Saturday, August 30, 2025
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Pandit Nagendra Kumar Pandey writes: संस्कृत भाषा – गौरव से पतन तक की यात्रा और पुनर्जागरण की आवश्यकता

Pandit Nagendra Kumar Pandey का यह लेख बताता है कि विश्वगुरु भारतवर्ष में एक समृद्ध बौद्धिक साहित्यक व वाचिक धरोहर की दुर्दशा का कारण बना है जनगण का अज्ञान एवं उपेक्षा..

Pandit Nagendra Kumar Pandey का यह लेख बताता है कि विश्वगुरु भारतवर्ष में एक समृद्ध बौद्धिक साहित्यक व वाचिक धरोहर की दुर्दशा का कारण बना है जनगण का अज्ञान एवं उपेक्षा..

संस्कृत — वह भाषा, जिसने मानव सभ्यता को ज्ञान, दर्शन, विज्ञान, साहित्य और आध्यात्मिकता की सर्वोच्च ऊँचाइयों तक पहुँचाया, आज उपेक्षा की शिकार होकर पतन की ओर अग्रसर है।

भारत, जो सभ्यता, संस्कृति और विकास की प्रत्येक धारा में विश्व के अग्रणी राष्ट्रों में रहा है, आज उसी भाषा को भूलने के कगार पर खड़ा है, जिसने उसे ‘विश्वगुरु’ बनाया।

भारत में भाषाई वैभव और संस्कृत की सर्वोच्चता

स्वतंत्रता से पूर्व भारत में 550 से अधिक रियासतें थीं। प्रत्येक की अपनी-अपनी भाषा थी, किंतु संस्कृत को सर्वोच्च सम्मान प्राप्त था। राजाओं के दरबार, मंत्रिपरिषद और राजकवि — सभी संस्कृत में संवाद करते थे। राजकीय सम्प्रदाय चाहे शैव, वैष्णव, बौद्ध, जैन या सनातन रहा हो, धर्मग्रंथ और विधि-विधान संस्कृत में ही रचे-बसे थे।

आज भी, यद्यपि संविधान ने 22 भाषाओं को मान्यता दी है, संस्कृत उनमें स्थान पाती है — किंतु केवल नाममात्र के लिए।

संस्कृत दिवस : गौरव की स्मृति

सावन पूर्णिमा, जिसे संस्कृत दिवस के रूप में मनाया जाता है, हमें इस अमूल्य धरोहर की याद दिलाती है।
संस्कृत केवल भाषा नहीं, बल्कि भारत की आत्मा, विचार और दर्शन की अभिव्यक्ति है।

संस्कृत का ऐतिहासिक विकास : तीन युग

1. प्राचीन वैदिक संस्कृत काल (1500–500 ईसा पूर्व)

वेद, ब्राह्मण, आरण्यक और उपनिषदों की रचना।

रामायण और महाभारत का मूल संस्कृत में होना।

वैदिक मंत्रों, यज्ञ-विधानों और प्रारंभिक दार्शनिक विचारों का उत्कर्ष।

2. मध्य संस्कृत काल (800 ईसा पूर्व – 1000 ईस्वी)

काव्य और नाटक की स्वर्णयुगीन रचनाएँ — रघुवंशम्, मेघदूतम्, अभिज्ञानशाकुंतलम्, मालविकाग्निमित्रम्।

कामसूत्र, राजतरंगिणी और अन्य ऐतिहासिक ग्रंथ।

संस्कृत का ज्ञान और साहित्यिक सौंदर्य चरम पर।

3. उत्तरकालीन संस्कृत (1000 ईस्वी – वर्तमान)

उत्तररामचरितम्, विक्रमोर्वशीयम्, मुद्राराक्षस जैसी रचनाएँ।

संस्कृत का प्रयोग अब सीमित किन्तु विद्वत् समाज में सम्मानित।

संस्कृत के अमर संदेश

वसुधैव कुटुम्बकम् — “पूरी पृथ्वी एक परिवार है।”

सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः — “सभी सुखी हों, सभी निरोग रहें।”

बुद्धं शरणं गच्छामि — बौद्ध धर्म का संस्कृत वाक्य।
ये सूत्र आज भी विश्व को मानवीयता और एकता का संदेश देते हैं।

पतन के ऐतिहासिक कारण

1. 1192 ईस्वी — इस्लामी आक्रमण और राजभाषा परिवर्तन

तराइन के युद्ध में मोहम्मद गौरी की विजय के बाद दिल्ली सल्तनत की स्थापना।

अरबी और तुर्की को राजभाषा बनाना, संस्कृत को राजकीय संरक्षण से वंचित करना।

2. 1526 ईस्वी — मुगल काल में फारसी का प्रभुत्व

बाबर के शासन के साथ फारसी का दरबारी और प्रशासनिक भाषा के रूप में वर्चस्व।

3. 1757 ईस्वी — अंग्रेजी शासन की स्थापना

प्लासी के युद्ध के बाद अंग्रेजी का प्रभुत्व।

1835 का English Education Act — संस्कृत शिक्षा को भारी आघात।

संस्कृत के उत्थान के प्रयास : सीमित सफलता

1791 ईस्वी: राजस्थान में 5000 संस्कृत विद्यालय, 1000 महाविद्यालय, 18 विश्वविद्यालय की स्थापना।

1834 के सर्वेक्षण में — उत्तर भारत के अधिकांश गाँवों में गुरुकुल की उपस्थिति।

किंतु संस्कृत को कभी व्यवसाय और रोज़गार से नहीं जोड़ा गया, जिससे यह केवल अकादमिक दायरे में सिमट गई।

स्वतंत्र भारत में त्रिभाषा नीति और संस्कृत की स्थिति

1968: कोठारी आयोग की सिफारिश पर ‘त्रिभाषा सूत्र’ — हिंदी, अंग्रेजी और क्षेत्रीय भाषा को अनिवार्य।

संस्कृत केवल तीसरी भाषा के विकल्प में, वह भी अधिक अंक प्राप्ति का साधन बनकर रह गई।

दक्षिण भारत में संरक्षण और ह्रास

विजयनगर साम्राज्य (12वीं–14वीं सदी) में संस्कृत को संरक्षण।

गंगादेवी की मदुराविजयम् और कृष्णदेवराय के साहित्यिक योगदान।

परंतु 14वीं सदी के बाद पतन की वही कहानी जो उत्तर भारत में।

वर्तमान चुनौतियां

2019: संसद में मानव संसाधन मंत्री रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ — 25,000 संस्कृत शिक्षकों की आवश्यकता।

140 करोड़ की जनसंख्या में मात्र 24,000 लोग ही संस्कृत को सक्रिय रूप से जानते हैं।

ब्राह्मण समाज द्वारा भी प्रचार-प्रसार में अपेक्षित प्रयास का अभाव।

विदेशों में आदर और अनुसंधान

अमेरिका, जर्मनी, इंग्लैंड, ऑस्ट्रेलिया, इटली, सूरीनाम, फिजी में संस्कृत पर उच्चस्तरीय अनुसंधान।

वैज्ञानिक मान्यता — संगणक (कंप्यूटर) के लिए अत्यंत अनुकूल, तार्किक और सटीक भाषा।

संस्कृत केवल एक विषय या अंकों का साधन नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, इतिहास और विज्ञान की आत्मा है।
इसके पुनर्जागरण के लिए इसे जीवन, व्यवसाय, विज्ञान और आधुनिक संचार माध्यमों से जोड़ना आवश्यक है।
जब तक यह व्यवहार और रोज़मर्रा की भाषा नहीं बनेगी, तब तक पुनः ‘विश्वगुरु’ बनने का सपना अधूरा रहेगा।

(पंडित नागेन्द्र कुमार पाण्डेय)

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