कर जाओ। पागल हैं फिर तो ये, जो आज की इस पैसों के पीछे पागल दुनिया में, अपनी जेब के पैसे खर्च कर रहे हैं जिसका इन्हें तो कोई भौतिक लाभ ही नहीं।

वो अम्बानी, जिसकी शादी में संसार भर के लोग जमा हुए, वो तो पागल है जो शोषण के शिकार, बीमार जानवरों के लिए वंतारा जैसी जगह बना देता है। ये बिड़ला, बजाज जैसे लोग आजादी से पहले से लेकर आजतक देश-धर्म के काम में लगे हैं। खजाने खर्च कर दिए वैश्यों ने, और आज आप कहते हो कि क्यों इनकी पहचान से खुद को जोड़ते हो?

कोई जाट क्यों खुद को जाट न कहें? वो भूल जाये गोकुला को, राजाराम को। खुद को जाट नहीं कहेगा तो उसे याद कैसे रहेगा कि उसके पुरखे ने विदेशी शक्ति का, अत्याचारी शासन का प्रतिकार किया था, अकबर की हड्डियां फूँक दी थी।

जाति भूलने की चीज नहीं, याद रखने की चीज है। क्योंकि यह आपको आपकी याद दिलाती है। आपको प्रेरित करती है कि आपको आपके पुरखों जैसा होना है।

जो भूल गये हैं, उन्हें भी याद होना चाहिए। याद होना चाहिए कि एक औरत ने अपने बेटे का बलिदान देकर राष्ट्रप्रमुख को बचा लिया था। आज उस माँ की, पन्ना धाय की जाति ओबीसी में आती है। समाज माँ कहता है अहिल्याबाई होलकर को। क्या थे होलकर? क्यों नहीं गर्व करते इनपर। महात्मा रविदास पर करो गर्व।

भारत भर में फैले ये जो महान स्थापत्य है, वो किसने बनाएं हैं? ये अजंता-एलोरा, ये कोर्णाक सूर्य मंदिर, खजुराहो, मीनाक्षी मंदिर, हजारों किले। सुनते हैं कि भारत का ऐसा मलमल था कि पूरी धोती एक माचिस की डिबिया में पैक हो जाती थी।

मसाले, आभूषण जाते थे ग्रीस, तो वहां की संसद रोती थी कि हमारा तो सारा पैसा भारत चला जा रहा है। ट्रेड डेफिसिट हो रहा है। भारत के स्टील ने दुनिया की तस्वीर बदल दी। ये आज के इंडोनेशिया, थाईलैंड, सिंगापुर वगैरह पर आज भी जो स्पष्ट भारतीय छाप दिखती है, वो भारतीय नावों के दम पर है। किसने बनाई थी ये नावें? कौन थे ये महान शिल्पकार, ये महान कारीगर, ये लोहार, ये किसान, ये बढ़ई? ब्राह्मण तो नहीं थे, क्षत्रिय भी नहीं थे, वैश्य भी नहीं थे। तो कौन थे?

जाति गर्व करने की चीज है, क्योंकि यह हमें हमारी पहचान देती हैं। राजपूत गर्व करता है कि भारत को उसने बचाया। ब्राह्मण इसलिए कि भारत आध्यात्मिक शक्ति, विश्व गुरु इसी के दम पर था। वैश्य इसलिए कि दुनिया की 35% जीडीपी थी उसके कारण। शुद्र इसलिए गर्व करे कि भारत की जो गर्व करने लायक भौतिक चीजें थी, जो दर्शनीय विरासत वर्तमान में है, वह उसके श्रम के कारण है।

इतिहास भरा पड़ा है ऐसे लोगों से। और इतिहास रोज ही बन भी रहा है। जो कल बीत गया, जो अभी इसी क्षण बीत रहा है, वह भी इतिहास ही है। इतिहास बनाइये। नई परिपाटियां, नई यादें, नए शुभ कर्म बनाते जाइये कि कल को आपके वंशज आपके नाम पर गर्व करें। बारात में दूल्हे को घोड़ी से उतारना भी इतिहास है, और यूनिवर्सिटी में किसी लड़की के कपड़े फाड़ना भी। तय आपको ही करना है कि आने वाली पीढियां आपको कैसे याद करेंगी।

बाकी, मस्त रहें, मर्यादित रहें, महादेव सबका भला करें।

(अजित प्रताप सिंह)

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