Hari Singh Nalwa: वीर सिक्ख योद्धा हरी सिंह नलवा भारत के गौरवशाली इतिहास का एक ऐसा नाम है जिसने भारत पर आक्रमण करने वाले विदेशी लुटेरों को नाकों चने चबवा दिये थे..
कौन थे हरि सिंह नलवा?
आज भारत में बहुत कम लोग हरि सिंह नलवा के बारे में जानते हैं, लेकिन पाकिस्तान और अफ़गानिस्तान में उनका नाम आज भी डर के साथ लिया जाता है। दुनिया के महान सेनानायकों में उनकी गिनती होती है। ब्रिटिश शासकों ने उनकी तुलना नेपोलियन से की है और 2014 में ऑस्ट्रेलिया की एक पत्रिका ने उन्हें इतिहास के दस सबसे महान विजेताओं की सूची में पहले स्थान पर रखा।
बचपन और महाराजा रणजीत सिंह से मुलाकात
हरि सिंह का जन्म 1791 में पंजाब के गुजरांवाला में एक सिख परिवार में हुआ था। बचपन में उन्हें प्यार से “हरिया” बुलाया जाता था। सिर्फ 7 साल की उम्र में उनके पिता का निधन हो गया। 1805 में महाराजा रणजीत सिंह ने एक प्रतिभा खोज प्रतियोगिता आयोजित की, जहाँ हरि सिंह ने भाला फेंकने और तीरंदाजी में अपनी अद्भुत कला दिखाई। इससे प्रभावित होकर महाराजा ने उन्हें अपनी सेना में शामिल कर लिया।
कैसे पड़ा “नलवा” नाम?
एक बार महाराजा रणजीत सिंह शिकार पर गए तो अचानक एक विशाल बाघ ने उन पर हमला कर दिया। सब डर गए, लेकिन हरि सिंह आगे बढ़े और उन्होंने बाघ के जबड़े अपने हाथों से फाड़ दिए! यह देखकर महाराजा ने कहा, “तुम तो राजा नल जैसे वीर हो!” और तभी से उनका नाम “नलवा” पड़ गया।
अफ़गानों को धूल चटाई
हरि सिंह नलवा महाराजा रणजीत सिंह के मुख्य सेनापति बने। उन्होंने 1807 से 1837 तक लगातार तीन दशक तक अफ़गानों से लोहा लिया और कसूर, मुल्तान, कश्मीर और पेशावर में सिख शासन स्थापित किया। उन्होंने खैबर दर्रे तक सिख साम्राज्य का विस्तार किया, जिससे भारत पर होने वाले बाहरी हमलों का सदियों पुराना सिलसिला खत्म हो गया।
पठानों में था उनका खौफ
पाकिस्तान और अफ़गानिस्तान में माएं आज भी अपने शरारती बच्चों को डराती हैं: “चुप हो जा, वरना हरि सिंह आ जाएगा!” एक दिलचस्प किस्सा यह है कि पठान लड़ाके हरि सिंह के डर से महिलाओं वाली सलवार-कमीज पहनने लगे थे ताकि सिख सैनिक उन्हें पहचान न सकें!
वीरगति और विरासत
1837 में जमरौद के किले में अफ़गानों से लड़ते हुए हरि सिंह नलवा शहीद हो गए। उनकी अंतिम इच्छा के अनुसार, उनकी राख को लाहौर के उसी अखाड़े में मिला दिया गया जहाँ उन्होंने अपनी पहली लड़ाई जीती थी। कुछ विद्वानों का मानना है कि भारत के तिरंगे में हरे रंग की पट्टी हरि सिंह नलवा की वीरता को सम्मान देने के लिए है।
आज की जरूरत
हरि सिंह नलवा जैसे महान योद्धा को भारत के इतिहास में वह स्थान नहीं मिला जिसके वे हकदार हैं। यह जरूरी है कि उनकी वीर गाथा को देशभर के स्कूलों में पढ़ाया जाए और उनके योगदान को राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता दी जाए। जब भी भारत के वीरों की बात होगी, हरि सिंह नलवा का नाम सबसे ऊपर होना चाहिए!
(प्रस्तुति -अवनीश कुमार)