Killer Drone: AI से चलने वाले ‘किलर ड्रोन’ पर दुनिया में विवाद पैदा हो गया है -दुनिया के ढाई दर्जन से ज्यादा देश चाहते हैं कि ये घातक हथियार बैन किया जाये..
आज के आधुनिक युद्ध का स्वरूप तेजी से बदल रहा है. अब ऐसे हथियार विकसित किए जा रहे हैं जो बिना किसी मानवीय आदेश के खुद निर्णय ले सकते हैं, अपने लक्ष्य की पहचान कर सकते हैं और उस पर हमला भी कर सकते हैं. ये अत्याधुनिक किलर ड्रोन आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) से संचालित होते हैं. इन्हें तकनीकी भाषा में लेथल ऑटोनॉमस वेपन सिस्टम्स (Lethal Autonomous Weapon Systems – LAWS) कहा जाता है.
इन्हीं हथियारों को लेकर पूरी दुनिया में तीखी बहस छिड़ गई है. 30 से अधिक देश इन पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने की मांग कर रहे हैं. हालांकि कई शक्तिशाली सैन्य राष्ट्र इस मांग का विरोध कर रहे हैं. दरअसल विवाद सिर्फ तकनीक तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके साथ नैतिकता, सुरक्षा और भविष्य के युद्ध की दिशा से जुड़े गंभीर सवाल भी जुड़े हुए हैं. आइए विस्तार से समझते हैं कि ये किलर ड्रोन क्या होते हैं, इनमें कौन-सी तकनीक इस्तेमाल होती है और दुनिया में इन्हें लेकर इतना बड़ा विवाद क्यों खड़ा हो गया है.
आखिर क्या होते हैं ऑटोनॉमस किलर ड्रोन?
ऑटोनॉमस किलर ड्रोन मूल रूप से ऐसे युद्धक रोबोटिक सिस्टम होते हैं जो तीन अहम कार्य अपने आप कर सकते हैं—
लक्ष्य की तलाश करना, लक्ष्य की पहचान करना और उस लक्ष्य पर हमला करना
मानव का काम अक्सर सिर्फ इतना होता है कि वह सिस्टम को सक्रिय कर दे. इसके बाद पूरा नियंत्रण मशीन के एल्गोरिद्म और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के हाथों में चला जाता है.
इन हथियारों को सामान्य तौर पर तीन श्रेणियों में बांटा जाता है—
पहली श्रेणी: इस श्रेणी में मशीन लक्ष्य की पहचान कर सकती है, लेकिन हमला करने से पहले इंसान की अंतिम मंजूरी जरूरी होती है.
दूसरी श्रेणी: यहां मशीन हमले का निर्णय ले सकती है, लेकिन इंसान को बीच में हस्तक्षेप करके उसे रोकने का अधिकार होता है.
तीसरी श्रेणी: इस श्रेणी में इंसान का कोई नियंत्रण नहीं होता. मशीन पूरी तरह स्वायत्त होती है और लक्ष्य चुनने से लेकर हमला करने तक का पूरा निर्णय खुद लेती है. यही सिस्टम असली LAWS माने जाते हैं और इन्हीं को लेकर सबसे ज्यादा चिंता व्यक्त की जा रही है.
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और सेंसर से चलता है पूरा सिस्टम
इन किलर मशीनों की असली ताकत उनका आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और अत्याधुनिक सेंसर नेटवर्क होता है. ड्रोन में कई प्रकार के सेंसर लगाए जाते हैं जो आसपास के वातावरण को लगातार स्कैन करते रहते हैं.
LiDAR तकनीक लेजर बीम की मदद से आसपास के इलाके का त्रि-आयामी नक्शा तैयार करती है.
थर्मल कैमरे अंधेरे में भी शरीर की गर्मी को पहचान सकते हैं.
रडार सिस्टम दूर तक हो रही गतिविधियों को पकड़ सकता है.
इन सभी सेंसर से प्राप्त डेटा को एक साथ जोड़कर ड्रोन अपने आसपास की स्थिति की पूरी तस्वीर तैयार करता है.
इसके बाद AI आधारित डीप लर्निंग सिस्टम सक्रिय होता है. इसे लाखों तस्वीरों और डेटा सेट पर प्रशिक्षित किया जाता है. कैमरे से मिलने वाली तस्वीरों का यह कुछ ही मिलीसेकंड में विश्लेषण कर सकता है और तय कर सकता है कि सामने दिखाई देने वाला लक्ष्य कोई सैनिक है, सैन्य वाहन है या कोई आम नागरिक.
सबसे विवादास्पद चरण इसके बाद आता है. यहां एल्गोरिद्म यह निर्णय करता है कि हमला करना चाहिए या नहीं. इसे थ्रेट असेसमेंट एल्गोरिद्म कहा जाता है. यह खतरे के स्तर, सैन्य महत्व और आसपास मौजूद लोगों जैसी कई स्थितियों का विश्लेषण करके फैसला करता है, लेकिन इसमें मानवीय संवेदनाएं या नैतिकता शामिल नहीं होती.
