Saturday, August 30, 2025
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Dr Raghav Jha writes: श्रावणी पूर्णिमा पर आत्मबोध, संबंध और संस्कृत ज्ञान परंपरा का उत्सव

Dr Raghav Jha writes: श्रावणी पूर्णिमा केवल एक तिथि नहीं, अपितु भारतीय संस्कृति की जीवंत आत्मा का उत्सव है। यह दिन हमें हमारे ज्ञान, संबंध और भाषा — इन तीन जीवन-स्तंभों की ओर लौटने का अवसर देता है..

Dr Raghav Jha writes: श्रावणी पूर्णिमा केवल एक तिथि नहीं, अपितु भारतीय संस्कृति की जीवंत आत्मा का उत्सव है। यह दिन हमें हमारे ज्ञान, संबंध और भाषा — इन तीन जीवन-स्तंभों की ओर लौटने का अवसर देता है..

श्रावण मास की पूर्णिमा तिथि इस वर्ष 9 अगस्त को मनाई जाएगी। भारतीय संस्कृति में यह तिथि आध्यात्मिक चेतना, पारिवारिक संबंधों और बौद्धिक परंपरा का एक महत्त्वपूर्ण प्रतीक मानी जाती है। यही कारण है कि यह दिन तीन विशिष्ट स्वरूपों — श्रावणी, रक्षाबंधन और संस्कृत दिवस — के रूप में मनाया जाता है।

श्रावणी पर्व वैदिक परंपरा में उपाकर्म संस्कार के लिए अत्यंत पावन तिथि है। इस दिन ब्राह्मण व पुरोहित वर्ग पवित्र नदियों या तीर्थों में स्नान कर तर्पण करते हैं, संकल्प लेते हैं और नवीन यज्ञोपवीत धारण कर वेदाध्ययन का आरंभ करते हैं। उपाकर्म का तात्पर्य है — ज्ञान, तप और जीवन की एक नई शुरुआत। यह परंपरा आत्मशुद्धि, अनुशासन और आध्यात्मिक पुनर्निर्माण का प्रतीक है।

इसी दिन रक्षाबंधन का पर्व भी सम्पूर्ण भारतवर्ष में हर्षोल्लास से मनाया जाता है। भविष्य पुराण के अनुसार, देवासुर संग्राम के समय इंद्राणी ने इंद्र के दाहिने हाथ में रक्षा-सूत्र बांधा था, जिससे उन्हें विजय प्राप्त हुई। यही परंपरा बाद में बहनों द्वारा भाइयों को राखी बांधने के रूप में विकसित हुई, जो पारिवारिक आत्मीयता, विश्वास और कर्तव्यबोध का प्रतीक बन गई।

इस तिथि को संस्कृत दिवस के रूप में भी मान्यता प्राप्त है। वर्ष 1969 से भारत सरकार द्वारा इस दिन को संस्कृत भाषा और संस्कृति के प्रचार-प्रसार हेतु समर्पित किया गया है। संस्कृत केवल एक भाषा नहीं, बल्कि वेद, उपनिषद, आयुर्वेद, दर्शन, गणित, योग और नाट्यशास्त्र जैसी महान परंपराओं की मूल भाषा है। यह भारत की प्राचीनतम बौद्धिक परंपरा का मेरुदंड है, जो जीवन-दर्शन को संपूर्णता प्रदान करती है।

इस अवसर पर प्रदेशभर के विविध शैक्षिक, सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक संस्थानों में संस्कृत आधारित गोष्ठियों, प्रतियोगिताओं, मंत्रोच्चारण, नाट्य एवं वक्तृत्व कार्यक्रमों का आयोजन किया जाएगा, जिससे जनमानस में संस्कृत के प्रति नवीन चेतना उत्पन्न हो सके।

श्रावणी पूर्णिमा केवल एक तिथि नहीं, अपितु भारतीय संस्कृति की जीवंत आत्मा का उत्सव है। यह दिन हमें हमारे ज्ञान, संबंध और भाषा — इन तीन जीवन-स्तंभों की ओर लौटने का अवसर देता है, जो अतीत की स्मृतियों से जुड़ते हुए वर्तमान को संस्कारित करते हैं और भविष्य को दिशा प्रदान करते हैं।

(डॉ. राघव नाथ झा, उपनिदेशक, ज्योतिर्वेद विज्ञान, पटना)

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