P Jairaj हिन्दी फिल्मों के एक बहुत पुराने और प्रसिद्ध अभिनेता हैं जिनकी पुण्य तिथि 11 अगस्त को आती है और उनकी याद दिलाती है..
जब भारत में बोलती फिल्मों का दौर शुरू भी नहीं हुआ था, तब वह हैदराबाद से मुंबई आ गए थे। और मुंबई की फिल्म इंडस्ट्री में उनका कद इतना ऊंचा हो गया कि उन्होंने लगभग साठ सालों तक फिल्मों में काम किया। उनका पूरा नाम पैदापति जयराजुलू नायडू था, लेकिन वह पी. जयराज के नाम से मशहूर हुए।
28 सितंबर, 1909 को आंध्र प्रदेश के करीमनगर में जयराज जी का जन्म हुआ था। जब वह फिल्मों में काम करने के लिए घर से निकले, तो उनके परिवार वाले बहुत नाराज हुए थे। घर पर बहुत बड़ा विवाद हुआ था, लेकिन जयराज जी ने किसी की बात नहीं सुनी और सबको नाराज करके वह मुंबई आ गए। हालांकि, जल्द ही उन्हें एहसास हो गया कि अगर फिल्मों में सफल होना है, तो उन्हें अपने शरीर को मजबूत बनाना होगा।
उस जमाने में धार्मिक, साहसिक और पौराणिक कहानियों पर फिल्में बनती थीं, और इन फिल्मों में मजबूत शरीर वाले हीरो की जरूरत होती थी। जयराज जी ने कड़ी मेहनत शुरू कर दी। वह पहले से ही कसरत करते थे, लेकिन अब उन्होंने तलवारबाजी और घुड़सवारी भी सीखनी शुरू की। कुछ ही समय में वह एक कुशल तलवारबाज और घुड़सवार बन गए।
उनकी मेहनत रंग लाई, और 1929 में आई फिल्म जगमगाती जवानी में उन्हें पहला मौका मिला। अगले साल, 1930 में आई फिल्म रसीली रानी में वह पहली बार हीरो बने। धीरे-धीरे वह मूक फिल्मों के एक लोकप्रिय चेहरे बन गए और कई अच्छी फिल्मों में काम किया।
जब बोलती फिल्मों का दौर शुरू हुआ, तो जयराज जी को थोड़ी मुश्किल हुई। दरअसल, शुरुआती बोलती फिल्मों में हीरो-हीरोइन को अपने गाने खुद गाने पड़ते थे, लेकिन जयराज जी को गाने का कोई अनुभव नहीं था। इसलिए, उन्होंने संगीतकार बी.आर. देवधर से संगीत की ट्रेनिंग ली।
1932 में आई फिल्म शिकारी में उन्होंने पहली बार गायकी की कोशिश की। यह फिल्म उस समय बहुत सफल रही, और इसकी सफलता ने उनकी गायकी की कमियों को छुपा दिया। समय के साथ, वह बोलती फिल्मों में भी सफल होने लगे। उन्हें अच्छी भूमिकाएं मिलने लगीं, और उनका नाम चमकने लगा।
हालांकि पी. जयराज ने रोमांटिक फिल्मों में भी काम किया, लेकिन उन्हें सबसे ज्यादा ख्याति धार्मिक और ऐतिहासिक फिल्मों से मिली। पृथ्वीराज चौहान, अमर सिंह राठौर, हैदर अली, दुर्गा दास, टीपू सुल्तान और चंद्रशेखर आज़ाद जैसी फिल्मों में उन्होंने शानदार अभिनय किया। इस तरह, वह ऐतिहासिक फिल्में बनाने वाले निर्देशकों के पसंदीदा हीरो बन गए।
1945 में, पी. जयराज ने पहली बार एक फिल्म प्रतिमा का निर्देशन किया, जिसमें दिलीप कुमार और स्वर्णलता मुख्य भूमिकाओं में थे। इसके बाद, उन्होंने अभिनय के साथ-साथ निर्देशन भी करना जारी रखा। 1959 में आई फिल्म मोहर भी उन्हीं के द्वारा निर्देशित की गई थी।
1951 में उन्होंने सागर नामक एक फिल्म प्रोड्यूस की, जिसमें वह खुद हीरो थे और नर्गिस हीरोइन थीं। 1960 के दशक में जब भारतीय सिनेमा में बड़े बदलाव हो रहे थे, तब पुराने कलाकारों को मुख्य भूमिकाएं नहीं मिल रही थीं। इसलिए, 1965 से पी. जयराज ने चरित्र भूमिकाएं निभानी शुरू कीं।
मुजरिम कौन, खूनी कौन उनकी पहली फिल्म थी, जिसमें उन्होंने सहायक भूमिका निभाई। इसके बाद, 1995 तक उन्होंने कई फिल्मों में अलग-अलग तरह के किरदार निभाए। गॉड एंड गन (1995) उनकी आखिरी फिल्म थी। इसके पांच साल बाद, 11 अगस्त 2000 को, 90 साल की उम्र में उनका निधन हो गया।
(प्रस्तुति -अर्चना शेरी)