Poetry by Manmeet Soni: संवेदना जितनी मनमीत सोनी की कलम में है उतनी ही यदि उनकी कविताओं के पाठक में भी होगी, तो आंखों के आँसुओं को रोकना तब आसान नहीं होगा..
हर बड़े परिवार में होती है एक नाटी स्त्री
जिसका नाम
कभी सीता होता है
कभी गीता होता है
कभी राधा होता है
तो कभी मालती या छोटी!
—
लगभग चार फ़ीट
या चार फ़ीट दो इंच क़द होता है इस स्त्री का
पेट निकला हुआ होता है
स्तन कुछ पिचके हुए
साड़ी कमर में खोंसी हुई
पाँव में हवाई चप्पल
चाल में तेज़ी
दूर से ढोलक जैसी लगती है
पास जाओ तो मालूम पड़ता है
असल में ढोलक नहीं :
एक बांसुरी है वह!
—
सारे काम करती है घर के
उससे उम्मीद भी यही होती है
वह कभी शिकायत नहीं करती
उसका काम सब्ज़ी काटना, आटा पीसना, चक्की चलाना ही होता है
घर के छोटे बच्चे
वही संभालती है अक्सर
घर के बड़े बुजुर्गों की
दवा-दारू का वही रखती है ख़याल!
—
उसके पास
तीन-चार साडियां ही होती हैं
जिनमें से दो साड़ियां
वह रेगुलर बेसिस पर पहनती है
और एक बचाकर रखती है
शादी-ब्याह-वार-त्योहार-उपवास आदि के लिए!
—
उसका पति लगभग बेरोज़गार होता है
उस पति की शादी इसीलिए उससे करवाई जाती है
कि लड़के और लड़की का कुँवारपन उतर जाए
सबसे कम मांग होती है
ऐसे पति-पत्नी की
वे दोनों बहुत काम करते हैं घर का
या यूं कहें कि हर काम करते हैं घर का
उन्हें अकेले में अफ़सोस होता है :
उनकी क़द्र नहीं करता कोई!
—
यह छोटे क़द की नाटी स्त्री
जब बीमार हो जाती है
तो वह बड़ा घर पूरी तरह अस्त-व्यस्त हो जाता है
न कपड़े समय पर सूखते हैं
हरी सब्ज़ियों की जगह
मंगोड़ी और पापड़ और भुजिया की सब्ज़ी बनने लगती है
बच्चे
पोतड़ों में पोटी-पेशाब करते रहते हैं
बड़े-बुज़ुर्ग और ज़्यादा बीमार हो जाते हैं
यह नाटी स्त्री
संयुक्त परिवार के आकाश का ध्रुव तारा होती है
जब यह ध्रुव तारा नहीं दीखता
तो वह बड़ा घर एक दिशाहारा पथिक बन जाता है
—
यह नाटी स्त्री
वैसे तो बहुत कम बोलती है
लेकिन कोई साथिन मिल जाए
तो ख़ूब चपर-चपर करती है
थोड़ी-सी तेज़ भी हो जाती है
समय के साथ यह स्त्री
यह स्त्री इस बड़े परिवार में
अपने छोटे-से परिवार को जतन से बचाती है
—
ओसणे हुए आटे के लौंदे जैसी यह स्त्री
जिसमें कूट कूट कर नमक भरा होता है
कभी नहीं कह पाती अपने हक़ की बात
अधिक से अधिक यही कहती है
“आप लोग देख लो / जो बड़े कहेंगे मान लूंगी!”
—
हर बड़े परिवार में होती है एक नाटी स्त्री –
जैसे पहिये की क़ील
जैसे धरती की धुरी
जैसे साइकिल का स्टैंड
जैसे गाड़ी का हैण्ड ब्रेक
जैसे टीवी का रिमोट
जैसे रसोई का पायदान
जैसे बच्चे के गले में मादलिया
मुझे बहुत प्यार आता है ऐसी स्त्री पर
ऐसी स्त्री तक
कोई नहीं पहुंच पाता
न सरकारी योजना
न शहरी स्त्री विमर्श
न फिल्मों की हीरोइनें
कोई नहीं बनना चाहता ऐसी स्त्री
लेकिन फिर भी
घास की तरह उग आती है
यह नाटी स्त्री
—
यह नाटी स्त्री
एक फीता होती है
हर बड़ा होता बच्चा इसके बराबर खड़ा होकर
अपना क़द नापता है
और ख़ुश होता है :
वाह! गीता चाची से बड़ा हो गया मैं!
—
बीकाजी भुजिया में
यह जो बड़े बड़े गांठिये आते हैं न
वैसी ही होती है यह नाटी स्त्री –
सब भुजिया खाना चाहते हैं
सब गांठियों को टालते रहते हैं!
—
क्या आपने भी
देखा है इस नाटी स्त्री को
क्या आपने कभी
इसके मन में उतरने की कोशिश की है
क्या आपका
इसकी आंसुओं भरी आँखों से सामना हुआ है
अगर हां!
तो आप भी मेरी तरह यही कहेंगे :
यह नाटी स्त्री
अपने क़द से बहुत बड़ी होती है
यह कई बार
पांच फ़ीट तीन इंच वाली स्त्रियों से
बहुत सुंदर, बहुत विनम्र और बहुत जीवन्त होती है
यह हमारी छाती तक ही आती है
लेकिन इसे देखते ही
हमारी छाती में एक समंदर उछाल खाने लगता है –
और इस समंदर का
कहीं कोई किनारा नहीं होता! !
(मनमीत सोनी)



