Tuesday, February 10, 2026
Google search engine
Homeसाहित्यPoetry by Manmeet Soni: "खाना खाने के बाद हाथ मत धोना,...

Poetry by Manmeet Soni: “खाना खाने के बाद हाथ मत धोना, दोस्तो”

Poetry by Manmeet Soni: सदा एक संदेश होती है मनमीत सोनी की कविता जो शब्दों में तो विद्रोही हो सकती है भाव में सदा जीवन का समर्थन करती है..उस जीवन का भी जो परे है बहुत से दिखावों से..

Poetry by Manmeet Soni: सदा एक संदेश होती है मनमीत सोनी की कविता जो शब्दों में तो विद्रोही हो सकती है भाव में सदा जीवन का समर्थन करती है..उस जीवन का भी जो परे है बहुत से दिखावों से..
खाना खाने के बाद
मैं कभी भी साबुन से हाथ नहीं धोता..
हालांकि होटलों में
अक्सर रखे होते हैं
रंगीन ख़ुशबूदार साबुन
आजकल तो लिक्विड वाश भी मिलते हैं
लेकिन मैं फिर भी नहीं धोता मेरे हाथ!
मुझे किसी गुलाब के फूल
या किसी स्त्री से आती खुशबू से भी
अच्छी लगती है
खाना खाने के बाद
मेरे हाथों से आती हुई गंध
मैं अपने हाथों को
फूल की तरह सूंघता हूँ
मेरी अंगुलियां
फूल की पंखुड़ियों की तरह खुल जाती हैं
मेरे हाथों से
झरती रहती है मसालेदार गंध!
मैं
बार बार सूंघता हूँ अपने हाथों को
मुझे देर तक याद रहती है
मूली, टमाटर और प्याज़ की गंध
आलू की सब्ज़ी की गंध
चुटकी-भर नमक की गंध
रोटी और रोटी पर लगे घी की गंध
घी चाहे नक़ली हो
लेकिन घी की गंध हमेशा असली होती है!
मैं
इस गंध में
उस स्त्री की गंध भी शामिल है
जिसने मेरे लिए खाना बनाया
उस बिहारी लड़के की गंध भी शामिल है
जो हज़ार किलोमीटर दूर से
बिहार के पटना से लाया राजस्थान के सीकर में अपनी गंध
मैं जानता हूँ
मैं जो भी खा रहा हूँ
उसमें बहुत मिलावट है
लेकिन खाना बनाने वाले के दिल में
नहीं है कोई भी मिलावट
वह
अभी अभी तोड़ी गई गाजर-सा महकता है
अभी अभी सिलबट्टे पर पीसा हुआ पोदीने-सा
अभी अभी मामदस्ते में कूटी हुई अदरक-सा!
कितनी अच्छी लगती है
खाना खाने के बाद
अंगुलियों पर बची हुई चिकनाई
मैं तो इस चिकनाई को
अपने गालों पर किसी क्रीम की तरह लगा लेता हूँ
इन्हीं गीली और चिकनी अंगुलियों से
बना लेता हूँ शाहरुख़ खान जैसे सिल्की बाल
जाने वे कैसे लोग हैं
जो खाना खाने के बाद जल्द से जल्द
अपने हाथ धो लेना चाहते हैं
उन्हें शायद बहुत जल्दी रहती है
दूसरे खाने पर टूट पड़ने की
या दूसरे के खाने पर टूट पड़ने की
लेकिन मुझे अपनी अंगुलियों से आती गंध
बार बार याद दिलाती है :
“तुम एक बार खाना खा चुके हो मनमीत सोनी /
अब दूसरों को उनके हिस्से का खाना खाने दो”
जितनी देर
मेरी अंगुलियों से खाने की गंध आती है
मुझमें इस बात की हवस पैदा नहीं होती
कि मैं सारी दुनिया को खा जाऊं
होटलों में
यह जो नीबू और गर्म पानी लाकर देता है बेयरा
मैं उस पानी से हाथ धोने के बजाय
उसमें नीबू निचोड़ कर पी जाना चाहता हूँ
(पिया भी है)
मेरे आस-पास बैठे लोग
हँसते हैं मुझ पर
सोचते हैं कितना गंवार हूँ मैं
लेकिन नीबू सस्ते हैं इसका मतलब यह नहीं
कि उनसे हाथ साफ़ किये जाएं
हालाँकि हालात यहाँ तक पहुँच गए हैं
कि एक-दूसरे के ख़ून से भी हाथ साफ़ किये जाने लगे हैं
अब तो यहाँ तक नौबत आ गई है
कि जब तक आप
तीन-चार लोगों की आत्मा की हत्या नहीं कर देते :
आपका दिन एक “सक्सेसफुल डे” नहीं माना जाता!
बात कहाँ से शुरू हुई थी
बात कहाँ पर आ गई
लेकिन मैं क्या करूँ दोस्तो
कि अभी अभी खाया है मैंने खाना
और मेरे हाथों से आ रही है
तवे पर भूनी हुई कच्ची हरी मिर्च की ख़ुशबू!
दोस्तो!
यह मुझे क्या हो गया है
कि मैं अब कुछ भी लिखता हूँ तो ऐसा लगता है
जैसे सौंफ खाने के बाद
मेरे हाथों पर चिपके रह गए हैं
सौंफ और चीनी के दाने
अहा!
यह मेरी कविताएं
किसी स्त्री की परोसी हुई थाली जैसी कविताएं
मैं आपसे कहना चाहता हूँ :
आओ! जीमो महाराज!
आप सबको ख़ुदा की क़सम
इस कविता को पढ़ने के बाद
अपनी आत्मा को साबुन से मत धोइयेगा :
रहने दीजियेगा मेरी स्याही की गंध
अपनी आत्मा पर
अपनी पलकों से
लटकने दीजियेगा इस कविता के स्वादिष्ट शब्द
उठने दीजियेगा सीने से भाप
कि आपने मनमीत सोनी को पढ़ा है
दोस्तो!
कभी मत धोइयेगा अपने हाथ
खाना खाने के बाद
और धोने ही हैं
तो मिट्टी या राख़ से धोइयेगा
बहुत गहरी साज़िश हो रही है अंदरखाने
खाने की गंध मिटा देने की :
दुनिया भर के वैज्ञानिक
एक कैप्सूल में भर देना चाहते हैं
आटा, सब्ज़ी, चिकन, मसाले, पानी सारे मल्टीविटामिन और सारे स्वाद…
मेरी मानो दोस्तो!
खाना खाने के बाद
कभी हाथ मत धोना दोस्तो
और साबुन वगैरह से तो कभी हाथ मत धोना !
(मनमीत सोनी)
RELATED ARTICLES

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

- Advertisment -
Google search engine

Most Popular

Recent Comments