Wednesday, February 18, 2026
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Poetry by Manmeet Soni: “ऐपस्टीन फाइल्स और बच्चियों के बारे में”

Poetry by Manmeet Soni: अपराध के वीभत्स मनोरंजन हेतु छोटी बच्चियों का चयन यूं ही नहीं है -समझाया है युवाकवि मनमीत ने अपनी बेबाक कलम से..

Poetry by Manmeet Soni: अपराध के वीभत्स मनोरंजन हेतु छोटी बच्चियों का चयन यूं ही नहीं है -समझाया है युवाकवि मनमीत ने अपनी बेबाक कलम से..

उम्र में बड़ी लड़कियाँ हाथ-पाँव मार सकती हैं
इसलिए छोटी बच्चियों को पकड़ो
छोटी बच्चियों को देर तक यह समझ ही नहीं आएगा
कि उनके साथ हो क्या रहा है
और जब तक समझ में आएगा :
या तो हम उनका माँस खा चुके होंगे
या वे इतनी पशु हो जाएंगी
कि उनकी स्मृति जवाब दे जाएगी!
उम्र में बड़ी लड़कियों के बड़े चक्कर हैं
पता नहीं
किसका मासिक चल रहा हो नहीं चल रहा हो
पता नहीं
किसका कौमार्य भंग हो चुका हो नहीं हो चुका हो
पता नहीं
किसके शरीर से कैसी गंध आए
चूमने और काटने में मज़ा आए न आए
इसलिए हम शक्तिशालियों ने यह निर्णय लिया है
और यू एन ओ भी इस पर सहमत है
कि छोटी बच्चियों को बलात्कार के लिए चुना जाए!
उम्र में बड़ी लड़कियों का बलात्कार
एक पुरानी और सड़ी-गली अवधारणा है
चूँकि हम विकसित देशों के राष्ट्राध्यक्ष हैं
इसलिए हम सभी
इक्कीसवीं सदी में बाईसवीं सदी का स्वप्न देखेंगे
आख़िर कब तक हम
अठारह बीस बाईस बरस की लड़कियों को
काटेंगे, नोचेंगे, चूमेंगे और चाटेंगे
हमें जो मज़ा एक पांच बरस की बच्ची दे सकती है
उसका नर्म गर्म गोश्त दे सकता है
ऐसा मज़ा किसी देश को परमाणु बम से ध्वस्त करने में भी नहीं आएगा
वह अमेरिकी राष्ट्रपति मूर्ख था
जिसने हीरोशिमा और नागासाकी पर बम गिराए
इससे ज़्यादा “प्लेज़र” उसे कोई पांच बरस की बच्ची दे सकती थी
काश!
1945 में भी होता कोई ऐसा द्वीप
जहाँ पर नावों में बाँध कर लाई जाती बच्चियां
फिर हम लोहे के जाल फेंकते उन पर
उन्हें मछलियों की तरह तड़पते देखते!
हिटलर चूतिया था
सद्दाम हुसैन महा-चूतिया
यहूदियों को मार कर क्या मिला
ईरानियों से दुश्मनी मोल लेकर क्या उखाड़ लिया
यह दोनों तानाशाह पागल थे साले गधे
अगर इनमें अक्ल होती
तो आराम से राज करते अपने महलों में
हथियारों के साथ-साथ बच्चियों का भी सौदा करते
बड़ा करते किसी भ्रूण को
फिर उसे इतना बड़ा करते कि अपने जननांगों पर फिराते
बाई गोड की क़सम ऐसा “प्लेज़र” मिलता
कि देखने वाले को ख़ून की उलटी हो जाती
लेकिन उसे “heaven” का मज़ा आ जाता
रेड वाइन में डुबोकर
छोटी छोटी बच्चियों को
टोस्ट की तरह खा जाने का सुख
महात्मा गाँधी और नेलसन मंडेला के चेले क्या समझेंगे?
फकिंग थर्ड वर्ल्ड कंट्रीज़!
वहशियो!
अगर तुम्हारी भूख मिट गई हो तो कुछ कहूं
तुम इस धरती के लायक नहीं हो
तुम गालियों और लानतों से आगे जा चुके हो
फांसी के फंदे तुम्हें छूना तक नहीं चाहते
इलेक्ट्रिक चेयर तुम्हारे नाम से शर्मिंदा है
ज़हरीली सुइयों ने मना कर दिया है कि उन्हें तुम्हारे शरीर में घुसाकर
अपवित्र नहीं किया जाए!
लानत है
उन सभी देशों पर लानत है
जिनका थोड़ा भी लेना-देना है उस हैवान से
हम लोग
हाँ! हम सभी लोग
मिलकर तुम लोगों पर पेशाब करना चाहते हैं
नाक सिनकना चाहते हैं
टट्टी करना चाहते हैं
हमारे पास घृणा के शब्द नहीं है
हमारी भाषा अपाहिज हो चुकी है
हमारे सपनों में वे बच्चियां आती हैं
और हमें जगाकर पूछती हैं :
कितना और क्या ढ़कें कि हम “सेफ़” महसूस करें?
—-
कुत्तो
कमीनो
हरामज़ादो
नीचो
चले जाओ हमारी आँखों से दूर
हम इस दुनिया की नागरिकता से इस्तीफ़ा देते हैं
हम नहीं हैं यहाँ के निवासी
हम यहाँ पैदा हुए मच्छर हैं
ततैये हैं
कबूतर हैं
लेकिन मनुष्य नहीं हैं
हम इतने नपुंसक हैं
कि एक तीखी मगर दबी हुई प्रतिक्रिया बन कर रह गए हैं
हम बम की तरह फूट नहीं पा रहे हैं
हम तुम्हें राख़ नहीं कर पा रहे हैं
हम कुछ भी नहीं कर पा रहे हैं!
बच्चियो!
प्यारी बच्चियो!
बहुत मासूम बच्चियो!
आओ!
हम तुम्हें जीना तो नहीं सिखा सके
लेकिन मरना तो सिखा ही सकते हैं
दीवार से सर फोड़ना सीखो
धारदार चीज़ से नस काटना सीखो
ज़हरीली चीज़ को निगलना सीखो
किसी भारी व्हीकल के आगे आना सीखो
कविताएं ही कविताएं है चारों ओर
एक भी कवि नहीं है दुनिया में
कोई एक कवि तो हो कम से कम
इसलिएमैं ख़ुद को गोली मार के शूट करना चाहता हूँ
बच्चियो!
आओ!
इस बंदूक का घोड़ा दबाओ!
(मनमीत सोनी)
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