ये ड्रोन हमला कैसे करते हैं?
इन ड्रोन में दिशा तय करने के लिए GPS के साथ कई उन्नत तकनीकों का इस्तेमाल किया जाता है. उदाहरण के लिए SLAM तकनीक की मदद से ड्रोन अपने आसपास का नक्शा खुद तैयार कर सकता है और उसी के आधार पर रास्ता तय करता है. अगर GPS सिग्नल जाम भी कर दिया जाए तो भी यह अपने लक्ष्य तक पहुंच सकता है.
कई मामलों में इन ड्रोन का इस्तेमाल समूह में किया जाता है, जिसे स्वॉर्म टेक्नोलॉजी कहा जाता है. इसमें दर्जनों या सैकड़ों ड्रोन एक नेटवर्क बनाकर काम करते हैं. अगर किसी एक ड्रोन को कोई महत्वपूर्ण जानकारी मिलती है तो वह तुरंत बाकी सभी ड्रोन तक पहुंच जाती है.
हमले के लिए अक्सर लॉइटरिंग म्यूनिशन का उपयोग किया जाता है. ऐसे ड्रोन लंबे समय तक आसमान में मंडराते रहते हैं और जैसे ही लक्ष्य मिलता है, सीधे उस पर गिरकर विस्फोट कर देते हैं.
कुछ ड्रोन मिसाइल या बम गिराते हैं, जबकि कुछ दुश्मन के इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम को बाधित करने के लिए इलेक्ट्रॉनिक या साइबर हमले भी कर सकते हैं.
दुनिया में मौजूद ऐसे प्रमुख हथियार
दुनिया के कई देशों ने इस तरह की तकनीक विकसित कर ली है. इजराइल का हारोप (Harop) ड्रोन इस तकनीक का प्रमुख उदाहरण माना जाता है. यह लंबे समय तक हवा में मंडराता है और दुश्मन के रडार सिग्नल मिलते ही उस पर हमला कर देता है.
रूस की कंपनी कलाश्निकोव द्वारा विकसित जाला KYB (ZALA KYB) भी स्वायत्त हमला करने वाला ड्रोन माना जाता है. अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया ने मिलकर बोइंग MQ-28 घोस्ट बैट (Boeing MQ-28 Ghost Bat) नाम का उन्नत लड़ाकू ड्रोन बनाया है, जो मानव संचालित फाइटर जेट्स के साथ उड़ते हुए कई फैसले खुद ले सकता है.
तुर्की के कार्गु-2 (Kargu-2) ड्रोन्स
तुर्की का कार्गु-2 (Kargu-2) ड्रोन भी अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बड़ी बहस का विषय बन चुका है. संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के अनुसार, 2021 में लीबिया में पहली बार ऐसा मामला सामने आया था जब किसी स्वायत्त ड्रोन ने बिना सीधे मानवीय आदेश के लोगों पर हमला किया.
आखिर इतने देश प्रतिबंध की मांग क्यों कर रहे हैं?
इन हथियारों को लेकर सबसे बड़ी चिंता यह है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस भी गलत निर्णय ले सकता है. अगर किसी एल्गोरिद्म ने किसी आम नागरिक को सैनिक समझ लिया तो उसके परिणाम बेहद विनाशकारी हो सकते हैं.
दूसरा बड़ा खतरा साइबर हमलों का है. यदि दुश्मन इन सिस्टम्स को हैक कर ले तो वही हथियार पलटकर उसके मालिक देश के खिलाफ इस्तेमाल हो सकते हैं. इसके अलावा स्वॉर्म ड्रोन हमले की स्थिति में सैकड़ों मशीनों को एक साथ रोक पाना बेहद कठिन हो सकता है.
नैतिक सवाल इससे भी ज्यादा गंभीर हैं. क्या किसी मशीन को यह अधिकार दिया जाना चाहिए कि वह तय करे कि किसे जीवित रहना है और किसे नहीं? अगर किसी हमले में गलती हो जाती है तो जिम्मेदारी किसकी होगी—सॉफ्टवेयर तैयार करने वाले इंजीनियर की, सेना के अधिकारी की या उस कंपनी की जिसने यह ड्रोन बनाया?
इन्हीं चिंताओं के चलते ऑस्ट्रिया और न्यूज़ीलैंड सहित 30 से अधिक देश संयुक्त राष्ट्र में इन हथियारों पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने की मांग कर रहे हैं. हालांकि अमेरिका, रूस, चीन और इजराइल जैसे कई सैन्य शक्तियां इस मांग से सहमत नहीं हैं. उनका मानना है कि आने वाले समय में युद्ध की रणनीति में यह तकनीक निर्णायक बढ़त दिला सकती है.
(त्रिपाठी पारिजात)



