Devendra Sikarwar की कलम से होकर आइये चलते हैं इतिहास के पन्नों में थोड़ा पीछे..
कभी-कभी कोई घटना ऐसे रूप में घटित होती है कि आने वाली पीढ़ियों की नसों में बीमारी या फिर प्रेरणा बनकर बैठ जाती है।
भारत के इतिहास में ऐसी कई घटनाएं हुईं लेकिन दो घटनाएं ऐसी हुईं जिन्होंने पूरे हजार वर्ष तक एक विशाल भूखण्ड के निवासियों की मानसिकता को तय कर दिया।
प्रथम घटना थी 1193 के चंदावर के युद्ध में विशाल कन्नौज साम्राज्य के स्वामी जयचंद की पराजय जिसके बाद अधिकांश राजपूत राजस्थान की पहाड़ियों व मरुस्थल तथा दक्षिण में बीहड़ों व विंध्याचल के दुर्गम क्षेत्रों में चले गये।
दूसरी घटना थी 1205 में नदिया में परम वैष्णव सम्राट लक्ष्मणसेन की पराजय
यह एक बहुत ही विरोधाभासी है कि बंगाल ने अपना परम वैभव एक बौद्ध सम्राट धर्मपाल के युग में देखा और अपना चरम पराभव परम वैष्णव सम्राट लक्ष्मणसेन के युग में देखा।
सम्राट लक्ष्मणसेन जिन्होंने परम प्रतापी कन्नौज नरेश और जयचंद को बुरी तरह हराया वह सौदागरों के वेश में आये मात्र अठारह तुर्क घुड़सवारों के आक्रमण से घबराकर भोजन के थाल को छोड़ नंगे पैर ही महल छोड़कर भाग गये।
इस क्षेत्र की विशाल जनसंख्या पहले से ही दलितों के रूप में आयुध धारण करने से वंचित कर राजनैतिक रूप से उदासीन और सामरिक रूप से निरीह थी लेकिन इन दोनों घटनाओं के बाद हुए अत्याचारों के कारण शेष बचे उच्च वर्ग ने भी अपना आत्मविश्वास, स्वाभिमान और स्वतंत्रता की भावना खो दी।
यही कारण रहा कि 1205 के बाद दिल्ली से लेकर देवाक (ढाका) तक के विशाल भू भाग के निवासियों ने कभी भी आक्रांताओं का प्रतिरोध नहीं किया।
यह कायरता इस हद तक रगो में बैठ गई कि जब रघुनाथराव ‘राघोबा’ ने काशी की ज्ञानवापि मस्जिद को तोडना चाहा तो काशी के ब्राह्मण ही हाथ जोड़कर ऐसा न करने के लिए आ गये।
इसके ठीक विपरीत मेवाड़ ने अपनी पीढ़ियों को खोया, जौहर व साके किये और जरूरत पड़ने पर हर मेवाड़ी को तलवार थमा दी, यहाँ तक कि भीलों को भी साथ लिया जिस कारण उसे हिंदुओं की सत्ता का निर्विवाद प्रतिनिधि माना जिसकी धमक दक्षिण तक में थी और छत्रपति शिवाजी भी उन्हें अपना अगुआ मानते थे।
इधर पूरब में बिहार में फिर भी घने जंगलों के कारण हिंदुओं ने छिटपुट संघर्ष जारी रखा लेकिन बंगाल व बंगालियों का जैसा मानसिक पतन हुआ वह आज भी जारी है।
चूँकि जीने के लिए ‘अहं’ भाव जरूरी है अतः उच्च हिन्दू वर्ग ने स्वयं को बौद्धिक कार्यों में डुबोकर अपनी नस्ल को ऊँचा मानने का अहं भाव पाल लिया। यही वर्ग बंगाली भद्रलोक कहलाता है जिसने कभी किसी आक्रांता का प्रतिरोध नहीं किया सिवाय छिटपुट क्रान्तिकारियों के लेकिन विदेशियों की चापलूसी में सदैव आगे रहे।
ठीक यही बात कश्मीरी पंडितों के साथ हुई जिन्होंने अपनी कायरता को अपने मुस्लिम शासकों के साथ नस्ली रिश्ता जोड़कर अपना अहं ऊँचा किया और कई जेनोसाइड झेले।
दुर्भाग्यपूर्ण तथ्य यह है कि नेतृत्व इन्हीं के पास है और पद दलित हिन्दू इन्हीं की ओर देखता है जबकि आवश्यकता दलित वर्ग से गोपाल पाठा तैयार करने की है।
यहाँ संघ की भूमिका महत्वपूर्ण है क्योंकि वह इन्द्रेश कुमार जैसे चतुर बुद्धिजीवी के साथ यदि हिंदुओं में गोपाल पाठा तैयार कर पाती है तभी उसकी सार्थकता सिद्ध हो सकेगी वरना इतिहास से पैदा हुआ यह स्टॉकहोम सिंड्रोम बंगाल में हिंदुओं का नाश करवाकर ही दम लेगा।
(देवेन्द्र शिकरवार)